रिम्स-2 : आदिवासियों की जमीन बचाने उतरा जनजाति आयोग

 

  • रिम्स-2 निर्माण को लेकर विवाद गहराया, आदिवासी रैयतों के समर्थन में उतरा जनजाति आयोग

टीम एबीएन, रांची। कांके प्रखंड के नगड़ी में प्रस्तावित रिम्स-2 के निर्माण को लेकर प्रदेश में सियासी संग्राम तेज हो गया है। एक ओर जहां स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी इस परियोजना को लेकर अडिग हैं, वहीं उनकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री बंधु तिर्की इसके विरोध में खुलकर सामने आ गए हैं। नगड़ी के ग्रामीण रैयतों ने भी प्रस्तावित जमीन को देने से साफ इनकार कर दिया है। 

ग्रामीणों और स्थानीय नेताओं का कहना है कि जिस भूमि पर रिम्स-2 के निर्माण की योजना है, वह कृषि योग्य है और वहां पर सैकड़ों वर्षों से आदिवासी समुदाय खेती कर रहा है। ग्रामीणों ने इसे अपनी आजीविका का मुख्य स्रोत बताया है। भूमि विवाद को लेकर ग्रामीणों ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को लिखित शिकायत भी की थी। इसी के आलोक में शनिवार को आयोग की सदस्य डॉ. आशा लकड़ा नगड़ी गांव पहुंचीं और ग्रामीणों से प्रत्यक्ष संवाद किया।

आयोग की सदस्य डॉ. लकड़ा ने बताया कि रैयतों ने उन्हें बताया कि वे पूरी तरह खेती पर निर्भर हैं और जिस जमीन पर रिम्स-2 का निर्माण प्रस्तावित है, वह उनकी जीवनरेखा है। ग्रामीणों के अनुसार, कांके से नगड़ी की ओर पूर्वी क्षेत्र में 202 एकड़ और पश्चिमी क्षेत्र में 25 एकड़ भूमि है, जिस पर लगभग 250 परिवार निर्भर हैं। यदि यह जमीन अधिग्रहित हो जाती है, तो उनके पास न तो अंतिम संस्कार के लिए जगह बचेगी, न ही धान संग्रहण और खेती के लिए कोई भूमि।

डॉ. लकड़ा ने कहा कि अनुसूचित जनजाति समाज का जीवन जल, जंगल और जमीन से जुड़ा होता है। यदि जमीन ही छिन जाएगी, तो वे पूरी तरह उजड़ जाएंगे। उन्होंने बताया कि प्रशासनिक दबाव के कारण ग्रामीणों को खेती करने से भी रोका जा रहा है, जिसके चलते वे सड़क पर बिचड़ा तैयार करने को मजबूर हैं। वहीं कई ग्रामीणों पर केस दर्ज कर जेल भेजा गया, हालांकि अब वे जेल से रिहा हो चुके हैं और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

डॉ. लकड़ा ने यह भी जानकारी दी कि 2011 तक गांव वालों ने जमीन का रसीद कटवाया था, लेकिन 2012 के बाद से रसीद नहीं कटी है। ग्रामीणों ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जमीन से जुड़े दस्तावेज मांगे हैं, लेकिन विभाग के पास अधिग्रहण से संबंधित कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि अधिग्रहण हुआ भी हो, तो कानून के अनुसार यदि पांच वर्षों तक निर्माण कार्य नहीं होता है, तो जमीन स्वतः रैयतों को वापस मिल जाती है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग इस मामले को गंभीरता से संज्ञान में ले चुका है। आयोग इस संबंध में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार, राष्ट्रपति और गृह मंत्रालय को भेजेगा। इसी क्रम में डॉ. आशा लकड़ा ने शनिवार को अपनी पांच सदस्यीय टीम के साथ राजभवन जाकर राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से शिष्टाचार भेंट की। 

इस दौरान उन्होंने पेसा कानून, नगड़ी में कृषि योग्य भूमि पर रिम्स-2 के निर्माण तथा आदिवासी समाज से जुड़े मामलों पर चर्चा की। आयोग ने स्पष्ट किया है कि आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे और जल्द ही संबंधित अधिकारियों को नोटिस भी जारी किया जायेगा।

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