एबीएन बिजनेस डेस्क। देश में लगातार आर्थिक आंकड़ों को लेकर राजनीति हो रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत सारे लेख लिखे जा रहे हैं। देश और प्रदेशों के सार्वजनिक कर्ज में थोड़ा वृद्धि हुई है। यह वृद्धि बिल्कुल भी चिंंताजनक नहीं है। वर्ष 1951 में 24.62 लाख करोड़ रुपए का भारत पर सार्वजनिक कर्ज था। मार्च 2020 में 94.62265 लाख करोड़ रुपए भारत सरकार पर कुल देनदारी थी। इसमें मामूली वृद्धि हुई है। केंद्र सरकार के कुल देनदारी जून 2020 तक 101.35600 लाख करोड़ रुपए हो गयी। वर्ष 1991 में भारत पर 85 बिलियन डॉलर का बाहरी कर्ज था जो वर्ष 2011 में बढ़कर 317 बिलियन डॉलर हो गया। मार्च 2020 में भारत पर लगभग 558 बिलियन डॉलर का विदेशी ऋण था। जून 2020 में देश पर बाहरी ऋण 3.9 बिलियन डॉलर घटकर 554 बिलियन डॉलर हो गया। भारत के लिए सुखद बात यह है कि भारत आंतरिक ऋण पर ज्यादा और बाहरी ऋण पर कम निर्भर करता है। भारत की इस नीति की वजह से कुल कर्ज का लगभग 20 प्रतिशत बाह्य कर्ज है और शेष 80 प्रतिशत आंतरिक कर्ज है। यही कारण है कि भारत की वित्तीय स्थिति कोरोना महामारी के बावजूद भी मजबूत है। देश के सभी राज्यों पर कर्ज का दबाव बढ़ रहा है। मार्च 2020 तक देश के सभी राज्यों पर कुल मिलाकर लगभग 40 लाख करोड रुपए का कर्ज था। मुझे लगता है कि मार्च 2021 तक सभी राज्यों पर 60 लाख करोड़ तक का कर्ज हो सकता है। हाल ही में केयर रेटिंग के आंकड़ों से यह पता चलता है कि देश के लगभग सभी राज्यों पर लाखों करोड़ रुपए का कर्ज है। उत्तर प्रदेश पर 6.02 लाख करोड़ रुपए, महाराष्ट्र 5.02 लाख करोड़ रुपए, पश्चिम बंगाल 4.37 लाख करोड़ रुपए, तमिलनाडु 4.04 लाख करोड़ रुपए, राजस्थान 3.43 लाख करोड़ रुपए, आंध्र प्रदेश 3.41 लाख करोड़ रुपए, गुजरात 3.26 लाख करोड़ रुपए, कर्नाटक 3.17 लाख करोड़ रुपए, केरल 2.66 लाख करोड़ रुपए, मध्य प्रदेश 2.34 लाख करोड़ रुपये, पंजाब 2.30 लाख करोड़ रुपये, तेलंगाना 1.68 लाख करोड़ रुपये और उड़ीसा पर 1.33 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। पंजाब राज्य में प्रति व्यक्ति देनदारी 82771 रुपये, हरियाणा 81287 रुपये, केरल 79771 रुपए, तमिलनाडु 56134 रुपये, गुजरात 53931 रुपये, कर्नाटक 51981 रुपये, पश्चिमी बंगाल 47881 रुपये, महाराष्ट्र 44734 रुपये, मध्य प्रदेश 32354 रुपए और उत्तर प्रदेश राज्य पर 30136 रुपये प्रति व्यक्ति देनदारी है। देश और सभी प्रदेशों पर कर्ज में मामूली वृद्धि हुई है। कर्ज लेना आवश्यक था। इससे अर्थव्यवस्था पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा बल्कि उत्पादकता बढ़ेगी। देश का विकास होगा। देश के लोगों को राहत मिलेगी। कोरोना महामारी को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को अतिरिक्त कर्ज लेना पड़ा। यह फैसला जनहित को ध्यान में रख कर लिया गया जो सर्वथा उचित है। इसकी प्रशंसा होनी चाहिए। भारत आंतरिक ऋणों पर सदैव ज्यादा निर्भर रहा है। बाहरी ऋणों पर भारत की निर्भरता कम रही है। किसी भी देश का सार्वजनिक ऋण जीडीपी के 77 प्रतिशत से अधिक होने पर ही चिंता का विषय होता है। अभी भारत की स्थिति बहुत बेहतर है क्योंकि भारत का कुल सार्वजनिक कर्ज जीडीपी के अनुपात में लगभग 71 प्रतिशत के बराबर है। वह भी तब जब देश में कोरोना जैसी भयानक महामारी है। मैं याद दिलाना चाहूंगा कि वर्ष 2003 में देश में सार्वजनिक ऋण जीडीपी के 84.2 प्रतिशत के बराबर था। कोरोना महामारी के बावजूद आज हम देश का सार्वजनिक ऋण जीडीपी के 71 प्रतिशत के ही बराबर है। हम बेहतर स्थिति में हैं। अगर हम विश्व के अन्य देशों पर नजर डालें तो पायेंगे कि जापान का सार्वजनिक ऋण जीडीपी के 240 प्रतिशत के बराबर है। अमेरिका का सार्वजनिक ऋण उसके जीडीपी के 107 प्रतिशत के बराबर का है। भारत आज बाहरी कर्ज के मामले में भी बहुत अच्छी स्थिति में है। भारत पर बाहरी कर्ज जीडीपी के 21 प्रतिशत के बराबर का है। फ्रांस का बाहरी कर्ज उसकी जीडीपी के 277 प्रतिशत, जर्मनी का 153 प्रतिशत और जापान पर बाहरी कर्ज जीडीपी के 94 प्रतिशत के बराबर का है। आर्थिक स्थिति और कर्ज को लेकर चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। देश की आर्थिक स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। आर्थिक सुधार आंकड़ों में स्पष्टता से दिख रहा है। मैंने अपने पिछले कुछ लेखों में इसपर विस्तार से लिखा है। आने वाले कुछ महीनों में कोरोना की वैक्सीन आने के बाद देश की आर्थिक स्थिति में निरंतर और सुधार होगा। भारत एक आर्थिक महाशक्ति बनने की कगार पर है।
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