इस कद की कोई माप नहीं...

 

मनोहर रूद्र पाण्डेय 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। रात का तीसरा पहर है। नींद नहीं आ रही। सोचा, जरा सोशल मीडिया टहल आया जाए। रात बारह बजे के बाद तारीख बदल चुकी है, 17 सितंबर हो गया है। विश्वकर्मा पूजा है। सुबह क्या होगा पता नहीं, मगर अभी सोशल मीडिया पर कहीं विश्वकर्मा पूजा की एक भी शुभकामना पोस्ट नहीं दिखी।

ऐसा नहीं है कि लोगों ने कोई नई पोस्ट नहीं डाली। पोस्ट तो जैसे तैर रहे हैं, और वह केवल एक बात की, मोदी जी के जन्मदिवस की बधाई पोस्ट।

मैं ऐसा नहीं कह रहा कि मोदी जी विश्वकर्मा के अवतार हो गए या भगवान से बड़े हो गये। भगवान तो भगवान हैं, इन्द्रियां वे ही चलाते हैं। बुद्धि के नियंत्रक भी भगवान ही हैं। श्रद्धा के सृजक भी वे ही हैं। हमारी आस्था के आधार भी भगवान ही हैं। सब कुछ उनकी महिमा के प्रभाव से ही तय होता है।

तो मैं सोचता हूँ कि एक से एक पढ़े लिखे, बुद्धिमान, हिन्दू आस्थावान, संस्कारी लोगों में यह प्राथमिकता किसने तय की कि बिना कुछ भूले, बिना देर किये, जितनी जल्दी हो, रात के बारह बजने की प्रतीक्षा करते हुए नववर्ष की पिछली रात की तरह तत्काल मोदी जी को उनके जन्मदिवस की बधाई दी जाए। आखिर बधाई पोस्ट की होड़ क्यों? किसे दिखाना है हमें? इस बधाई की भीड़ में हमारी पोस्ट कल कहाँ खो जाएगी, पता नहीं, फिर भी बधाई की जल्दी!!!

यह किसी को दिखाने का मामला नहीं, यह  कोई पोस्ट स्पर्धा नहीं। एक आत्मतुष्टि है। समझिये, एक कर्तव्य का बोध है। जिसे हम दिमाग में रखते हैं, वह विस्मृत हो सकता है, जिसे औपचारिक और ट्रेंड के अनुसार करना जरूरी समझते हैं, उसका समय तय नहीं होता, कभी भी पूरी कर सकते हैं, मगर जब हृदय किसी को सम्मान, आस्था, अद्वितीयता  या एक उत्सर्ग को आकुल प्राणी के रूप में ग्रहण करता है तो वह विश्वशिल्पी से पहले हमारा भावग्रहण करने का स्वयमेव अधिकारी हो जाता है। 

मैं नहीं जानता, भारत की आज से पचास साठ साल बाद आने वाली पीढ़ी, मोदी युग का मूल्यांकन किस प्रकार करेगी। राष्ट्र को एक कुशल शिल्पकार की तरह गढ़ने का जो जिम्मा इन्होंने उठाया है, वे इसकी सूरत यथेष्ट बदल पायेंगे या नहीं।

विनाशकारी तत्वों की सफल सक्रियता देखते हुए बताना मुश्किल है, मगर इतना जानता हूँ, कि आज इनकी राह में आंशिक राजनीतिक लाभ के लिए जितने लोग बाधा बनकर खड़े हैं, इनकी निंदा कर रहे हैं, राजनीतिक ईर्ष्या से अपमान करने की सारी हदें पार कर जा रहे हैं, वह एक महापाप है। ऐसा पाप, जिसका दंश उन्हें भुगतना ही होगा।
बस और कुछ न कहूँगा।

हर व्यक्ति अपने हिसाब से, सोच से, आकलन करता है। मैंने भी किया है। करता ही आ रहा हूँ, सुनता भी आ रहा हूँ। अंधभक्त तो तकिया कलाम हो गया है, मोदी जी का प्रशंसक यह विशेषण अवश्य पाता है। विरोधी छोड़िये, स्वयं भाजपाई भी इन्हें भला- बुरा कहने से नहीं चूकते। 

उनसे क्या कहूँ, वे ईमानदारी से पिछले पंद्रह वर्ष और उसके पहले के हालात को दो हिस्सों में बांटकर मूल्यांकन कर लें, तो उन्हें साफ दिखेगा कि एक मूर्तिकार मूर्ति के अंग- प्रत्यंग को सही रूप देने, गढ़ने, सँवारने के लिए उस पर चढ़कर अपना श्रम और कला समर्पित करता है, तब वह उस मूर्ति के कद से बड़ा प्रतीत होता है। मगर यह सत्य नहीं है, मूर्तिकार का कद विग्रह से बड़ा कभी नहीं हो सकता।

याद रहे, राष्ट्र विग्रह है और यह शिल्पकार हमारा भाग्य। हमें उसके श्रम, समर्पण, और नीयत के कद की माप कभी नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि यह भाग्य से होता है और भाग्य के कद की कोई माप नहीं होती। यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी पर विश्वशिल्पी भगवान की कृपा बनी रहे, वे दीर्घायु हों। (लेखक स्वतंत्र स्तम्भकर हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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