गणगौर पर्व आस्था और श्रद्धा का अद्भुत संगम

 

  • गणगौर पर्व भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का एक अद्भुत उदाहरण : संजय सर्राफ

टीम एबीएन, रांची। रांची जिला मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में आस्था का पर्व गणगौर पर्व विशेष महत्व है। गणगौर व्रत चैत माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष 1 अप्रैल को गणगौर पर्व मनाया जायेगा। 

गणगौर शब्द गण और गौर दो शब्दों से मिलकर बना है। जहां गण का अर्थ शिव और गौर का अर्थ माता पार्वती से है। दरअसल, गणगौर पूजा शिव-पार्वती को समर्पित है। इसलिए इस दिन महिलाओं द्वारा भगवान शिव और माता पार्वती की मिट्टी की मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा की जाती है। 

इसे गौरी तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से महिलाओं को अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। भगवान शिव जैसा पति प्राप्त करने के लिए अविवाहित कन्याएं भी यह व्रत करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव के साथ सुहागन महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देने के लिए भ्रमण करती हैं। 

महिलाएं परिवार में सुख-समृद्धि और सुहाग की रक्षा की कामना करते हुए पूजा करती हैं। गणगौर का त्यौहार फाल्गुन माह की पूर्णिमा (होली) के दिन से शुरू होता है, जो अगले 17 दिनों तक चलता है। तथा हर रोज भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति बनाई जाती है और पूजा व गीत गाये जाते हैं।

इसके बाद चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके व्रत और पूजा करती हैं और शाम के समय गणगौर की कथा सुनते हैं। तथा गणगौर की मूर्तियों का नदी व तालाबों में पूरे विधि विधान से विसर्जन करती है।यह पर्व खासकर महिलाओं के लिए अत्यधिक महत्व रखता है और पूरे देश में बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। 

गणगौर पर्व का मुख्य उद्देश्य गोर या पार्वती जी की पूजा करना है, जो अपने पति भगवान शिव के साथ संपूर्ण विश्व के पालनहार माने जाते हैं। इस दिन महिलाएं विशेष रूप से अपने पति के स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए व्रत करती हैं। साथ ही वे अपने परिवार की खुशहाली और खुशियों की कामना भी करती हैं। 

इस पर्व का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष गणराज यानी भगवान गणेश की पूजा है, जो इस दिन आशीर्वाद देने के लिए पूजे जाते हैं। गणगौर पूजा की शुरुआत महिलाएं घरों में ईश्वर की मूर्तियां स्थापित करके करती हैं। महिलाएं विशेष रूप से इस दिन रंग-बिरंगे वस्त्र पहनती हैं और पूजा की सामग्री जैसे- दूब, फल, फूल, पानी, व्रत सामग्री आदि तैयार करती हैं। 

पूजा के दौरान, महिलाएं गाने-गाने और नृत्य करते हुए गणगौर की मूर्तियों को सजाती हैं। इस दिन खासकर महिलाएं अपने पति के नाम से व्रत रखकर उनका कल्याण करने की प्रार्थना करती हैं। गणगौर के व्रत में महिलाओं को सुहागिन होने का विशेष महत्व होता है। गणगौर पर्व राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर का एक अहम हिस्सा है। 

मारवाड़ी समाज की महिलाएं इस पर्व को अपनी पारंपरिक वेशभूषा में मनाते हैं। महिलाएं अपने हाथों में रंग-बिरंगे चूड़ियां एवं मेहंदी, झुमके और गहने पहनकर इस पर्व को बहुत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाती हैं। गणगौर पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह समाज में महिलाओं की स्थिति को भी दर्शाता है। 

यह पर्व महिलाओं को अपनी आस्था, समर्पण और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निभाने की प्रेरणा देता है। वहीं, समाज में आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देता है। इस दिन महिलाएं न सिर्फ अपने घर-परिवार के लिए प्रार्थना करती हैं, बल्कि एक-दूसरे के साथ मिलकर खुशी और सुख-संपत्ति की कामना करती हैं। 

गणगौर पर्व भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का एक अद्भुत उदाहरण है, जो हमें जीवन में आस्था, प्रेम, और सौहार्द की महत्वपूर्ण बातें सिखाता है। यह पर्व महिलाओं के लिए विशेष रूप से अपनी आस्था और समर्पण को प्रकट करने का एक अवसर प्रदान करता है। गणगौर की पूजा और परंपराएं न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह भारतीय समाज में सांस्कृतिक एकता और सामाजिक सौहार्द बढ़ाने में भी योगदान देती हैं।

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