टीम एबीएन, रांची। झारखंड में झामुमो की अगुवाई वाली सरकार ने 2022 दिसंबर में अपने तीन साल पूरे कर लिए हैं। आदिवासियों मूलवासियों के हक और जल, जंगल, जमीन से जुड़े मुद्दों पर संघर्ष के मूल से उपजी इस पार्टी को पहली बार कायदे से सत्ता का खाद-पानी हासिल हुआ और यह कहने-मानने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि पावर एक्सरसाइज की बदौलत वह अपने अब तक के इतिहास में आज सबसे मजबूत स्थिति में है। इसके बाद भी हेमंत सोरेन और झामुमो राजनीति की पिच पर शानदार बैटिंग कर रहे हैं।
पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन (जो राज्य के मुखिया भी हैं) तमाम मुश्किलों और चुनौतियों के बीच भी सियासी पिच पर आक्रामक बैटिंग कर रहे हैं। 2023 में भी वह इसी पोजिशन पर डटे रहने की कोशिश करेंगे क्योंकि 2024 में होने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव की तैयारियों की दृष्टि से यह साल बेहद अहम साबित होने वाला है। पार्टी की जो मौजूदा पोजिशन है, उसके आधार पर भविष्य के लिए अच्छे स्कोर की संभावनाएं जरूर दिख रही हैं, लेकिन यह भी सच है कि नेतृत्व की एक भी बड़ी सियासी चूक उसे पीछे भी धकेल सकती है।
राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा तगड़ी फिल्डिंग सजाने की तैयारियों में जुटी है और मौका पाते ही वह झामुमो की मौजूदा जमीन खिसका सकती है। केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार अमित शाह आगामी 7 जनवरी को झारखंड दौरे पर आ रहे हैं। उनका यह दौरा पार्टी के सांगठनिक कार्यों को लेकर है। वह चाईबासा में पार्टी की ओर से आयोजित एक जनसभा को संबोधित करेंगे और लोकसभा कोर कमेटी व पार्टी नेताओं के साथ बैठक करेंगे।
हाल में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल भी राज्य के दौरे पर थे। उन्होंने कई इलाकों में जाकर पार्टी के नेताओं के साथ विमर्श तो किया ही, जनता का मूड भांपने की भी कोशिश की। जाहिर है, भाजपा 2024 के चुनावों को लेकर जिस तरह की सांगठनिक तैयारियां कर रही हैं, उसमें झामुमो के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं। हालांकि झामुमो की केंद्रीय कमेटी के वरिष्ठ नेता और मुख्य प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं कि अमित शाह चाहे राज्य के हर प्रमंडल और जिले का दौरा कर लें, वह झारखंड में हाशिए पर पहुंच चुकी पार्टी को नहीं उबार पायेंगे। वह बताते हैं कि झामुमो के लिए वर्ष 2023 संकल्प का वर्ष होगा।
संकल्प इस बात का कि 2024 में झारखंड को भाजपा से मुक्त करा दिया जायेगा। झारखंड में 1932 के खतियान (भूमि सर्वे) पर आधारित डोमिसाइल पॉलिसी, ओबीसी-एसटी-एससी आरक्षण के प्रतिशत में वृद्धि, नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज का विस्तार न देने की तीस वर्ष पुरानी मांग पर सहमति, राज्यकर्मियों के लिए ओल्ड पेंशन स्कीम, आंगनबाड़ी सेविकाओं-सहायिकाओं के वेतनमान में इजाफा, पुलिसकर्मियों को प्रतिवर्ष 13 माह का वेतन, पारा शिक्षकों की सेवा के स्थायीकरण, सहायक पुलिसकर्मियों के अनुबंध में विस्तार, मुख्यमंत्री असाध्य रोग उपचार योजना की राशि पांच लाख से बढ़ाकर दस लाख करने, पंचायत सचिव के पदों पर दलपतियों की नियुक्ति जैसे फैसलों से सरकार ने अपनी लोकप्रियता का सेंसेक्स बढ़ाया है।
पार्टी के सामने एक चुनौती अपनों को साधने की भी होगी। वरिष्ठ विधायक लोबिन हेंब्रम और हेमंत सोरेन की भाभी सीता सोरेन कई बार अपनी ही सरकार के विरोध में खड़े दिखते हैं। गठबंधन सरकार में साझीदार कांग्रेस की ओर से कुछ मुद्दों पर विरोध के स्वर उठते दिखते हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झामुमो ने कांग्रेस को काफी हद तक साध रखा है। आज की तारीख में कांग्रेस झारखंड में झामुमो से अलग कोई सियासी रास्ता नहीं देख सकती। बहरहाल, आने वाला वक्त बेहतर बतायेगा कि चुनौतियों के बीच झामुमो अपना सियासी प्रदर्शन किस हद बरकरार रख पाता है।
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