शिक्षा और स्थानीय ज्ञान से ही संभव है मलेरिया उन्मूलन

 

  • शिक्षा और स्थानीय ज्ञान से ही संभव है मलेरिया उन्मूलन
  • विश्व मलेरिया दिवस (25 अप्रैल) विशेष 

डॉ. दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 25 अप्रैल को पूरी दुनिया विश्व मलेरिया दिवस के रूप में मनाती है। यह दिन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को सदियों से चुनौती देती आ रही एक घातक बीमारी मलेरिया के विरुद्ध वैश्विक संकल्प का प्रतीक है। 

वर्ष 2007 में वर्ल्ड हेल्थ आॅगेर्नाइजेशन द्वारा इसकी शुरुआत की गयी थी, ताकि दुनिया भर में इस बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ायी जा सके और इसके उन्मूलन की दिशा में ठोस प्रयास किये जा सकें। मलेरिया, प्लाज्मोडियम नामक परजीवी से फैलने वाली बीमारी है, जो मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से मनुष्य के शरीर में प्रवेश करती है। आज भी यह बीमारी दुनिया के कई विकासशील देशों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है। 

ताजा वैश्विक आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष लगभग 20-25 करोड़ लोग मलेरिया से संक्रमित होते हैं, करीब 6 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो जाती है। इनमें अधिकतर अफ्रीका और दक्षिण एशिया के गरीब और ग्रामीण क्षेत्र प्रभावित होते हैं। भारत की स्थिति पर नजर डालें तो पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। भारत ने मलेरिया के मामलों में बड़ी गिरावट दर्ज की है, लेकिन अभी भी देश पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

भारत ने राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम  के माध्यम से मलेरिया नियंत्रण में महत्वपूर्ण प्रगति की है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक मलेरिया उन्मूलन का है। फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं, दूर-दराज ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र। स्वच्छ जल और स्वच्छता की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच, जागरूकता का अभाव। बात अगर हम झारखंड की करें तो झारखंड जैसे राज्य में मलेरिया एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में उपस्थित है। 

इसके पीछे कई कारण हैं, घने जंगल और आर्द्र जलवायु, आदिवासी बहुल क्षेत्र, जहां स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं। जलभराव और साफ-सफाई की कमी। राज्य के कई जिले जैसे सिमडेगा, गुमला, गोड्डा, लातेहार और पश्चिमी सिंहभूम मलेरिया के हॉटस्पॉट माने जाते रहे हैं। हालांकि, राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग द्वारा किये गये प्रयासों से स्थिति में सुधार आया है जैसे मच्छरदानी का वितरण, आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर जांच। 

इसके बावजूद भी अगर नियमित फॉगिंग और दवा छिड़काव चाहे गांव हो या शहर होता रहे तो इस ओर बहुत सुधार हो सकेगा। फिर भी, हर वर्ष झारखंड में सैकड़ों लोगों की जान इस बीमारी के कारण चली जाती है जो इस बात का संकेत है कि अभी और सतत प्रयास आवश्यक हैं फाइलों में नहीं धरातल पर। मलेरिया कोई नई बीमारी नहीं है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है आयुर्वेद में इसे विषम ज्वर कहा गया है। 

चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में इसके लक्षण और उपचार का वर्णन मिलता है। झारखंड की आदिवासी संस्कृति में भी प्राकृतिक उपायों का उल्लेख मिलता है। नीम, तुलसी, गिलोय जैसी औषधियों का प्रयोग घरों के आसपास धुआं करके मच्छरों को भगाना, जल स्रोतों को साफ रखना ये पारंपरिक उपाय आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन आधुनिक चिकित्सा के साथ इनका समन्वय आवश्यक है। 

बचाव ही सबसे बड़ा उपचार है। मलेरिया का सबसे प्रभावी इलाज उसका बचाव है, व्यक्तिगत स्तर पर मच्छरदानी का नियमित उपयोग, पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना, घर के आसपास पानी जमा न होने देना, समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना, सामुदायिक स्तर पर स्वच्छता अभियान चलाना। जल निकासी की उचित व्यवस्था करना। 

नियमित सरकार द्वारा गली, मोहल्लों, गांवों, शहरों में फॉगिंग होना अति आवश्यक है। यदि मलेरिया को जड़ से समाप्त करना है, तो शिक्षा को केंद्र में रखना होगा। स्कूल और कॉलेज एवं किसी भी प्रकार की शिक्षण संस्थाओं की भूमिका तय करनी होगी। पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य शिक्षा को शामिल करना, मलेरिया जागरूकता सप्ताह का आयोजन करना। नाटक, पोस्टर, रैली और नुक्कड़ नाटक के माध्यम से रोकथाम के लिए प्रचार प्रसार करना। 

मलेरिया से लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी है। विविध प्रकार से जागरूकता फैलाने के उपाय ढूंढ़ा जा सकता है जैसे पंचायत स्तर पर बैठकें हो, सोशल मीडिया और रेडियो का उपयोग करके, स्थानीय भाषा और लोक कला के माध्यम से संदेश फैलाकर। मलेरिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि यह हमारे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक ढांचे की परीक्षा है। 

यदि हम इसे हराना चाहते हैं, तो हमें सरकार, समाज, शिक्षा और संस्कृति सभी को एक साथ जोड़ना होगा। विश्व मलेरिया दिवस हमें यह याद दिलाता है कि स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। झारखंड जैसे राज्यों में यदि हम स्थानीय परंपराओं, आधुनिक चिकित्सा और शिक्षा को एक सूत्र में पिरो दें, तो वह दिन दूर नहीं जब मलेरिया केवल इतिहास का एक अध्याय बनकर रह जायेगा। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर, सांस्कृतिक शोधकर्ता और रंगनिर्देशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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