एबीएन एडिटोरियल डेस्क। रफ्तार, स्पीड, गति ये कुछ नाम हैं आज के मेरे विषय के। जीवन में रफ्तार का होना, हमारे प्रगतिशील होने का सूचक है। आदिकाल में मनुष्य पैदल चलता था। अपनी रफ्तार बढ़ाने के लिए घोड़े, हाथी, ऊंट, बैलगाड़ी का इस्तेमाल करने लगा। कुछ और तरक्की की और मशीनों का अविष्कार किया। आधुनिक वाहन बनाये। कई कई दिनों के बल्कि कई बार महीनों के लगने वाले यात्रा समय को चंद घंटों तक मे सीमित कर दिया। ये मनुष्य ने अपनी जीवन यात्रा को आरामदायक बनाने के लिए किया। जरूरी था। सही था। फिर गलती कहां हुई?
चलिये, अब सिक्के के दूसरे पहलू पर चलते हैं। मैं एक मां हूं। बेटा छोटा था, 3 पहियों वाली साइकिल घर में चलाया करता था। कमरा छोटा लगने लगा तो आंगन में आ गया। थोड़ा समझदार हुआ तो 2 पहियों वाली साइकिल दिला दी गयी। आंगन से निकल कर कॉलोनी की गली में चलाने लगा। अपने बेटे की सफलता पर खुश हो रही थी मैं। पल भर भी आंखों से दूर नहीं होने देती थीं। मां हूं ना, मन घबराता था। फिर भी घर की छत पर खड़ी हो कर दूर तक उसको सही सलामत जाते हुए देखती रहती थी। जब तक घर नहीं आ जाता, मन विचलित सा होता रहता था। ट्यूशन की टीचर को फोन कर के पुछ लेती थी। वो भी मेरे मन की दशा समझती थी, शायद। वो भी मां थी। समस्या तो अब आयी जब बेटा कॉलेज जाने लगा। किशोर वय में आधुनिक गाड़ियों को देख कर उसका भी मन ललचाने लगा अच्छे माता पिता काफर्ज निभाते हुए उसे एक अच्छी स्कूटर दिलाई गयी। अब वो पलक झपकते ही कॉलोनी की गली से निकल कर, बड़ी सड़क पर तेजी से भीड़ में गुम हो जाता है। छत पर खड़ी हो कर भी ज्यादा दूर तक नहीं देख पाती हूँ। छटपटाती हूं। कोई तो मां होगी, जो आगे के रास्ते पर उसका खयाल रख रही होगी। क्या इस समस्या को केवल मैं ही अनुभव कर रही हूं या हर मां अपने बच्चों को भगवान के भरोसे इस अंधी रफ्तार की भीड़ में भेज रही हैं?
हमने अपने बच्चे को सारे नियम कायदे सिखाये हैं। वो उनका पालन भी करता है। मगर जिनके पास तेज रफ्तार वाहन है वो कभी कभी इन नियमों का और कायदों का पालन चाह कर भी नहीं कर पाते। कंही उनकी गलती की सजा हमारे बच्चे को ना झेलनी पडे, ये सोच कर मन अशांत हो जाता हैं। जब भी कभी कोई अनजान बच्चा गलती करता है तो मैं उसे अपना जान कर सही गलत समझाने लगती हूं। इसी उम्मीद में कई यदि कभी मेरा बच्चा कोई गलती करें तो कोई दूसरी मां उसे सही राह दिखा दे। आज उच्च शिक्षा के लिए बच्चे दूसरे बड़े शहरों में और दूसरे देशों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। वहां मैं, कैसे अपने बच्चे की सलामती रखूंगी? क्या वहां की मम्मियां, मेरा साथ देंगी, उनकी इस रफ्तार को नियंत्रित करने में?
इस पूरे लेख में मैने अब तक माताओ को ही सम्मिलित किया है। क्या कोई पिता अपने बच्चों को सुरक्षित नही देखना चाहता होगा? क्या उसको अपने बच्चों की फिकर नही होती होगी? और यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है तो क्यों इतनी रफ्तार हम बना रहे है? कुछ पल में ही 100 किमी की रफ्तार और शायद इससे भी ज्यादा। इन वाहनों को बनाने वाली ंआॅटो और बाईक कंपनियां नए नए मॉडल बना कर आये गए तेज गति की गाड़ियां बाजार में ला रही है। फलां गाड़ी की रफ्तार से कई गुना तेज रफ़्तार वाली गाड़ियों के बारे में सुनकर नई पीढ़ी अकर्षित हो रही है। अपने घर वालों से साम, दाम , दंड , भेद, कोई भी नीति अपना कर उस वहन को प्रप्त भी कर लेती है। मेरा सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि उस वाहन की तेज गति का, परीक्षण क्या उस भीड़ भाड़ वाली बड़ी सड़क पर किया गया था... जहां हमारे बच्चों को रोजाना गाड़ी चलानी है? उन ऊंची नीची, टेढी मेढ़ी, गड्डो से भरी, अतिक्रमण से पटी और जहां सुरक्षा के नाम पर की गई चालाकियां हैं। जवाब है, नहीं।
इन तेज रफ्तार गाड़ियों की रफ्तार मापने के लिए कम्पनियां किसी सुनसान इलाके की, हवाईजहाज के रन वे की, किसी बड़े नेशनल हाईवे की, सीधी, चिकनी, रोशनी से भरी और पूरे सुरक्षा उपकरणों की देख रेख में, पल दो पल के लिए उस रफ्तार को माप कर, उस आंकड़े को भुनाती हैं। वो रफ्तार हमारे पूरे जीवन काल में हमें कभी काम नहीं आतीं। बल्कि अब तक वह अंधी रफ्तार ना जाने कितने ही मासूम, उत्साहित और झूठी चकाचौंध में आकर्षित बच्चों का जीवन समाप्त कर चुकी हैं। रफ्तार को नियंत्रित करने के लिए दूसरे उपकरण लगाये जाते हैं। पर मनुष्य इस तेज रफ्तार का इतना दीवाना हो जाता है के ये जानते हुए भी की इस रफ्तार से जान को खतरा है, वो अपनी रफ्तार धीमी ही नहीं करना चाहता। क्या सिर्फ इस लालच के लिए पूरा दोष ग्राहक के सर मढ़ देना उचित होगा? हमारे बड़े बुजुर्ग हमेशा अपने अनुभवों से यही समझाते आये हैं कि, अति हमेशा बुरी होती हैं। हर वो चीज जो जरूरत से ज्यादा हो वो खतरनाक है। आटोमोबाइल कम्पनियां जो नयी नयी, तेज रफ्तार बना रहे हैं, वो भी अपने बच्चों को एक तरह से संकट में ही डाल रहे हैं। क्या जरूरत है ऐसी रफ्तार की? हम अपने ही बच्चों को खतरनाक, जानलेवा बारूद के ढेर पर बैढाने को आधुनिकीकरण क्यों समझ रहे हैं?
उनको एक सीमित और सुरक्षित रफ्तार का सही इस्तेमाल करना सिखाया जा सकता है। उनको 10 मिनट जल्दी घर से निकल कर धीरे धीरे और सफर का मजा लेते हुए चलना सिखाया जाये। एक ही जगह जाने के लिए अलग-अलग वाहनों पर जाने के बजाय मिल जुल कर एक ही वाहन को शेयर करना सिखाया जाये। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करना सिखाया जाए। इससे एक दूसरे की सुरक्षा और साथ का मजा भी मिलने लगेगा और माता पिता को भी बच्चों की सुरक्षा के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। क्या आप मेरे इस विचार से सहमत हैं?
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