एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आरएसएस के मोहन भागवत का सभी के लिए समान कानून वाली एक वक्तव्य पर विविध क्षेत्रो में कई तरह की परिचर्चा आरंभ हुई, कुछ पक्ष में और कुछ विपक्ष में अपनी दलील देते नजर आये। आइये जानने की कोशिश करते हैं कि कॉमन सिविल कोड क्यों आवश्यक है पूर्ववर्ती सरकारों ने छद्म अंतरराष्ट्रीय वाहवाही लूटने के चलते बहुत सारे गलत प्रयास किये। हमारे संविधान के अनुसार, राज्य का कोई धर्म नहीं है और इसको सभी धर्मों के लोगों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। संविधान सभा की बहस के उल्लेखों से स्पष्ट है कि बहुसंख्यकों के लिए स्वीकृत अधिकारों में अल्पसंख्यकों को केवल विभाजन के बाद की असाधारण परिस्थितियों में ही उपस्थित होने के रूप में स्पष्ट किया गया था। यह स्वीकार किया जा सकता है भारत के संविधान निर्माताओं का उद्देश्य नहीं था कि अल्पसंख्यकों को दिये गये अधिकारों से बहुसंख्यकों को वंचित किया जाए। 1970 दशक के बाद अनुच्छेद 25 से 30 की व्याख्याओं ने अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक समुदाय के बीच भेदभाव की बुरी भावना पैदा करने वाल लगभग बना ही दिया। बहुसंख्यकों के अधिकारों को वंचित कर दिया गया। कुछ पूर्व के प्रयास : सोशल मीडिया या मीडिया में छपी रिपोर्ट पर आप खोजें तो मिल जाएगा कि स्वर्गीय सैयद शहाबुद्दीन ने बहुसंख्यक हिंदुओं पर संवैधानिक रूप से लगाये गये प्रतिबंधों की समस्या को समझते हुए, 1995 के लोकसभा में एक निजी सदस्य के विधेयक संख्या 36 को संविधान के अनुच्छेद 30 के दायरे को व्यापक करने के लिए पेश किया ताकि अल्पसंख्यक वर्ग शब्द को नागरिकों के सभी वर्गों से प्रतिस्थापित करके नागरिकों के सभी समुदायों और वर्गों को शामिल करने के लिए उचित संशोधन किया जा सके। धर्म की परवाह किये बिना इस देश के सभी नागरिकों के बीच समानता बहाल करने के लिए, इस भेदभावपूर्ण कानूनी व्यवस्था को समाप्त करने की अनिवार्य आवश्यकता है तथा संविधान के अनुच्छेद 25 से 30 के उचित संशोधन द्वारा उनके धर्म के बावजूद लोगों के सभी वर्गों में संवैधानिक और कानूनी समानता प्रदान की जा सके ताकि हिंदुओं के मामलों में अल्पसंख्यकों के समान कानूनों के समान अधिकार, विशेषाधिकार और सुरक्षा का लाभ ले सकें। पूजा स्थलों का प्रबंधन (मंदिर और धार्मिक अनुदान), सरकारी योजनाओं, छात्रवृत्ति, लाभ आदि से विभिन्न लाभों के लिए पात्रता, शैक्षिक संस्थानों में पारंपरिक भारतीय ज्ञान और भारत के प्राचीन ग्रंथों के शिक्षण में सक्षम करना तथा सरकार और इसकी एजेंसियों के अनुचित हस्तक्षेप के बिना अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रबंधन। इस संबंध में डॉ सत्यपाल सिंह सांसद (मंत्री बनने से पहले) ने 2016 के लोकसभा में संविधान के अनुच्छेद 26 से 30 में संशोधन करने के लिए एक निजी सदस्य के विधेयक संख्या 226 पेश किया। हम फिर से कहते हैं कि इस विधेयक में जो प्रस्तावित संशोधन हैं वो किसी भी समुदाय या समूहों से कोई अधिकार नहीं छीनते हैं, बल्कि केवल यह सुनिश्चित करते हैं कि हिंदुओं सहित सभी वर्ग समान अधिकारों और विशेषाधिकारों का लाभ उठायें जो इस समय केवल अल्पसंख्यकों के लिए ही उपलब्ध हैं तथा कानून के तहत सभी समान रूप से माने जाते हैं। कारण : यह दोहराना जरूरी है कि विदेशी वाह वाही एवं कई सुरक्षा एजेंसियों के दबाव में सरकारें दब गई या समझ नहीं पाई। लगातार पांच केंद्रीय शिक्षा मंत्रियों ने अल्पसंख्यकों का ही ऐतिहासिक महिमामंडन किया। नीतियों में होते परिवर्तनों की दूरगामी मार पर पूर्व के शासकों ने ध्यान ही नहीं दिया। इसके विपरीत अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति ने शिक्षा-संस्कृति की धारा पर कब्जा करने की कोशिश की, सर्वविदित है कि सामाजिक बदलाव के मूल स्रोत वही होता है। केंद्रीय सत्ता पर काबिज हुए बिना भी कम्युनिस्टों ने देश की शिक्षा-संस्कृति पर वर्चस्व बनाया और हिंदू ज्ञान-परंपरा को बेदखल कर दिया इसका उदाहरण गांधी जेएनयू यानि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी नई दिल्ली में आप देख सकते हैं। कुछ दिन पूर्व तक हिंदू धर्म-समाज डूबता जहाज समझा जाता था, 2011 तक ऐसा महसूस होता था कि इससे निकल कर ही जान बचाई जा सकती है। इन सच्चाइयों की अनदेखी कर अनेक हिंदूवादी खुद अपनी वाहवाही करते रहे, मैंने खुद देखा है कि कुछ नेता बहुत श्रद्धा से हिन्दू पर्व मनाते हैं यहां तक कि सूत्र बताते हैं कि एक दो रेलवे भवन के सामने विश्वकर्मा भगवान के मंदिर का भी स्थापना हुआ लेकिन जब नीति निर्धारण करने का समय आता है तो अल्पसंख्यक तुष्टीकरण हेतु कानून बना। पूर्व के दशकों में भारत में ही बहुसंख्यक हिंदू धर्म का चित्रण जातिवादी, उत्पीड़क, दकियानूस आदि जैसा प्रचलित हुआ है। यही विदेशों में भी प्रचारित किया गया। किसी पार्टी की सत्ता बनने से इसमें अंतर नहीं पड़ा, यह विविध घटनाओं से देख सकते हैं।1972 जनवरी के बाद कांग्रेस-कम्युनिस्ट परोक्ष संधि और हिंदू संगठनों के निद्रामग्न होने से संविधान के अनुच्छेद 25 से 31 को मनमाना अर्थ दिया जाने लगा। संविधान की उद्देशिका में जबरन सेक्युलर शब्द जोड़ने से लेकर दिनों-दिन विविध अल्पसंख्यक संस्थान, आयोग, मंत्रालय आदि बना-बना कर अधिकाधिक सरकारी संसाधन मोड़ने जैसे अन्यायपूर्ण कार्य होते गये। विडंबना यह कि इनमें कुछ कार्य स्वयं हिंदूवादी कहलाने वाले नेताओं ने किए। वे केवल सत्ता कार्यालय, भवन, कुर्सी आदि की चाह में रहे। निष्कर्ष : विश्व के किसी भी देश में चले जाएं तो यह साफ पता चलेगा कि बहुसंख्यकों की बातें हर तरफ से मानी जाती हैं, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इजरायल चाहे कोई भी देश हो केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहां अल्पसंख्यक हमेशा ही अपरहैंड में रहते आए हैं। अगर राष्ट्रवादी सरकार केंद्र में नहीं रहती तो धीरे-धीरे यहां के बहुसंख्यक को का हाल वही होता जो पाकिस्तान में हिंदुओं का हुआ या बांग्लादेश में हो रहा है। आज आज देखिये कि कैसी विडंबना है अल्पसंख्यकों को विशेषाधिकार मिले हैं जबकि वह अधिकार भारत में रहने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं का होना चाहिए था। आज दुर्भाग्य की यह बात है कि बहुसंख्यक को को अपने अधिकार के लिए भारत में लड़ना पड़ रहा है। बहुसंख्यक बराबरी की मांग कर रहे हैं जो पूर्ववर्ती सरकारों ने उन्हें नहीं दिया, यह लोग बराबरी में आ कर रहना चाहते हैं। पता नहीं कितने षड्यंत्र होंगे, यह अधिकार भारत के बहुसंख्यक को को मिल भी पायेगा या नहीं। फिर भी यह स्पष्ट है कि नागरिकों, बहुसंख्यकों या अल्पसंख्यकों के किसी भी वर्ग द्वारा राज्य के खिलाफ किसी वास्तविक या कथित शिकायत की निगरानी देश की अखंडता और एकता के लिए हानिकारक होगी ही। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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