टीम एबीएन, रांची। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री संजय सर्राफ ने कहा है कि भगवान महावीर जयंती जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश और विश्व में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनायी जाती है।
यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को आता है। इस वर्ष यह पावन पर्व 30 मार्च को एवं कई स्थानों में 31 मार्च को मनाया जाएगा। जैन समाज के लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन भगवान महावीर का अवतरण हुआ था, जिन्होंने मानवता को अहिंसा, सत्य और आत्मसंयम का अमूल्य संदेश दिया।
भगवान महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व बिहार वैशाली के कुंडल ग्राम में हुआ था। उनका बचपन का नाम वर्धमान था। राजसी जीवन में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने 30 वर्ष की आयु में सांसारिक सुखों का त्याग कर कठोर तपस्या का मार्ग अपनाया। 12 वर्षों की कठिन साधना के बाद उन्हें कैवल्य ज्ञान (सर्वज्ञान) की प्राप्ति हुई और वे महावीर कहलाए।
उनके उपदेशों ने जैन धर्म को नई दिशा दी और समाज में नैतिकता एवं मानवता की स्थापना की। महावीर जयंती का मुख्य उद्देश्य भगवान महावीर के सिद्धांतों और उनके जीवन दर्शन को जन-जन तक पहुंचाना है। उन्होंने अहिंसा परमो धर्म: का जो संदेश दिया, वह आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। उनका मानना था कि हर जीव में आत्मा होती है और किसी भी जीव को कष्ट पहुंचाना पाप है।
इसके साथ ही उन्होंने सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे पंच महाव्रतों का उपदेश दिया, जो मानव जीवन को संतुलित और शांतिपूर्ण बनाते हैं। इस दिन जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक और शोभायात्राएं निकाली जाती हैं। भगवान महावीर की प्रतिमा को सजाकर नगर भ्रमण कराया जाता है और उनके उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया जाता है।
भक्तजन दान-पुण्य, जीव दया और सेवा कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। गरीबों को भोजन, वस्त्र और दवाइयां वितरित की जाती हैं, जो इस पर्व की सामाजिक महत्ता को भी दर्शाता है। भगवान महावीर की गाथा केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत प्रेरणादायक है। उन्होंने जाति, वर्ग और भेदभाव से ऊपर उठकर समानता, सहिष्णुता और प्रेम का संदेश दिया।
उनके विचार आज के आधुनिक समाज में शांति, सद्भाव और नैतिकता की स्थापना के लिए मार्गदर्शक हैं। अत: महावीर जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और मानवता के उत्थान का पर्व है। यह हमें सिखाती है कि सच्चा धर्म वही है, जो दूसरों के प्रति करुणा, सहानुभूति और अहिंसा का भाव रखे। भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपनाकर ही हम एक बेहतर और शांतिपूर्ण समाज की स्थापना कर सकते हैं।
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