टीम एबीएन, भंडरा। मत्स्य पालन के परंपरागत तौर तरीकों को बदलकर जिंदगी की मुश्किलों को आसान बनाते हुए भंडरा चट्टी के पहलवान तिवारी ने महज 50 डिसमिल जमीन में नीली क्रांति को बढ़ावा देने का काम किया है। इतना ही जमीन में पांच बायो पौंड का निर्माण करा कर उसमें डेढ़ लाख सिंघी मछली पालन का काम आरंभ किया है। क्षेत्र में बायो पौंड के माध्यम से मछली पालन का यह तरीका लोगों के लिये फिलहाल प्रेरणा बन गया है। उन्होंने बताया कि बायो पौंड फीस फार्मिंग के तहत छोड़े गये ये मछली जीरा बंगाल से मंगाए गये हैं। ये सभी आईएमसी ग्रुप के हैं। इसे जिंदा रखने के लिये आक्सीजन ब्लोअर और तीन वाटर रीसाइक्लिंग मशीन लगाये गये हैं। मत्स्य फार्मिंग की सफलता के लिये नियमित रुप से पानी में अमोनिया टेस्ट, फूड कंजंप्शन रेसियो टेस्ट, पीएच वेल्यू, टीडीएस टेम्प्रेचर, आॅक्सीजन टेस्ट किये जाते हैं। श्री तिवारी ने बताया कि एक्वा कल्चर विधि से फिलहाल यहां छह माह में तीस टन मछली का उत्पादन होगा। एक्वा फीस फार्मिंग में रोजगार की अच्छी संभावनाएं हैं। किसान अपने छोटे भूखंड में भी इस विधि से मछली पालन कर अच्छी कमाई कर सकते हैं। बायो फीस फार्मिंग के प्रेरणा स्रोत बने पहलवान तिवारी ने बताया कि सिंधी मछली की मांग शहरों में ज्यादा है। दो तीन सौ ग्राम में ही इसे बेचा जाता है। इसकी कीमत बाजार में आठ सौ रुपये प्रति किलो है। ब्लड संबंधी बीमारी में डॉक्टर भी सिंघी मछली खाने की सलाह देते हैं।
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