मानस और मानसिकता

 

रविरंजन

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारे समाज में कुछ ऐसे बहस होते हैं जो राजनीतिक इच्छाओं और लाभ को ध्यान में रखकर होते हैं। इसे आप गुलामी का असर कहें या वर्तमान संदर्भ में ज्ञान और अध्ययनशीलता में कमी लेकिन चर्चा में रामचरितमानस की पंक्तियां ही है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो अपनी संस्कृति पर गर्व न करता हो। दुर्भाग्य से देश में दूसरे देशों से अंगीकार की गयी विचारधारा, परिवेश, जीवन शैली और चर्चित होने या चर्चा में रहने की मजबूरी से ग्रसित जन ऐसा कुछ करते रहते हैं। 

तुलसीदास ने विक्रम संवत 1631 (1574 ईस्वी) में अयोध्या में रामचरितमानस लिखना शुरू किया। रामचरितमानस की रचना अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट में हुई थी। भारत इस अवधि के दौरान मुगल सम्राट अकबर (1556-1605 सीई) शासक था। मानस तुलसीदास को विलियम शेक्सपियर का समकालीन भी बनाता है। रामचरित मानस एकमात्र रचना है जो दुनिया भर के हिंदुओं, कामिल बुल्के जेसे ईसाई का आस्थाग्रंथ है इसकी पूजा की जाती है। मानस पाठ के नियम है और उसे भी पूजा की तरह किया जाता है। इस पुस्तक को अगर गंभीरता से समझा जाए तो आज के संदर्भ में दुनिया में जितनी भी समस्या है चाहे वह मानव निर्मित हो या प्राकृतिक सभी का हल रामचरितमानस में मिल जाता है। इसके रचियता तुलसीदास संस्कृति के विद्धान होते हुए भी अवधी में इसकी रचना की। क्योंकि वे एक सामाजिक वैज्ञानिक थे।

भारतीयों के आत्मबल का एक बड़ा श्रोत रामचरितमानस है जिसे आज के संदर्भ में आर्ट आफ लिविंग की सबसे उत्कृष्ट साहित्य के रुप में देख सकते हैं। यह चरित्र की समग्र गाथा है जिसके कुछ पंक्तियों पर टिप्पणी कर चर्चा में आ सकते हैं लेकिन दुनिया के हर हिंदू के मन से मानस की श्रद्धा कम नहीं कर सकते। यह जननीति, राजनीति और त्याग से समृद्धि की उत्कृष्ट रचना है। 

एक रचना रची गयी हिंदी समाज के पथ भ्रष्टक तुलसीदास। यह रचना एक विद्धान पत्रकार विश्वनाथ ने रची। वे इस आलोचना में एक अंधे भक्त बने जो हाथी को जहां से पकड़ता है उसका उसी के अनुसार वर्णन कर देता है। उनकी रचना राम के विरोधियों को बहुत अच्छा लगा। लेकिन अक्षर से बनते हैं शब्द और शब्द से वाक्य। वाक्य से अपनी अनुभूति को दिया जाता है रुप। तब रुप राम का हो या कृष्ण का उसमें मिलता है भाव। तब बनते हैं भगवान राम, भगवान कृष्ण। भारतीय संस्कृति का यह भाव की राम के चरित को मन में स्थिर करना ही रामचरित मानस है। राजाराम ही नहीं उस काल के सभी राजा उत्कृष्टता के प्रतीक थे और वे गुरु सत्ता के अधीन हो राज्य चलाते थे जिस कारण राम राज्य आज भी सर्वोत्तम सत्ता का उदाहरण है। 

गुलामी और प्रताड़ना के सात सौ साल में कुछ विकलांग मानसिकता के लोग ही आलोचना के साधक हो गये और रामचरित मानस रुपी सागर के एक बूंद उठाकर जिसकी भी उनको समझ नहीं है आलोचना करने को उद्धत हुए। राम और मानस तर्कातित हैं। तर्क उन चीजों पर हो सकती है जो समझा जा सके। रामचरित समझा नहीं जिया जा सकता है और बिना जिये समझा नहीं जा सकता है। राम के चरित को मन में स्थापित करने को ही रामचरित मानस कहते हैं। एक अलौकिक विचार धारा अलौकिक मन से निकलती है और मन चिंतन से निर्मित होता है। चिंतन जन्म जन्मातर से प्रभावित होता है।

पूरी दुनिया भारत के इसी संस्कृति का सम्मान करती है। दुर्भाग्य से हमारे देश के कुछ गिने चुने लोग अपने निहित स्वार्थवश अज्ञानवश ऐसी करतूत करते हैं जिससे देश की संस्कृति पर सवाल उठता है। मन में स्थापित मानस की अलोचना की जितनी अलोचना की जाए वह कम है लेकिन क्षमाशीलता रामचरित मानस के मूल में हैं जिन्होंने हर रुप में आदर्श प्रस्तुत किया तब जब पूरा विश्व राक्षसवृति से प्रभावित था। राष्ट्र धरोहर मानस तो अकबर काल में सुरक्षित रहा लेकिन आज चंद लोग कुछ भी बोल कर मुद्दा बना देते हैं। साहित्य के तौर पर उत्कृष्ट, भाव के तौर पर भगवत सदृश्य इस कथा से जीवन बदलता है उसकी आलोचना मात्र ही कलियुग के माध्यम से विनाशकारी होता है।

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