युद्ध नहीं, धरती के संरक्षण का संकल्प

 

विश्व पृथ्वी दिवस के उपलक्ष में

युद्ध नहीं, धरती के संरक्षण का संकल्प

डॉ. दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं है, बल्कि यह हमारी चेतना को जगाने का दिन है, यह याद दिलाने का दिन है कि यह पृथ्वी ही हमारा एकमात्र घर है। आज जब पूरी दुनिया तकनीकी प्रगति और विकास की दौड़ में आगे बढ़ रही है, उसी समय युद्ध, संघर्ष और पर्यावरणीय विनाश की भयावह छाया भी इस धरती को लगातार कमजोर कर रही है।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में युद्धों की विभीषिका केवल मानव जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को गहरी चोट पहुँचा रही है। बमों की गूंज, रासायनिक हथियारों का उपयोग, जंगलों का विनाश, जल स्रोतों का प्रदूषण ये सब मिलकर पृथ्वी को एक असंतुलित और असुरक्षित स्थिति में धकेल रहे हैं। युद्ध का प्रभाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर हवा, पानी, मिट्टी, पशु-पक्षियों और आने वाली पीढ़ियों तक फैलता है।

भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को माता का दर्जा दिया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने सदैव प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की प्रेरणा दी। पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और जीव-जंतुओं को पूजनीय माना गया। लेकिन आधुनिकता के अंधाधुंध विस्तार और उपभोगवादी मानसिकता ने इस संतुलन को तोड़ दिया है। आज मनुष्य विकास के नाम पर जंगल काट रहा है, नदियों को प्रदूषित कर रहा है और जीव-जंतुओं के अस्तित्व को खतरे में डाल रहा है। युद्ध इस विनाश को और तेज कर देता है।

युद्ध केवल राजनीतिक या सामरिक मुद्दा नहीं है, यह पर्यावरणीय संकट का भी सबसे बड़ा कारण है। युद्ध के दौरान भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है, जिससे जलवायु परिवर्तन तेज होता है। रासायनिक और परमाणु हथियारों से मिट्टी और जल स्रोत लंबे समय तक प्रदूषित रहते हैं। लाखों पशु-पक्षी और वन्यजीव अपने आवास खो देते हैं। खेत-खलिहान बंजर हो जाते हैं, जिससे खाद्य संकट उत्पन्न होता है। इस प्रकार युद्ध, मानव और प्रकृति दोनों के लिए विनाशकारी है। 

पृथ्वी केवल मनुष्यों की नहीं है। यह पक्षियों की उड़ान, पशुओं के जीवन, कीट-पतंगों की गतिविधियों और जलचर जीवों का भी घर है। जब जंगल कटते हैं, तो पक्षियों का बसेरा खत्म होता है। जब नदियाँ प्रदूषित होती हैं, तो मछलियाँ मरती हैं। जब हवा जहरीली होती है, तो हर जीव प्रभावित होता है। आज जरूरत है कि हम इस समग्र दृष्टिकोण को समझें पृथ्वी का संरक्षण तभी संभव है जब हम सभी जीवों के अधिकारों को स्वीकार करें। पर समाधान क्या किया जाए? 

  1. युद्ध नहीं, शांति का मार्ग : सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है विश्व में शांति की स्थापना। राष्ट्रों को यह समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं की शुरुआत है। संवाद, कूटनीति और सहयोग ही स्थायी समाधान हैं। 
  2. पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी : वृक्षारोपण को जीवन का हिस्सा बनाना होगा। जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना होगा। प्लास्टिक के उपयोग को कम करना होगा। स्वच्छ ऊर्जा (सौर, पवन) को अपनाना होगा। 
  3. पारंपरिक ज्ञान का पुनर्जीवन : हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की कला सिखाई थी। जल स्रोतों का संरक्षण, सामूहिक खेती, प्राकृतिक संसाधनों का सीमित उपयोग इन परंपराओं को फिर से अपनाना होगा।
  4. जन-जागरूकता और शिक्षा : स्कूलों, कॉलेजों और समाज में पर्यावरण शिक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। लोगों को यह समझाना होगा कि छोटी-छोटी आदतें जैसे पानी बचाना, पेड़ लगाना बड़े बदलाव ला सकती हैं। 

जीव-जंतुओं का संरक्षण। वन्यजीवों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाए जाएं। शिकार और अवैध व्यापार पर कड़ी रोक लगे। पक्षियों के लिए जल और भोजन की समुचित व्यवस्था की जाए। विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक सतत जिम्मेदारी का प्रतीक है। यदि हम आज भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियों को एक बंजर, प्रदूषित और असुरक्षित पृथ्वी विरासत में मिलेगी। 

अब समय है कि हम युद्ध की राह छोड़कर शांति और संरक्षण का मार्ग अपनाएं। पृथ्वी हमारी माता है और एक संतान के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी रक्षा करें। आइए, इस पृथ्वी दिवस पर हम संकल्प लें कि न युद्ध करेंगे, न प्रकृति का शोषण करेंगे, बल्कि मिलकर इस धरती को सुरक्षित और समृद्ध बनाएंगे। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंगनिर्देशक, और असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।) 

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