एबीएन एडिटोरियल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग व श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि प्रत्येक 12 वर्षों में आयोजित होने वाला महाकुंभ भारतीय संस्कृति, धार्मिक आस्था और समाज की एक अनुपम धरोहर है। प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करता है।
यह आयोजन हिन्दू धर्म के अनुसार विशेष महत्व रखता है और इसमें भाग लेने वाले लाखों श्रद्धालु अपने पापों का नाश करने के लिए गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम में स्नान करते हैं। महाकुंभ, हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है, जिसमें लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान करने आते हैं।
यह मेला भारत के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों पर आयोजित होता है: प्रयागराज (संगम), हरिद्वार (गंगा), उज्जैन (शिप्रा) और नासिक (गोदावरी)। इस बार महाकुंभ प्रयागराज में आयोजित हो रहा है। इस साल के महाकुंभ का विशेष महत्व है क्योंकि यह 144 वर्षों बाद हो रहा है। अनुमान है कि इस बार महाकुंभ में 40 करोड़ से अधिक श्रद्धालु हिस्सा लेंगे।
मान्यता है कि अक्षयवट के दर्शन भी महाकुंभ यात्रा का एक अनिवार्य हिस्सा होते हैं, जो भक्तों के लिए बहुत पुण्यकारी माना जाता है, महाकुंभ का ऐतिहासिक महत्व अत्यधिक है। भारतीय ग्रंथों और पुराणों में इस आयोजन का उल्लेख मिलता है, विशेष रूप से महा कुम्भ का उल्लेख ब्रह्मपुराण, स्कंदपुराण और भागवतपुराण में किया गया है।
यह एक धार्मिक पर्व है, जिसमें लाखों लोग गंगा नदी के पवित्र जल में स्नान कर अपने पापों से मुक्ति प्राप्त करने का विश्वास रखते हैं। प्रयागराज, जो पहले इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था, पवित्र संगम स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यह वह स्थान है जहां तीन प्रमुख नदियां : गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हैं। महाकुंभ का आयोजन भारतीय कैलेंडर के अनुसार हर 12 वर्षों में होता है।
इसमें निश्चित तिथियों पर विशेष स्नान पर्व आयोजित होते हैं, जिनमें करोड़ों लोग शामिल होते हैं। कुंभ मेला सबसे पहले हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज में आयोजित होता है। प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन प्रत्येक 12 वर्षों में विशेष रूप से होता है, जिसमें भारी संख्या में साधु-संतों और श्रद्धालुओं का आना होता है।
यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी यह एक अभूतपूर्व घटना है। महाकुंभ के दौरान, प्रयागराज में अस्थायी शहर बसता है। यहां तंबू, अस्थायी सड़कों, चिकित्सा सुविधाओं और अन्य आवश्यकताओं की व्यवस्था की जाती है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े।
इस समय, विभिन्न अखाड़े, साधु-संत और धर्मगुरु अपना महत्व बढ़ाते हैं, और उनके बीच विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। इसके अलावा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, संगीत और नृत्य के आयोजनों के साथ-साथ, भारतीय हस्तशिल्प और पारंपरिक भोजन का भी एक विशेष आकर्षण होता है।
महाकुंभ का आयोजन न केवल धार्मिक उन्नति का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय समाज के एकता, समरसता और विविधता को भी दर्शाता है। यहां विभिन्न संस्कृतियों, जातियों और धर्मों के लोग एक साथ आते हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि भारत की संस्कृति में भाईचारे और समानता का संदेश निहित है। इस विशालतम धार्मिक उत्सव के माध्यम से भारतीयता की गहरी भावना और सांस्कृतिक धरोहर को सम्मानित किया जाता है।
कुल मिलाकर, प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ भारतीय संस्कृति का जीवंत उदाहरण है, जो हर वर्ष अपनी विराटता और महत्व के कारण लोगों के मन में स्थायी छाप छोड़ता है। यह न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि समाज को एकजुट करने और विश्व में भारतीय सभ्यता की प्राचीनता को प्रदर्शित करने का एक अद्वितीय अवसर है।
महाकुंभ के शाही स्नान- 13 जनवरी (सोमवार) : पौष पूर्णिमा, 14 जनवरी (मंगलवार) : मकर संक्रांति, 29 जनवरी (बुधवार) : मौनी अमावस्या, 3 फरवरी (सोमवार) : बसंत पंचमी, 12 फरवरी (बुधवार) : माघी पूर्णिमा, 26 फरवरी (बुधवार) : महाशिवरात्रि। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और विभिन्न धार्मिक-सामाजिक संगठनों से जुड़े हैं।)
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