झारखण्ड के जननायक साबित हो सकते हैं टाइगर जयराम महतो

 

  • डुमरी प्रकरण-विधायिका बनाम कार्यपालिका नहीं, सत्ता बनाम जनआक्रोश है
  • झारखण्ड के जननायक साबित हो सकते हैं टाइगर जयराम महतो

गौतम कुमार पटेल

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। डुमरी विधायक टाइगर जयराम महतो और बरबड्डा थाना प्रभारी का प्रकरण आज झारखंड में सुर्खियों में है। सतह पर यह एक विधायक और एक थानेदार के बीच की तकरार दिखती है, लेकिन इसके पीछे का सच कहीं ज्यादा गहरा है। सवाल यह नहीं है कि जयराम महतो झारखंड के सबसे बिगड़ैल विधायक हैं जो हर किसी से बहस करते हैं।

सवाल यह है कि क्या आज से पहले झारखंड के विधायकों ने थाना प्रभारियों की खरी-खोटी नहीं सुनाई है? हर दिन किसी न किसी थाने में जनता व उनके कार्यकर्ताओं को अपमानित किया जाता है, 26 वर्षों के झारखण्ड में आज तक प्रशासनिक व्यवस्था इतनी बेलगाम है कि राज्य के किसी भी विधानसभा क्षेत्र में रोज किसी न किसी जनप्रतिनिधि का अपमान होता है, पर कभी ऐसा बवंडर नहीं उठा। फिर इस बार क्यों?

सरकार जिस एमएमडीआर बिल का विरोध कर रही है, वहीं पलामू जिले में 7 वर्षों से बालू का टेंडर नहीं हुआ है, लेकिन अवैध बालू और पत्थर की ढुलाई से पलामू में पदस्थापित प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी जबरन वसूली करते हैं, यह बात पलामू के सभी माननीय विधायकों को पता है। कुछ दिन पूर्व तो राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर, पुलिस से नाराज होकर स्वयं पत्थर लदे ट्रक और ट्रैक्टर को पकड़ने लगे। 

क्या यह पुलिसिंग व्यवस्था पर सवाल या फिर सरकार की विफलता को नहीं दर्शाता हैं? लेकिन राज्य की खराब पुलिसिंग पर सवाल उठाना एक विधायक के लिए इतना बड़ा तूल पकड़ सकता है? यह बड़ा सवाल हैं? सच में क्या? जयराम महतो के पुलिस से माफी मांग लेने भर से राज्य की पुलिसिंग व प्रशासनिक अव्यवस्था में सुधार हो जाएगा और जनता की मूल भावनाओं को सम्मान मिलना शुरू हो जाएगा, या फिर पुलिस को जयराम महतो से माफी मांगने से कानून-व्यवस्था में सुधारात्मक डर पैदा होगा, यह तय करना किसकी जवाबदेह का काम है ?

इसका उत्तर छात्र आंदोलन में छिपा है। राज्य में परीक्षा रिफॉर्म मंच, रविन्द्र पासवान, कुणाल सिंह, देवेंद्र नाथ महतो जैसे सैकड़ों छात्र नेताओं ने सरकार की नींद उड़ा रखी है। सरकार पुलिस के बल पर उन्हें किसी न किसी केस में फंसा सकती है, लेकिन एक निर्वाचित विधायक को कैसे फंसाए? खासकर तब, जब पूरे राज्य में राम और जय राम की लहर हो और युवाओं में जयराम की लोकप्रियता मुख्यमंत्री के कद को बौना साबित कर रही हैं। 

इसकी कलांतर में जब जाएंगे तो देखिए राज्य में कुड़मी रेल टेका जो बंगाल से लेकर झारखण्ड उड़ीसा तीन राज्यों से जुड़ा था, जिसमे भाजपा, कांग्रेस, झामुमो, आजसू, तृणमूल आदि राजनीतिक पार्टियों के महतो लीडर शामिल हुए लेकिन आंदोलन में केवल जयराम महतो और उनकी पार्टी जेएलकेएम को बदनाम किया गया। जेएसएससी, जेपीएससी आंदोलन या भाषा आंदोलन, डोमेसाइल 1932 हो या फिर खनिज संपदा, जमीन की आंदोलन हर आंदोलन में बिना जय राम के ना लिए बिना किसी मीडिया या नेता का राम राम नही होता। 

विधानसभा सत्र में सबसे ज्यादा जनमुद्दों को धरातल पर बहस करना हो या फिर राज्य में राजनीतिक हलचल में सियासी दाव पेच या फिर शोशल मीडिया को फ्लॉर्स सब्सक्रिप्शन बढ़ाना हो सभी जगहों पर जय राम ही आते है। यह पूरी घटना सरकार की बौखलाहट का नतीजा है। सरकार को पता है कि आज का जयराम महतो कल मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो सकता है। इसलिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत इस विवाद को हवा दी जा रही है। 

सबसे बड़ा सवाल एफआईआर पर है। विधायक पर बीएनएस की संगीन धाराएं - सरकारी काम में बाधा, जबरन धमकी, सरकारी सेवक को धमकाना - लगा दी गईं, जबकि बात केवल मोबाइल फोन पर हुई थी। यदि मामला इतना ही गंभीर था तो विधानसभा अध्यक्ष ने चार दिन तक चुप्पी क्यों साधे रखी? बाद में सिर्फ इतना कह दिया कि संयम बरतना चाहिए। क्या दो बार अध्यक्ष रह चुके अनुभवी नेता का यह दायित्व नहीं था कि वे पुलिस को विधायी प्रोटोकॉल समझाते? और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की चुप्पी सबसे ज्यादा सवाल खड़े करती है।

विपक्ष के कई विधायक और कई दलों ने वैचारिक मतभेद के बावजूद जयराम का समर्थन किया, लेकिन राज्य के मुखिया ने अब तक मुंह नहीं खोला। बल्कि पुलिस एजेंसियों को अंदर ही अंदर इस आग को भड़काने के लिए छोड़ दिया गया है।यह लड़ाई विधायक बनाम थानेदार की नहीं है। यह लड़ाई उस पुलिसिंग व्यवस्था की विफलता को छिपाने की है, जिस पर खुद जनता का भरोसा उठ चुका है। जयराम महतो आज जननायक की भूमिका में खड़े हैं और यही बात सत्ता को चुभ रही है। (नोट:- लेखक एक स्थानीय पत्रकार हैं, यह उनके निजी विचार हैं।) 

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