एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शिवशंकर उरांव)। अंतरराष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस नौ अगस्त को मनाया जाता है। यह दिन विश्व भर के आदिवासियों के हित और अधिकार को अपने में समेटे है। इस अवसर पर पूरे देश में छोटे बड़ें कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। इन कार्यक्रमों का सिलसिला 1993 से जोर पकड़ता गया है। इसी वर्ष से नौ अगस्त को अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाने की घोषणा हुई। विश्व मूल आदिवासी दिवस मनाने के कारणों पर जाए तो यह एक मर्माहत करने वाला अंदरूनी विषय है जिस पर चर्चा कम ही होती है। लेकिन इस सच को देश ही दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति को जानना आवश्यक है। आज से 524 साल पहले 1498 ई में यूरोप के एक छोटे से देश स्पेन निवासी कोलंबस नामक नाविक अपने लाव लश्कर के साथ समुद्री यात्रा पर निकला। उसने भारत की संपन्नता और एर्श्वय के बारे में सुन रखा था। लेकिन समुद्री तुफान के कारण रास्ता भटक कर वह अमेरिका पहुंच गया। तब अमेरिका में गोरे लोग नहीं थे। काले और निर्धन आबादी का वहा जमावड़ा था। लेकिन वे अपनी संस्कृति रीति रिवाज और परम्पराओं के साथ ही जीते थे। कोलंबस भारत की खोज में निकला था लेकिन उसने एक नयी भूमि की खोज कर ली थी जो अमेरिका था। जिस दिन कोलंबस अमेरिका की धरती को छुआ था यानि उस धरती पर पहुंचा था वह तारीख नौ अगस्त 1498 थी। कोलंबस को लगा कि वह इंडिया की खोज करने में सफल हो गया है इसलिये उसने वहां स्थित लोगों को इंडियन कहकर संबोधित किया। वही लोग आगे चलकर रेड इंडियन कहलाये। कोलंबस के बाद यूरोप के कई देशों के नाविक और समुद्री अभियान में लगे जन समूह भी अमेरिका पहुंचे। धीरे-धीरे यूरोप के गोरों ने अमेरिका पर कब्जा जमा लिया। इन गोरों ने वहां के मूलवासी रेड इंडियन्स पर अंतहीन अमानवीय अत्याचार किये जिसके कारण उनकी स्थिति अत्यंत खराब होती हुई लुप्त प्राय हो गयी। जो थोड़ें बच गये उनके पास सनातन पद्धति रीति रिवाज और धार्मिक समाजिक बोध कराने वाले हरेक तत्व से उन्हें अलग कर दिया। उनके हाथ में बाइबिल थमा दिया गया। उनके नेटिव्स के आस्तित्व को ही समाप्त करने की साजिश रची गयी जिसमें एक हद तक उन्हें सफलता भी मिली।बाद के काल खंड में जो हुआ उसे याद कर दुनिया सिहर उठती है। रंगभेद और नरसंहार का खेल शायद सबसे पहले यही हुआ था। यूरोप के गोरों के द्धारा अमेरिका में यह खेल किया गया ऐसा नहीं था। पूरी दुनिया में जहां-जहां उन्हें अवसर मिला उन्होंने यही खेल किया। अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में भी ऐसे ही दुष्कृत्य किये गये। गोरे जहां भी गये एक ही प्रकार से अत्याचार का काम किया और हमारे पूर्वज इसके शिकार हुए। अफ्रीका में हमारे पूर्वजों ने इन गोरों का प्रसन्नता पूर्वक स्वागत किया लेकिन इन लोगों ने कुटिल चालचल कर हमारे धर्म और संस्कृति को समाप्त करने की दिशा में चाल चल दी। हमारे पूर्वजों के हाथ में बाइबिल थमा दी। जब तक हम आंख खोलते तब तक हमारी धरती हमारे आकाश और हमारा सब कुछ उनलोगों ने कब्जा कर लिया था। हम प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर पर्वत और पठारों पर सीमित साधनों के साथ निवास कर रहे थे। उनकी कुटिल नजर इस पर भी गयी और हमारे खनिज संपदा को भी जमकर लूट लिया गया। आस्ट्रेलिया के मूल निवासी माबो के साथ ऐसा ही कुछ किया गया। यही कारण था कि यूरोप के मूल निवासी आस्ट्रेलिया के पीएम ने अपने वंशजों के अत्याचार के कार्य पर वर्षो बाद क्षोभ व्यक्त किया। 24 फरवरी को उन्होंने पूरी दुनिया से अपने पूर्वजों द्वारा आदिवासियों पर किये गये अत्याचार के लिये दुनिया से माफी मांगी। अब मीडिया के त्वरित प्रसार के युग में नौ अगस्त का महत्व और उसके पीछे छिपे दर्द का पर्दाफाश हो चुका है और यह सच आदिवासी दिवस पर सभी लोगों को जानना चाहिए। मेरा मानना है कि यह दिन आक्रोस और दुख प्रकट करने का दिन है। इस पर हम खुशी मनाकर इस दिवस की गरिमा और हमारे समाज की पीड़ा को सही ढंग से याद नहीं करते हैं। इतिहास के पन्नों से सच निकाल कर उसका विश्लेषण कर दिया गया है। हमें इस दिन किसी भी हाल में खुशियां नहीं मनानी चाहिए। हमारे देश में 15 नवंबर जो हमारे स्वाभिमानी मूलवासी के आदर्श भगवान बिरसा मुंडा का जन्म दिन और वर्तमान मादी सरकार ने जिसे आदिवासी स्वाभिमान दिवस घोषित किया है उस दिन हमें गर्व और खुशी मनाना चाहिए। यूरोप के गोरों के लिये नौ अगस्त का दिन खुशी का दिन हो सकता है क्योंकि इसी दिन उन्होंने अमेरिका की धरती पर पैर रखा था लेकिन विश्व भर के मूलवासियों के लिये यह पीड़ा का दिन है। यूरोपीय देश नये नये नरेटिव पैदा कर उसे पूरी दुनिया में फैलाने के लिये तत्पर है और वे उसमें सफल भी हो जाते हैं। उनके द्वारा पोषित एजेन्सियां भारत में विभिन्न संगठनों के माध्यम से अपने एजेंडा को पूरे देश में लागू कर भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है। इनका काम जनजातिय संगठन को तोड़ मरोड़ कर अपने आप को स्थापित करना है। विश्व आदिवासी दिवस के नाम पर ऐसे संगठन विगत चार दशकों से सक्रिय हैं। यूरोप और दुनिया के विभिन्न देशों से धन प्राप्त कर अपनी कुत्सित दुकानदारी चलाने वाले इन संगठनोंने ही आदिवासी दिवस को प्रायोजित किया है। आखिर आदिवासी यातना के इस बुरे दिन नौ अगस्त को आदिवासी दिवस मनाने के पीछे क्या तर्क है? देश के भोले और सरल आदिवासी समुदाय और समाज इनके गलत चालों का अनजाने में शिकार हो गया है और कथित आदिवासी दिवस के नाम पर इतराता, इठलाता, झूमता अपने सभ्यता की बर्बादी के दिवस की तारीख नौ अगस्त में अपना अस्तित्व और पहचान तलाश रहा है। यह गंभीर चिंतन का विषय है। (लेखक पूर्व विधायक गुमला विस सह अध्यक्ष जनजातीय मोर्चा झारखंड हैं।)
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