एबीएन डेस्क। इन दिनों भारत और अफगानिस्तान के बीच गतिविधियां तेज हो गई हैं। साफ नजर आ रहा है कि तालिबान उभार पर है। इससे भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या इस बात से भारत का दिल टूट जाना चाहिए कि अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस तरह वापस हटने का निर्णय लिया? या इस बदलाव में भी अवसर हैं? क्या तालिबान के साथ शत्रुता का रिश्ता रखना अपरिहार्य है? क्या हम यह मानकर चलें कि यह पाकिस्तान नियंत्रित इस्लामिक लड़ाकू संगठन बना रहेगा? जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान पर आक्रमण करके और मुशर्रफ को साझेदार बनाकर इस क्षेत्र को एक नया नाम दिया: अफ-पाक। क्या भारत अब इसे ऐसे ही स्वीकार कर ले? सन 2011 में मैंने एक आलेख लिखकर कारण बताया था कि क्यों भारत को अफ को पाक के लिए छोड़ देना चाहिए। तब से अब तक हम किस दिशा में बढ़े हैं? पहली बात, क्या ऐसा कोई प्रमाण है कि तालिबान निर्भरता या आभार जताने के लिए हमेशा पाकिस्तान का अनुचर बना रहेगा? एक ऐसा अटूट साझेदार जिसके लिए अगर पाकिस्तान-चीन शिखर बैठकों में इस्तेमाल होने वाला जुमला इस्तेमाल किया जाए तो जिसके साथ पहाड़ों से ऊंची और सागर से गहरी दोस्ती है? आप सोच सकते हैं, क्यों नहीं? क्या पहली पारी में तालिबान और पाकिस्तान के बीच ऐसा ही रिश्ता नहीं था? परंतु जैसा कि म्युचुअल फंड्स पर लिखी वैधानिक चेतावनी में कहा जाता है: अतीत का प्रदर्शन भविष्य के प्रदर्शन का मानक नहीं है। क्या यह कहावत भू-सामरिक हितों पर भी लागू होती है? विभिन्न देशों और समाजों की वैचारिक स्थिति चाहे जो भी हो, अंतत: वे अपने हित में काम करते हैं। क्या ऐसा कोई संकेत है कि इस बार तालिबान अलग साबित हो सकता है? उनके तौर तरीके, इस्लाम की उनकी व्याख्या, महिलाओं, शिक्षा और नागरिक स्वतंत्रता को लेकर उनका नजरिया आदि आधुनिक समाज को बुरे लग सकते हैं। परंतु क्या जरूरी है कि इसके चलते वे भारत के शत्रु बन जाएं? क्या वे भारत से जंग छेड़ सकते हैं या हमारे खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान का साथ दे सकते हैं? इसमें उनका क्या फायदा? क्या वे भारत को इस्लामी राष्ट्र बना देंगे और हमें किसी खिलाफत का अंग बना देंगे? तालिबान बर्बर, मध्ययुगीन, स्त्री-विरोधी, गैर भरोसेमंद, दकियानूस हो सकते हैं या शायद इससे भी बुरे। परंतु वे मूर्ख या आत्मघाती नहीं हैं। वरना वे अमेरिका से दो दशक तक जूझने और उसे परास्त करने में कामयाब न हो पाते। अतीत के मुजाहिदीन के उलट उन्हें हथियारों से समर्थन देने वाले भी नहीं थे। बस पाकिस्तान ही चोरी छिपे उनकी मदद करता रहा। भारत के पश्चिम में पाकिस्तान के रणनीतिक नजरिये से देखने में नुकसान भी हैं। हम यह सोच कर परेशान हो जाते हैं कि अमेरिका पाकिस्तान को एक प्रसिद्ध जीत सौंपकर जा रहा है। पाकिस्तान के पास अब कुछ ऐसा है जो वह हमेशा से चाहता था: एक सामरिक गहराई। परंतु यह जीत कितनी भ्रामक है यह समझने के लिए फॉरेन अफेयर्स में हुसैन हक्कानी का लेख पढ़ा जरूरी है। इस क्षेत्र के मानचित्र पर एक नजर डालने पर पता चल जाएगा कि ऐसी कल्पना केवल रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय में बैठे बुद्धिमान ही कर सकते हैं जिनके बारे में माना जाता है कि उनका दिमाग सर में नहीं बल्कि कहीं और होता है। वे सन 1986-87 से ही ऐसे स्वप्न देख रहे हैं। इसलिए क्योंकि जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी के आॅपरेशन ब्रासटैक्स ने यह दु:स्वप्न पैदा कर दिया था कि भारतीय टैंक पाकिस्तान के संकरे इलाकों में वारसा संधि शैली में तेजी से पैठ बना सकते हैं। ऐसे में उसे रणनीतिक गहराई की जरूरत थी। पैंतीस वर्ष बाद दुनिया बदल चुकी है और रणनीतिक और सामरिक तस्वीर भी। इसके अलावा अब परमाणु हथियार भी हैं। यदि पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी अभी भी सोच रहे हैं कि हिंदुकुश पर्वत होते हुए अफगानिस्तान पहुंच सकते हैं या वहां कोई सामरिक बदलाव ला सकते हैं तो वे बहुत मासूम हैं। बीते 75 वर्ष से अधिक समय में दुनिया ने पाकिस्तानी सेना के बारे में एक बात सीखी है। सामरिक दृष्टि से वह शानदार है लेकिन रणनीतिक नजरिये से भ्रमित है। लेकिन क्या वह तालिबान के मित्र होने के नाते अपने परमाणु हथियार या एफ-16 लड़ाकू विमानों के दो बेड़े अफगानिस्तान भेज सकती है? हम तटस्थ आकलन कर सकते हैं कि अफगानिस्तान में कौन जीता और कौन हारा। यकीनन तालिबान जीते और अमेरिका और उसके सहयोगी हारे। लेकिन पाकिस्तान? तालिबान ने गत दो दशक में एक बात साबित की है कि वे उससे अधिक होशियार हैं। पाकिस्तान उनके देश को रणनीतिक गहराई हासिल करने के लिए इस्तेमाल करने की कल्पना कर रहा था लेकिन इन वर्षों में उन्होंने यह समीकरण उलट दिया। उन्होंने पाकिस्तान का इस्तेमाल अपनी रणनीतिक गहराई के लिए किया। ऐसा करके उन्होंने अमेरिका को हराया। बाइडन का जीत का दावा उतना ही खोखला है जितनी जॉर्ज डब्ल्यू बुश की यह आलोचना कि यह वापसी हड़बड़ी में की गई। बाइडन ने उस शर्मनाक हकीकत को स्वीकार किया जिसे बुश नहीं कर सके। अमेरिका वहां से बाहर निकल रहा है और उसने यह घोषणा भी कर दी है कि अफगानिस्तान में नए राष्ट्र का निर्माण कभी अमेरिका का लक्ष्य नहीं था। साफ कहें तो इस्तेमाल करो और फेंको। अमेरिका ने एक निर्वात छोड़ा है। तालिबान की पकड़ दिनबदिन मजबूत हो रही है। देखना है कि पाकिस्तान का क्या होता है? यदि लड़ाई लंबी चली तो तात्कालिक लाभ की आशा समाप्त हो जाएगी। डूरंड रेखा के आरपार घायल, बेघर, शरणार्थी नजर आएंगे। यदि तालिबान इसे जल्द निपटाने में कामयाब रहा तो भी उसे पाकिस्तानियों को कितना नियंत्रण सौंपना होगा? खासतौर पर तब जबकि उन्हें रणनीतिक गहराई की जरूरत नहीं होगी?आप कह सकते हैं कि वे चीन और पाकिस्तान के बीच फंस जाएंगे और एक अधीनस्थ देश के दर्जे में रहेंगे। परंतु अफगानिस्तान का इतिहास ऐसा नहीं बताता। वह इस क्षेत्र में रुचि रखने वाली अन्य शक्तियों मसलन ईरान और रूस के साथ सुलह कर सकता है।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse