टीम एबीएन, रांची। साहिबगंज और राजमहल की पहाड़ियों में निवास करने वाला सौरिया पहाड़िया समुदाय आज भी शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। इस समुदाय को कई बार ब्लूपति की कगार पर खड़ा कहा जाता है और इसका एक प्रमुख कारण शिक्षा की भारी कमी है, जो समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने में सबसे बड़ी बाधा बनती है।
ऐसे ही हालातों से जूझ रही हैं गुली पहाड़िन, जो पिछले एक वर्ष से अपनी तीन अनाथ पोतियों के भविष्य को लेकर चिंतित थीं। गुली पहाड़िन का बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा और उसकी पत्नी भी उन्हें छोड़ गयी। अब इन तीन मासूम बच्चियों की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी गुली के कंधों पर है।
गुली पहाड़िन चाहती थीं कि उनकी पोतियों को अच्छी शिक्षा मिले, लेकिन आर्थिक तंगी और कागजी प्रक्रियाओं की उलझनों ने उन्हें बार-बार निराश किया। झारखंड सरकार द्वारा संचालित विशिष्ट पहाड़ीयाण आवासीय विद्यालयों में बच्चों का नामांकन गुली का सपना था, लेकिन उम्र और जानकारी की कमी के कारण दो वर्षों तक बच्चियों का नाम सूची में नहीं आया।
फरवरी 2025 में इस मामले पर एक सामाजिक कार्यकर्ता शिखा पहाड़िन की नजर पड़ी और इसके बाद गुली पहाड़िन व उनकी पोतियों को उचित मार्गदर्शन और समर्थन मिलना शुरू हुआ। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में आवेदन दिया गया और विशिष्ट पहाड़ी कल्याण पदाधिकारी से संपर्क किया गया। इसके बाद उपायुक्त तक भी गुहार लगायी गयी ताकि अनाथ बच्चियों को उनका शिक्षा का अधिकार मिल सके।
लगातार तीन महीनों के प्रयासों और अधिकारियों के सहयोग से अंतत: तीनों बच्चियों के नामांकन की मंजूरी मिल गयी। यह न केवल गुली पहाड़िन की व्यक्तिगत जीत है, बल्कि यह उन तमाम आदिवासी महिलाओं और बच्चों की उम्मीद भी है जो अब भी ऐसे ही हालातों में जीवन बिता रहे हैं।
यह घटना यह दर्शाती है कि भाषा और शिक्षा की कमी आज भी लोगों को उनके अधिकारों से वंचित कर रही है। यदि गुली पहाड़िन को समय पर सहायता न मिली होती, तो शायद इन बच्चियों को शिक्षा का अधिकार नहीं मिल पाता।
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