एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय सनातन दर्शन के अनुसार 100 वर्ष की आयु को पुरुषार्थ की दृष्टि से आश्रम के चार भागों में विभक्त किया गया है। 1. ब्रह्मचर्य आश्रम, 2. गृहस्थ आश्रम, 3. वानप्रस्थ आश्रम, 4. सन्यास आश्रम।
25 वर्ष तक की आयु में विद्या अध्ययन, 25 से 50 वर्ष की आयु में पारिवारिक जीवन के कर्तव्यों का निर्वहन, 50 से 75 वर्ष की आयु तक घर में रहते हुए सामाजिक दायित्वों का निर्वहन और 75 से 100 वर्ष की आयु तक गृह का परित्याग करते हुए अर्जित अनुभव के आधार पर सेवा का कार्य करना; प्रथम पुरुषार्थ किस श्रेणी में आता है। जीवन की एक संपूर्ण अवधि में 1.. धर्म 2..अर्थ 3.. काम 4.. मोक्ष; पुरुषार्थ की दूसरी उत्तम श्रेणी में आता है।
दोनों श्रेणी के पुरुषार्थ के लिए स्वयं को तपाना पड़ता है। अंधकार से प्रकाश की ओर कदम बढ़ाना पड़ता है। गर्भस्थ शिशु अंधकार से प्रसव के बाद प्रकाश में अवतरित होता है। पृथ्वी के गर्भ के अंधकार में पड़े बीज धरती को चिर कर बाहर प्रकाश में उगता है और पौधा बनकर फूल फल प्रदान करता है।
पुरुषार्थ के धैर्य, संयम, संघर्ष, सहिष्णुता और कर्म अलंकार होते हैं, जबकि दृढ़ संकल्प पुरुषार्थ का प्राण वायु होता है। पुरुषार्थ की शक्ति से भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों उद्देश्यों की पूर्ति निश्चित रूप से की जा सकती है, और अंत में पूर्ण संतुष्टि के साथ विदाई में आलिंगनबद्ध हुआ जा सकता है।
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