संवैधानिक दबावों के बीच उपराष्ट्रपति चुनाव

 

एनके मुरलीधर 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत के लोकतंत्र की संरचना संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती पर टिकी हुई है। ये संस्थाएं न केवल शासन के संचालन के लिए आवश्यक हैं, बल्कि वे लोकतंत्र के मूल्यों और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का भी अभिन्न हिस्सा हैं। आज जब हम 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव की ओर देख रहे हैं, तो यह चुनाव केवल एक औपचारिक प्रक्रिया से कहीं अधिक, हमारे संवैधानिक तंत्र की परीक्षा बन गया है। क्योंकि देश की संवैधानिक संस्थाओं पर जो राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है, वह लोकतंत्र की आत्मा को चुनौती दे रहा है। 

संविधान के निर्माताओं ने भारत के संवैधानिक ढांचे में एक सशक्त और स्वतंत्र संस्थागत तंत्र स्थापित करने का विशेष ध्यान रखा था। यह तंत्र सुनिश्चित करता है कि लोकतंत्र का संचालन केवल राजनीतिक दलों या सत्ता समूहों की मनमानी पर निर्भर न रहे, बल्कि संविधान के अनुशासन और मयार्दाओं के भीतर हो। इसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता, राज्यपालों और अन्य संवैधानिक पदों की निष्पक्षता शामिल है। परंतु समय के साथ यह देखा गया है कि ये संस्थाएं राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं रह पाईं हैं। 

यह राजनीतिक दबाव कभी स्पष्ट रूप से और कभी छिपकर सामने आता है। राजनीतिक दबाव की शुरुआत सबसे पहले संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रियाओं में दिखाई देती है। संवैधानिक पदों पर नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी, राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं का प्रभाव, और कभी-कभी सीधे राजनीतिक गठजोड़ के कारण ये संस्थाएं उस स्वायत्तता से काम नहीं कर पातीं, जिसकी आवश्यकता लोकतंत्र के लिए होती है। न्यायपालिका का उदाहरण लें, तो जहां एक ओर उसकी भूमिका संविधान की अंतिम प्रहरी के रूप में है, वहीं कुछ हालिया घटनाओं में नियुक्ति प्रक्रियाओं और महत्वपूर्ण फैसलों के संदर्भ में राजनीतिक संकेतों ने इस स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। 

यह वह संवेदनशील विषय है जो बार-बार लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बजाता है। इसी प्रकार निर्वाचन आयोग की स्थिति भी चिंता का विषय रही है। निर्वाचन आयोग, जो देश में चुनावों की निष्पक्षता की गारंटी देता है, ने कई अवसरों पर अपने निर्णयों में विलंब, पक्षपात या राजनीतिक दलों के प्रति असंतुलित रवैया दिखाने के आरोप झेले हैं। राजनीतिक दलों के दबाव में आकर आयोग के निर्णयों की आलोचना जनता के बीच विश्वास की कमी पैदा करती है। लोकतंत्र का मूल आधार यदि चुनाव प्रक्रिया पर सार्वजनिक भरोसा कम हो जाये, तो उसकी नींव डगमगा जाती है।राज्यपालों के मामले में भी राजनीतिक दबाव की छाया स्पष्ट देखी जा सकती है। 

संवैधानिक पद के रूप में राज्यपालों को केंद्र और राज्य के बीच संतुलन बनाए रखना होता है, लेकिन कई बार यह पद सत्ता पक्ष के हितों की रक्षा के लिए एक राजनीतिक हथियार बन जाता है। विधानसभा सत्र बुलाने में विलंब, बहुमत साबित करने की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी, और राजनीतिक दलों के दबाव में हस्तक्षेप जैसी घटनाएं इसे प्रमाणित करती हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के तंत्र में असंतुलन उत्पन्न करती है और संवैधानिक मयार्दाओं को कमजोर करती है। इन सभी संदर्भों में उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 विशेष महत्व रखता है। 

उपराष्ट्रपति पद न केवल राज्यसभा के सभापति का पद है, बल्कि वे राष्ट्रपति की अनुपस्थिति या असमर्थता में देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का कार्यभार भी संभालते हैं। यह पद संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की गरिमा का एक प्रतीक है। इसलिए इसका चुनाव एक गहन राजनीतिक और संवैधानिक चुनौती बन गया है। इस चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य मतदान करते हैं, और गुप्त मतदान की प्रक्रिया के बावजूद दलगत राजनीति का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। 

राजनीतिक दल अपने सदस्यों को आदेश देते हैं, जो उनकी पार्टी की नीति के साथ चलने के लिए बाध्य करते हैं। यह व्यवस्था संसद सदस्यों की स्वतंत्र निर्णय क्षमता को सीमित करती है और संवैधानिक पदों की गरिमा को प्रभावित करती है। लोकतंत्र का उद्देश्य केवल सत्ता की पीठ थपथपाना नहीं है, बल्कि निर्णयों में स्वतंत्रता और संविधान के प्रति निष्ठा होनी चाहिए।2025 के इस उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी दल भी एक संयुक्त उम्मीदवार पेश कर सकता है, जो राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर संविधान की रक्षा और लोकतांत्रिक आदर्शों की सेवा करने का वचन देता है।

दूसरी ओर सत्ताधारी दल अपने उम्मीदवार के पक्ष में पूर्ण बहुमत का उपयोग करता नजर आता है। इस परिदृश्य में यह चुनाव केवल एक पद के चयन का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह राजनीतिक संस्कृति, संवैधानिक मयार्दाओं और लोकतंत्र की दिशा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। यदि संवैधानिक पदों पर राजनीति हावी हो जाती है, तो देश के संवैधानिक तंत्र की विश्वसनीयता खत्म होने लगती है। लोकतंत्र की आत्मा संविधान और उसके तंत्रों की स्वतंत्रता में निहित है। उपराष्ट्रपति चुनाव जैसे संवेदनशील अवसरों पर यदि राजनीतिक दबाव अधिक हो, तो यह केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव पर चोट होगी। 

देश के संवैधानिक संस्थान कमजोर होंगे, निर्णयों में पारदर्शिता और निष्पक्षता का अभाव होगा, और जनता का विश्वास लोकतंत्र से कम होने लगेगा। ऐसे में इस चुनाव में पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक मयार्दाओं का सख्ती से पालन अनिवार्य हो जाता है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे इस पद को सत्ता के साधन के रूप में न देखें, बल्कि उसे लोकतंत्र के रक्षक के रूप में स्वीकार करें। उपराष्ट्रपति का कार्यभार उन लोगों को सौंपा जाना चाहिए जो संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को समझें और उसे बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध हों। 

इस संघर्ष में नागरिक समाज, मीडिया और जनता की भूमिका अहम होती जा रही है। जब तक जनता संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और गरिमा के प्रति जागरूक नहीं होगी, तब तक राजनीतिक दल इस पर दबाव बनाए रखेंगे। समाचार माध्यमों को चाहिए कि वह केवल समाचार न प्रस्तुत करे, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के साथ हो रहे अन्याय और राजनीतिक हस्तक्षेप को उजागर करके लोकतांत्रिक चेतना को मजबूत करे। जनता की सजगता ही अंतत: संवैधानिक संस्थाओं को बचा सकती है। 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव में इसीलिए न केवल राजनीतिक दलों के बीच टक्कर है, बल्कि संवैधानिक मयार्दाओं और लोकतंत्र की आत्मा के संरक्षण की लड़ाई है। 

यह चुनाव दर्शाएगा कि क्या भारत के लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाएं अपने कर्तव्यों को स्वतंत्र रूप से पूरा कर सकेंगी, या वे राजनीतिक दबावों के कारण कमजोर पड़ जाएंगी। संविधान के मूल उद्देश्यों और लोकतंत्र की सर्वोच्चता के लिए यह आवश्यक है कि इस चुनाव को राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाये। यह केवल एक व्यक्ति का चयन नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक आदर्श का चयन है। यदि हम इस अवसर को खो देते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह एक दुर्भाग्यपूर्ण युग का आरंभ होगा जब संवैधानिक संस्थाएं केवल सत्ता के अधीनस्थ ही रहेंगी। 

इसलिए देश की राजनीतिक शक्ति, नागरिक समाज, और समाचार माध्यमों को मिलकर इस चुनाव को स्वतंत्र, निष्पक्ष और संवैधानिक मयार्दाओं के अनुरूप संपन्न कराने के लिए काम करना होगा। तभी भारत का लोकतंत्र अपने मूल स्वरूप में जीवित और मजबूत रह सकेगा। (लेखक एबीएन के प्रधान संपादक हैं।)

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