देव उठानी एकादशी 1 नवंबर को

 

तुलसी विवाह जागृता,भक्ति, शुभारंभ और पारिवारिक- सामुदायिक एकता का देता है संदेश : संजय सर्राफ

टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिन्दू धर्म में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी मनाया जाता है। जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्तान एकादशी भी कहते हैं इस वर्ष यह तिथि 1 नवंबर से प्रारम्भ होकर 2 नवंबर तक चलने वाली है। अगले दिन अर्थात द्वादशी तिथि में आमतौर पर तुलसी-विवाह का आयोजन किया जाता है। 

एक नवंबर को भद्रा दोपहर 3:30 से रात 2:56 बजे तक रहेगी। भद्रा काल में मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है, इसलिए तुलसी विवाह अगले दिन 2 नवंबर को होगा। एकादशी के दिन संपूर्ण विश्व के पालन करता श्री हरि विष्णु जी काव्य दिवस पूजन अर्चन करके योग्य निद्रा से जगाया जायेगा। कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि की शुरूआत 31 अक्तूबर की शाम 4:02 बजे से एक नवंबर की रात 2:56 बजे तक रहेगी। 

इस कारण से उदय कालिक स्थिति में प्रबोधिनी एकादशी व्रत एक नवंबर दिन शनिवार को रखा जायेगा। मान्यता है कि विष्णु चार माह के चातुर्मास (आषाढ़ एकादशी से कार्तिक एकादशी तक) योगनिद्रा में होते हैं और इस एकादशी के दिन जाग्रत होते हैं।  इसलिए इस दिन से शुभ कार्य, विवाह, गृह प्रवेश आदि मांगलिक कार्य आरंभ करने का समय माना जाता है। 

तुलसी-विवाह में पवित्र तुलसी जी का विवाह शालिग्राम (विष्णु का प्रतीक) से कराने की परंपरा है। यह विवाह शुद्धता, भक्ति और आत्मसमर्पण का प्रतीक माना जाता है।  इस दिन व्रत रखना, पूजा करना, कथा सुनना और परिवार-समाज में समृद्धि-शांति की कामना करना बहुत शुभ माना जाता है। पुराणों में प्रसंग मिलता है कि तुलसी जी (स्वयं एक देवी रूप में) ने विष्णु भगवान की अर्चना-भक्ति की थी। 

उन्हें शाप-प्रायश्चित्त के रूप में तुलसी रूप में बनाया गया। अंतत: उन्हीं से भगवान विष्णु का विवाह शालिग्राम, अर्थात् स्वयं भगवान के प्रतीक से हुआ। इस विवाह को धार्मिक दृष्टि से शुभ कार्यों की शुरूआत माना गया। इस एकादशी पर व्रत करने से पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति की कामना की जाती है। विवाह-गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों को पुन: आरंभ करने का समय माना जाता है। 

तुलसी-विवाह से गृह में लक्ष्मी-विष्णु की कृपा बनी रहने की आशा की जाती है और कन्यादान, व सामाजिक सम्मान का लाभ माना जाता है। देवउठनी एकादशी तथा तत्क्रम में आने वाला तुलसी-विवाह आज भी हमारी हिंदू संस्कृति में गहरी धार्मिक व सामाजिक भूमिका निभाता है। 

इस दिन जागृता, भक्ति, शुभ आरंभ और पारिवारिक-सामुदायिक एकता का संदेश समाहित है। इस प्रकार, यदि हम इस पर्व को श्रद्धा-भक्ति एवं परंपरा के साथ मनाएं, तो न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक रूप से भी समृद्धि-शांति का अनुभव कर सकते हैं।

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