एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सांसारिक व्यवस्था में हर कोई शक्तिशाली बनना चाहता है। पैसे की ताकत, पद की ताकत और प्रतिष्ठा की ताकत पाने की इच्छा सभी की होती है; बहुत लोग की इच्छा पूरी भी होती है, परंतु विरले लोग ही अपनी ताकत का इस्तेमाल सही समय, सही दिशा और सही तरीका से कर पाते हैं।
7 अक्टूबर 2001 को उन्होंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया था और 26 मई 2014 को उन्होंने प्रथम बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिया था, तब से लेकर आज तक लगभग 25 वर्षों से वे शासनाध्यक्ष के स्वरूप में पावरफुल रहे हैं और अपनी पावर का प्रयोग देश हित और जनहित में करते चले आ रहे हैं।
आलोचना, विरोध तथा दुष्प्रचार राजनीति का आवश्यक अंग है, जिसका सामना लगातार मोदीजी भी करते चले आ रहे हैं; लेकिन वह अपने मुख्य उद्देश्य से कभी विचलित हुए नहीं हैं जो किसी भी शक्तिशाली मानव के लिए कोई सरल बात नहीं है।
पद-पावर-प्रतिष्ठा के उचित नियोजन के लिए सामान्य व्यक्तित्व काफी नहीं होता है, इसके लिए तो प्रखर, संवेदनशील, दृढ़निश्चयी, निडर तथा अपने संगठन के लिए अडिग सिद्धांतवादी व्यक्तित्व चाहिए जिसे हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री ने अपने संघर्ष के बल पर प्राप्त किया है और जिसके आधार पर वे नित नए-नए सफलता के इतिहास गढ़ रहे हैं।
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