एबीएन सेंट्रल डेस्क। क्या विकट शोर था साहब- आ गया रे आ गया! क्या भयानक खौफ था जी-बाप रे बाप यह तो फिर आ गया! यह तो निगल ही जाएगा! चैनल दर चैनल क्या अजब आलम था-आ गया रे, खा गया रे, लील गया रे, डस गया रे! लेकिन वह आया भी और चला भी गया। आया तो खूब शोर-शराबे के साथ था, पर गया ऐसे जैसे कोई दबे पांव निकल जाता है।
वह आंधी की तरह आया तो जरूर, पर तूफान की तरह नहीं गया। तूफान क्या, हल्का-सा झोंका भी महसूस नहीं हुआ। उसके आने का शोर तो ऐसा था, जैसे कायनात नेस्तनाबूद हो जाएगी, जैसे कहर टूट पड़ेगा। लेकिन उसके जाने का पता ही नहीं चला। वह जो आया था, वह नहीं था, उसका नाम था। वह जो खौफ था, वह उसका नाम था। वह चीन से आ रहा था। लेकिन वह चीनी सेना नहीं थी। उसे तो कूट-पीटकर भगाया जा सकता है। वह कोई चीनी माल भी नहीं था कि उसके बायकाट का आह्वान हो जाता। वह तो कोरोना था। वह पहले भी चीन से ही आया था और पूरी दुनिया में वैसे ही छा गया था, जैसे चीनी माल छाया हुआ है।
खौफ तो चीनी माल का भी रहता ही है न। पर कोरोना का खौफ तो आखिर कोरोना का ही था। उसके खौफ का क्या मुकाबला साहब! वह तो ऐसा खौफ है कि लोग अपनी सांसें गिनने लगे थे। अपने खोये हुए मास्क ढूंढ़ने लगे थे। अस्पतालों के बिस्तर गिनने लगे थे।
खौफ ऐसा था कि सरकार बैठकें करने लगी। अस्पताल अपने ऑक्सीजन प्लांट दुरुस्त करने लगे और कोविड वार्डों को सजाने लगे। स्वास्थ्य मंत्री ने आगाही जारी कर दी। राहुल गांधी को चिट्ठी लिख दी कि भाई अपनी यात्रा छोड़ो और घर जाओ, देखो कोराना आ रहा है। सर्दी-गर्मी जब ज्यादा सताने लगे तो बच्चे भी अपना खेल का मैदान छोड़कर घर चले जाते हैं। पर बच्चा जिद्दी निकला। मैदान छोड़ने से इनकार ही कर दिया। अकेला चलूंगा, पर चलता रहूंगा। कोरोना से नहीं डरूंगा। नफरत के बाजार में मैं तो अपनी प्यार की दुकान सजा कर रहूंगा। बस इतने भर से कोरोना का खौफ वैसे ही धराशायी हो गया, जैसे वक्त आने पर तानाशाह का खौफ धराशायी हो जाता है।
ऐसे में कोरोना बड़ा शर्मसार हुआ होगा। उसे डूब मरने की लानत तो नहीं दी जा सकती, क्योंकि आखिर तो वह महामारी है। जब सौ साल पुरानी महामारियों का खौफ अभी तक बना हुआ है तो वह कहां डूब कर मरने वाला है। वैसे भी वह मारने वाला ठहरा। अलबत्ता एक दिन तो मारने वाले भी मरते ही हैं। कोरोना को मारने की वैक्सीन मिल भी गयी और अभी और भी मिल ही जाएगी। फिर भी उससे बचकर रहने में ही भलाई है। वो क्या कहते हैं बचाव में ही बचाव है।
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