सोलर एनर्जी से जगमगाता भारत का गांव

 

विनायक चटर्जी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गुजरात के मेहसाणा जिले के मोढेरा गांव में 8,000 लोग रहते हैं। यह गांव पुष्पावती नदी के किनारे बसा हुआ है। अहमदाबाद से सड़क मार्ग के जरिये दो घंटे से कम समय में इस गांव तक पहुंचा जा सकता है। अभी तक यह गांव नामचीन सूर्य मंदिर के लिए जाना जाता था। इस मंदिर को चालुक्य राजाओं ने बनाया था। अब यह भारत के पहले सौर ऊर्जा गांव के रूप में प्रसिद्ध है। यह कोई संयोग नहीं है कि सूर्य देव के मंदिर वाले इस गांव ने यह तमगा हासिल किया है।

गुजरात पावर कॉरपोरेशन ने सूर्य ग्राम परियोजना के तहत गांव के सभी घरों में नि:शुल्क सौर ऊर्जा रूफ टॉप सिस्टम स्थापित किए। बीईएसएस ने मोढेरा से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित सुजानपुरा गांव में 15 मेगावॉट आवर की बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली के साथ 6 मेगावॉट का ग्राउंड माउंटेड सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया।

मोढेरा के 1,400 घरों की छतों पर 1 किलोवॉट आवर के सौर पैनल स्थापित किये गये हैं। गांव के सभी सार्वजनिक व शिक्षण संस्थानों की इमारतों जैसे बस स्टैंड, पुलिस स्टेशन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और पंचायत कार्यालय में भी सौर ऊर्जा संयंत्र लगाये गये हैं। गांव में विद्युत वाहनों के चार्जिंग स्टेशन भी हैं। सौर ऊर्जा से गोधूलिका के समय सूर्य मंदिर भी जगमगाता है। दिन में मोढेरा की ऊर्जा की पूरी मांग सौरऊर्जा परियोजना से पूरी हो जाती है। रात में बीईएसएस से बिजली की आपूर्ति की जाती है।

गांव में एक दिन में सौर ऊर्जा से औसतन 30,000 यूनिट बिजली तैयार होती है। इसमें से 5,500 यूनिट का इस्तेमाल दिन में होता है और 6,000 यूनिट बीईएसएस में रखी जाती है। अतिरिक्त यूनिट बिजली की आपूर्ति रोजाना राज्य के ग्रिड को कर दी जाती है। गांव के बाशिंदों ने पुष्टि की कि उनके बिजली बिल में भारी कटौती हुई है। आमतौर पर प्रति माह 3,000 रुपये का बिजली बिल अदा करने वाले घर को अब 1,000 रुपये प्रति माह अदा करने की जरूरत है। गांव के लोग अब अधिक बिजली के उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं और रोजमर्रा की जिंदगी को आरामदायक बना रहे हैं। 

इस तरह मोढेरा न केवल नेट जीरो समुदाय बन गया है बल्कि यह हरित ऊर्जा के ग्रिड का आपूर्तिकर्ता भी बन गया है। मोढेरा ने मिसाल पेश की है। लेकिन यह याद रखना होगा कि सौर ऊर्जा नि:शुल्क नहीं है। इसके लिए कीमत केंद्र और राज्य सरकार ने अदा की है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 81 करोड़ रुपये है। लिहाजा यह स्पष्ट रूप से भारत के सभी छह लाख से अधिक गांवों के लिए संभव नहीं है।

 असलियत यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर घरों की छतों पर सौर ऊर्जा के पैनल लगने का क्रियान्वयन भी कम रहा है जो निराशाजनक है। हालांकि जनवरी 2010 से सौर ऊर्जा का राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन लागू होने के बाद भी सौर ऊर्जा की वृद्धि तेजी से हो रही है। साल 2021-22 तक 20 गीगा वॉट सौर ऊर्जा को ग्रिड से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

हालांकि 2015 में इस लक्ष्य की पुनर्समीक्षा कर 100 गीगावॉट कर दिया गया था। इसमें से 40 गीगावॉट रूफ टॉप फोटोवॉलटिक (आरटीपीवी) से प्राप्त की जानी थी। शेष 60 वॉट यूटिलिटी-स्केल परियोजनाओं से प्राप्त होनी थी। हालांकि निराशाजनक यह रहा कि वित्त वर्ष 22 तक आरटीपीवी से नाममात्र की 11.8 गीगावॉट की क्षमता प्राप्त हुई।

आरपीटीवी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके लिए अतिरिक्त जमीन पर पूंजीगत व्यय की आवश्यकता नहीं होती है। उपभोक्ता अपने आवासीय परिसर का इस्तेमाल कर बिजली पैदा कर सकता है। इस तरह उपभोक्ता ही स्वयं निमार्ता व ग्राहक प्रोज्यूमर बन जाता है। हालांकि घरेलू उपभोक्ता कई कारणों से आरटीपीवी निवेश से दूरी बनाकर रखते हैं।

इसका एक कारण संयंत्र को लगाने की लागत और उसके लिए वित्तीय संसाधन जुटाने की असमर्थता है। इसके अलावा खुदरा स्तर पर घरों में कम बिजली उपयोग करने वालों के लिए नि:शुल्क / अत्यधिक रियायत उपलब्ध होना है। इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती किराये का घर होता है। दूसरी तरफ रूफ टॉप परियोजना के डेवलपर के लिए छोटे आवासीय उपभोक्ताओं की मांग को पूरा करना महंगा सौदा साबित होता है। ऐसे में संयंत्र लगाने वाले एजेंटों को बिक्री चक्र को बंद करने में लंबी अवधि, कई स्थानों पर डिस्कॉम की अनुमति मिलने में होने वाली परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

डिस्कॉम छतों से सौर ऊर्जा के जरिये बिजली उत्पादन को हतोत्साहित करती हैं। डिस्कॉम नियम व विनियम को बदलने से परहेज कर लॉबिंग करती हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि छतों से तैयार सौर ऊर्जा की बिक्री ग्रिड को होती है और डिस्कॉम को नकदी अदा करने वाले ग्राहकों को भी खोना पड़ता है। जैसे उदाहरण के तौर पर ज्यादातर राज्यों ने मीटर वाले उपभोक्ताओं के लिए आरटीपीवी की क्षमता के आकार को अब सीमित कर दिया है।

ज्यादातर राज्यों में अब इस तरीके से तैयार होने वाले सिस्टम को 500 किलोवॉट से कम पर सीमित कर दिया गया है। ऐसे में बड़ी छत वाले वाणिज्यिक व संस्थान वाले उपभोक्ता जो बड़े संयंत्र लगा सकने में समर्थ हों, उन पर सीमाएं लगा दी गई हैं। आरटीपीवी को ट्रांसमिशन इंटरकनेक्शन के लिए कम निवेश की जरूरत होती है लेकिन इसमें डिस्कॉम की रुचि नहीं है। आरटीपीवी का अनुपात अच्छा होने पर स्थानीय ग्रिड को समुचित व स्थिर ढंग से आपूर्ति हो सकती है। 

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने आवासीय क्षेत्रों में आरटीपीवी बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राजकोषीय सह प्रोत्साहन पैकेज तैयार किया गया था। परियोजना के आकार के आधार पर एक ग्रेडेड योजना के अंतर्गत स्थानीय उपभोक्ताओं को केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसके तहत तीन किलोवॉट तक की परियोजनाओं के लिए परियोजना लागत का 40 फीसदी तक और 3 से 10 किलोवॉट के बीच की परियोजनाओं के लिए परियोजना लागत का 20 प्रतिशत तक का अग्रिम पूंजी अनुदान शामिल है। इसके अलावा डिस्कॉम को प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाती है। यह प्रोत्साहन राशि मुख्य रूप से डिस्कॉम द्वारा सहायक बुनियादी ढांचा प्रदान करने, डिस्कॉम कर्मचारियों की क्षमता निर्माण, अतिरिक्त मानवशक्ति और उपभोक्ता जागरूकता पैदा करने के किये गये अतिरिक्त व्यय की प्रतिपूर्ति करने के लिए है।

मोढेरा ने गांवों में आम भारतीयों के जीवन में संभावित परिवर्तन को स्पष्ट रूप से कर दिखाया है। वैश्विक स्तर पर आरटीपीवी को गरीबी उन्मूलन के एक साधन के रूप में मान्यता दी गयी है। यह घरों पर पड़ने वाली धूप से नि:शुल्क कमाई करता है और ग्रीन डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के रूप में कार्य करता है। आदर्श रूप से यह आंदोलन भारत के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों तक फैल जाना चाहिए। एक नई योजना तैयार किए जाने की आवश्यकता है जो अब तक की सभी जानकारियों पर आधारित हो। 

इसे व्यावहारिक तरीके से विद्युत और जल के कनेक्शनों की तरह इस मौद्रिक कमाई और गरीबी उन्मूलन के अवसर को पूर्ण शक्ति के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए। तभी भारत का हरेक गांव सूर्य गांव बन पायेगा।

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