बाल विवाह रोकने के लिए अंतरधार्मिक फोरम गठन की तैयारी

 

  • भारत से 2030 तक बाल विवाह के खात्मे के लिए धर्मगुरुओं की बैठक
  •  अंतरधार्मिक फोरम गठित करने पर बढ़ी बात


एबीएन सेन्ट्रल डेस्क। देश से बाल विवाह की कुप्रथा के खात्मे के लिए ऐतिहासिक एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए नई दिल्ली में 10 धर्मों व आस्थाओं के 30 प्रमुख धर्मगुरुओं ने एक बैठक की। इसमें 2030 तक देश से बाल विवाह के खात्मे के लिए विभिन्न धर्मों के धर्मगुरुओं का एक राष्ट्रस्तरीय फोरम बनाने की संभावना पर चर्चा की गई। 

बाल विवाह के खात्मे के लिए इन धर्मगुरुओं के प्रभाव का इस्तेमाल कर बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता के प्रसार, स्थानीय, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर कानूनों को लागू करने में सक्रिय सहयोग और इस कुप्रथा के अंत के लिए अंतरधार्मिक सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन (आईसीपी) ने इस बैठक का आयोजन किया था। 

नागरिक समाज संगठनों के नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी संगठन आईसीपी ने इससे पहले चाइल्ड मैरेज फ्री इंडिया अभियान के तहत 22 जुलाई 2024 को एक अंतरधार्मिक संवाद का आयोजन किया था जिसमें 9 धर्मों के धर्मगुरुओं ने हिस्सेदारी की थी। इस बैठक में सर्वसम्मति से तय किया गया कि चूंकि कोई भी धर्म बाल विवाह का समर्थन नहीं करता है, इसलिए किसी भी धर्म के पुरोहित बाल विवाह संपन्न नहीं कराएंगे।  

इसके बाद साल भर से कम समय में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संस्थापक भुवन ऋभु के साथ हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी, ईसाई, यहूदी और बहाई धर्मों के प्रतिनिधियों के अलावा ब्रह्मकुमारी संप्रदाय की प्रतिनिधि ने भी हिस्सा लिया। इस बार की बैठक में बाल विवाह के खात्मे के लिए रणनीतियों व कार्ययोजना पर विस्तार से बातचीत हुई जिसमें धर्मगुरुओं ने इस बात पर प्रकाश डाला कि किस तरह से वे अपने प्रभाव का सकारात्मक इस्तेमाल करते हुए जनमानस की मानसिकता को बदल कर बाल विवाह के खात्मे में मदद कर सकते हैं।

इस संवाद की अहमियत को रेखांकित करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा, सभी धर्मों के धर्मगुरुओं का साथ आना बाल विवाह के खात्मे की दिशा में एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी कदम है। बाल विवाह को किसी भी धार्मिक सत्ता का समर्थन नहीं है। यह अपराध है और अनैतिक है। बाल विवाह बच्चों से बलात्कार है और आस्था, परंपरा या संस्कृति के नाम पर इन बच्चों का शोषण एक गंभीर अपराध है। पिछले साल धर्मगुरुओं की बैठक ने बाल विवाह के खात्मे के खिलाफ लड़ाई की आग को हवा देते हुए इसे एक वैश्विक आंदोलन में तब्दील कर दिया है और अब सिर्फ बाल विवाह मुक्त भारत ही नहीं बल्कि हम बाल विवाह मुक्त विश्व की तरफ बढ़ रहे हैं।

उन्होंने आगे कहा कि समाज और समुदाय के हर व्यक्ति को यह प्रतिबद्धता जतानी होगी कि वह बाल विवाह को बर्दाश्त नहीं करेगा और बाल विवाह नहीं होने देगा। प्रत्येक बाल विवाह की सूचना देनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि इसके लिए धर्मगुरुओं को आगे आना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी धर्मों में शादियां उनके विश्वास के अनुसार तयशुदा जगहों पर ही हों।

इस पहल को समर्थन देते हुए राम कृष्ण मिशन के स्वामी कृपाकरनंद ने कहा, बाल विवाह एक शैतानी प्रथा है जो सभ्यता के प्रारंभ से ही है और पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। यह एक ऐसी समस्या है जो हजारों साल से चली आ रही है और अब इसके समाधान के लिए उस तात्कालिकता के साथ प्रयास किए जा रहे हैं, जो बहुत पहले होने चाहिए थे। समाज और समुदाय के सशक्तीकरण और जागरूकता के प्रसार से ही हम इस घृणित प्रथा को समाप्त कर एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जहां हमारे बच्चों का बचपन पुष्पित-पल्लवित हो सके।

बाल विवाह मुक्त भारत को साकार रूप देने के प्रयासों का पूर्ण समर्थन करते हुए डाइसिस ऑफ फरीदाबाद के आर्क बिशप मार कुरियाकोसे भरानीकुलांगारा बाल विवाह के लिहाज से संवेदनशील संस्कृतियों व समुदायों में जागरूकता के प्रचार-प्रसार की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा, विवाह सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। एक बच्चा माता-पिता की जिम्मेदारी का बोझ नहीं उठा सकता। समुदायों को सशक्त करें, विवाह पंजीकरण अनिवार्य करें और पूरी दुनिया से बाल विवाह के खात्मे के लिए काम करें।

इस मौके पर आल इंडिया इमाम आर्गनाइजेशन के सचिव फैजान मुनीर और मदरसे के प्रिंसिपल मुफ्ती असलम ने बाल विवाह के खिलाफ अभियान को हरसंभव सहयोग व समर्थन का वादा करते हुए कहा कि विवाह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और इस्लाम में बाल विवाह की इजाजत नहीं है। यह संदेश देश के हर समुदाय और हर माता-पिता तक पहुंचना चाहिए ताकि वे बाल विवाह को न मंजूरी दें, न कबूल करें और न इसे प्रोत्साहित करें। 

ओम शांति रिट्रीट की ब्रह्म कुमारी बहन हुसैन ने भी इसी तरह की भावना व्यक्त करते हुए कहा कि समाज में गहरे तक जड़ें जमाए बैठी इस घृणित प्रथा के खात्मे की लड़ाई में धर्म और आस्था की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। सभी धर्मगुरुओं ने तय किया कि राष्ट्रीय फोरम के अलावा क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर भी फोरम गठित किए जाएं ताकि बाल विवाह की ज्यादा दर वाले जिलों और राज्यों में चाइल्ड मैरेज फ्री इंडिया अभियान को जागरूकता अभियानों के जरिए जमीनी स्तर पर पहुंचाया जा सके। 

बताते चलें कि नागरिक समाज संगठनों के देशव्यापी गठबंधन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के 250 से भी ज्यादा सहयोगी संगठन देश के 416 जिलों में मंदिर, मस्जिद व चर्च जैसे पूजास्थलों व अन्य स्थानों पर पोस्टरों व दीवार लेखन के माध्यम से बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता का प्रसार कर रहे हैं। ये गैरसरकारी संगठन बाल विवाह के खिलाफ शपथ दिलाने में स्थानीय धार्मिक नेताओं का भी सहयोग ले रहे हैं जिससे जमीनी स्तर पर अभियान को मजबूती मिली है। इस नेटवर्क ने अब तक देश में 2,50,000 बाल विवाह रुकवाये हैं। 

फोरम की सलाहकार परिषद में बाल अधिकार कार्यकर्ता, अधिवक्ता, सामाजिक कार्यकर्ता व धार्मिक विद्वान शामिल होंगे। यह परिषद कानून व परंपरा से जुड़े मुद्दों पर विशेषज्ञ सलाह देगी, बाल विवाह की रोकथाम के लिए सर्वश्रेष्ठ तरीके साझा करेगी और धार्मिक शिक्षाओं का बाल अधिकारों के संरक्षण से जुड़े कानूनों और मानवाधिकारों के साथ तादाम्य स्थापित करने में मदद करेगी।  

बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में भारत अगली पांत में खड़े देशों में है जिसने इस अपराध के पूरी तरह खात्मे के लिए कई अहम कदम उठाए हैं। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी सगंठन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बाल विवाह की रोकथाम व बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (पीसीएमए), 2006 पर प्रभावी अमल के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किये। अंतरधार्मिक फोरम का प्रस्ताव एक अहम समय में आया है जिससे भारत के संयुक्त राष्ट्र संघ के सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप 2030 तक बाल विवाह के खात्मे की प्रतिबद्धता को मजबूती मिली है।

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