रंगमंच के बिना जीवन अधूरा

 

विश्व रंगमंच दिवस विशेष 27 मार्च पर विशेष 

डॉ दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। विश्व रंगमंच दिवस हर वर्ष 27 मार्च को मनाया जाता है। यह दिवस रंगमंच की महत्ता, उसकी सामाजिक भूमिका और सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित करने के लिए समर्पित है। रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि यह समाज को आईना दिखाने, विचारों को प्रकट करने और बदलाव लाने का एक प्रभावी माध्यम है। 

विश्व रंगमंच दिवस की शुरुआत 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट द्वारा की गयी थी। इसका उद्देश्य रंगमंच को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देना और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना था। हर वर्ष इस दिन विश्व प्रसिद्ध रंगकर्मी एक संदेश देते हैं, जिसमें रंगमंच की भूमिका और उसकी दिशा पर विचार किया जाता है। 

इस वर्ष 2025 में रंगमंच ने सामाजिक और डिजिटल परिवर्तन के साथ अपने स्वरूप को और अधिक समृद्ध किया है। कई नये नाटक एवं प्रयोगात्मक प्रस्तुतियां आई हैं जो समाज के ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रित हैं। विशेष रूप से पर्यावरण, युवा सशक्तिकरण, डिजिटल तकनीक और पारंपरिक रंगमंच का मिश्रण देखने को मिला है। 

रंगमंच केवल एक कला नहीं, बल्कि जीवन को देखने का एक दृष्टिकोण भी है। यह व्यक्ति के आत्मविश्वास, संवाद कौशल, भावनात्मक अभिव्यक्ति और सहानुभूति को विकसित करता है। यह समाज को विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों को समझने में मदद करता है। अब सवाल यह है कि युवा पीढ़ी को रंगमंच से क्यों जुड़ना चाहिए? सृजनात्मकता एवं आत्म-अभिव्यक्ति झ्र रंगमंच युवाओं को अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने का अवसर देता है। 

नेतृत्व और टीम वर्क झ्र एक नाटक को प्रस्तुत करने के लिए टीम भावना आवश्यक होती है, जिससे नेतृत्व क्षमता विकसित होती है। सामाजिक जागरूकता : रंगमंच के माध्यम से युवा विभिन्न सामाजिक मुद्दों से परिचित होते हैं और उनका समाधान खोजने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। संवाद कौशल एवं आत्मविश्वास झ्र अभिनय से संवाद कौशल में सुधार होता है, जो किसी भी पेशे में आवश्यक होता है। 

दूसरा सवाल है कि समाज में रंगमंच का दायित्व और सुधार की क्या संभावनाएं हैं, तो बताना चाहुंगा कि रंगमंच समाज में नैतिकता, करुणा और न्याय जैसे मूल्यों को बढ़ावा देता है। यह न केवल मनोरंजन बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी माध्यम है। शिक्षा में सुधार झ्र नाटकों को शिक्षा प्रणाली में जोड़ने से बच्चों की कल्पनाशीलता और सोचने की क्षमता में वृद्धि होगी। समाज में सकारात्मक बदलाव झ्र नाटक जातिवाद, भेदभाव, हिंसा और अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता फैलाने का एक सशक्त साधन हो सकता है। 

संस्कृति का संरक्षण झ्र पारंपरिक रंगमंच की विधाओं जैसे रामलीला, नौटंकी, कठपुतली, यक्षगान, कुचिपुड़ी, नाचा, छाउ, लौंडा नाच, भवाई जैसे लोकनाट्यों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। हमारे धर्मग्रंथों में भी रंगमंच और नाटक की महत्ता को स्वीकार किया गया है। महाभारत में यक्ष प्रश्न के संवाद और कई घटनाएं नाटकीयता से भरी हैं, जो जीवन के गहरे संदेश देती हैं। भगवद गीता स्वयं श्रीकृष्ण का एक महान संवाद-नाट्य है, जिसमें उन्होंने अर्जुन को धर्म और कर्म का बोध कराया। 

रामायण में रामलीला, जो आज भी भारत में प्रचलित है, रंगमंच का एक प्रमुख उदाहरण है। नाट्य शास्त्र (भरत मुनि द्वारा रचित) को रंगमंच का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है, जिसमें अभिनय, मंच सज्जा और नाट्य संरचना के नियम बताए गए हैं। राष्ट्र निर्माण में भी रंगमंच का बहुत बड़ा योगदान है। रंगमंच समाज और राष्ट्र के निर्माण में अहम भूमिका निभा सकता है। देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता झ्र नाटक स्वतंत्रता संग्राम, भारतीय संस्कृति और देशभक्ति की भावना को उजागर कर सकते हैं। 

शिक्षा और सामाजिक सुधार झ्र बाल विवाह, भ्रष्टाचार, पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर नाटक जागरूकता फैलाने का कार्य कर सकते हैं। नवाचार एवं रोजगार झ्र रंगमंच के क्षेत्र में न केवल कलाकार बल्कि तकनीशियन, लेखक, निर्देशक, संगीतकार आदि के लिए भी रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। तीसरा सवाल युवाओं को रंगमंच से कैसे जोड़ा जाये? विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों  में नाट्य विभाग की स्थापना एवं नाट्य मंचन अनिवार्य करना चाहिए। 

सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों द्वारा नाट्य कार्यशालाओं का आयोजन। लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रंगमंच के कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार। राज्य सरकारों को स्थानीय प्रशिक्षित कलाकारों एवं लोक कलाकारों को मंच और अवसर प्रदान कराने की पहल करनी चाहिए। रंगमंच सिर्फ एक मंच नहीं, यह जीवन का प्रतिबिंब है। भारतीय रंगमंच का प्राचीनतम और सर्वाधिक प्रतिष्ठित ग्रंथ नाट्यशास्त्र को माना जाता है। इसमें रंगमंच, अभिनय, नाट्य संरचना, रस, भाव और मंच-सज्जा के विभिन्न पहलुओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। 

इसमें कई बहुमूल्य श्लोक हैं जो रंगमंच की महत्ता को दशार्ते हैं। नाट्यशास्त्र में उद्धृत एक श्लोक से उद्देश्य और महत्व के बारे में बताया गया है कि न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न स कला। नासौ योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन यन्न दृश्यते॥ (नाट्यशास्त्र, अध्याय 1, श्लोक 116) अर्थात नाट्य में ऐसा कोई ज्ञान, कला, शिल्प, विद्या, योग या कर्म नहीं है जो इसमें प्रदर्शित न किया गया हो। रंगमंच जीवन के हर पक्ष को समाहित करता है। धर्म्यमर्थ्यं च काम्यं च विविधान्श्चोपदेशकान्। लोकस्य सर्ववृत्तार्थं नाट्यमेतत्करिष्यति॥ 

(नाट्यशास्त्र, अध्याय 1, श्लोक 107) कहा गया है कि नाट्य धर्म, अर्थ, काम और उपदेश से परिपूर्ण होगा तथा यह लोक के समस्त आचरणों को दर्शायेगा। नाट्य का प्रभाव समाज पर क्या पड़ता है इस संदर्भ में नाट्यशास्त्र में जो श्लोक उद्धृत है सहितं गीतेन वादित्रै: पुष्टं व्याख्यानभूषितम्। रम्यं दृष्टिप्रसादं च श्रव्यं च सुखदं तथा॥ (नाट्यशास्त्र, अध्याय 1, श्लोक 125) अर्थात संगीत, वाद्ययंत्रों और संवादों से युक्त नाट्य, दृश्य एवं श्रवण दोनों के लिए आनंददायक होता है और इसे देख-सुनकर मन को प्रसन्नता मिलती है। वहीं रस की उत्पत्ति और प्रभाव के बारे में कहा गया है

विभावानुभावव्यभिचारी संयोगाद्रसनिष्पत्ति:। (नाट्यशास्त्र, अध्याय 6, श्लोक 31) रस की उत्पत्ति विभाव (उत्प्रेरक तत्व), अनुभाव (प्रतिक्रिया) और व्यभिचारी भाव (संवेदनशीलता) के संयोग से होती है। जबकि नाट्य के द्वारा समाज में सुधार लाया जा सकता है जिसका वर्णन नाट्य शास्त्र के इस श्लोक से प्रतिपादित होता है। नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधनम्। (नाट्यशास्त्र, अध्याय 1, श्लोक 112) अर्थात विभिन्न रुचियों वाले लोगों के लिए नाटक एक समान रूप से आनंद देने वाला माध्यम है। यह सभी के लिए है और समाज को एक सूत्र में बांधता है। 

यह विश्व रंगमंच दिवस नाट्यशास्त्र की महत्ता को और अधिक बढ़ा देता है। शास्त्र में लिखित ये श्लोक यह दशार्ते हैं कि रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को शिक्षित करने, संस्कृति को संरक्षित करने और जीवन के विविध रंगों को प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम है। नाट्य को एक समग्र कला के रूप में स्वीकार किया गया है, जो संगीत, नृत्य, अभिनय और संवाद के माध्यम से दर्शकों को रसास्वादन कराता है। रंगमंच केवल कला नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का एक माध्यम है। 

यह एक ऐसा मंच है जो समाज की समस्याओं को उजागर करता है, व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करता है और सामाजिक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विश्व रंगमंच दिवस हमें इस बात का स्मरण कराता है कि रंगमंच के बिना जीवन अधूरा है, क्योंकि यह समाज का प्रतिबिंब है और हमें सोचने, समझने सुधरने और सुधारने की प्रेरणा देता है। (लेखकर रंगकर्मी, निर्देशक सह सहायक आचार्य हैं।) 

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