- प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ पर एक विशेष लेख - के. कृष्णमूर्ति, श्रीधाम वृंदावन
- 21वीं सदी का महाकुंभ: आस्था और अध्यात्म बनाम मीडिया की ग्लैमरवादी प्रस्तुति : धार्मिक चेतना पर प्रभाव, महाकुंभ के लाभ और संरक्षण!
के. कृष्णमूर्ति
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सनातन धर्मावलंबियों की आस्था का पवित्र महाकुंभ धार्मिक अनुष्ठानों, आध्यात्मिक जागरण और साधना का महत्वपूर्ण केंद्र है। यह पर्व आत्मशुद्धि, ध्यान और मोक्ष की साधना के लिए जाना जाता है। लेकिन आधुनिक मीडिया युग में महाकुंभ को आध्यात्मिकता के बजाय ग्लैमर-केंद्रित दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जा रहा है, जहां सेलिब्रिटी संस्कृति, बाहरी आकर्षण और दिखावे को अधिक महत्व दिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप श्रद्धालु और साधक इस महान धार्मिक आयोजन के आध्यात्मिक लाभ से वंचित हो रहे हैं। इस परिवर्तन के पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :
- टीआरपी और व्यावसायिक लाभ के लिए मीडिया आज के दौर में अधिकतम दर्शकों को आकर्षित करने पर केंद्रित है। अध्यात्म और आस्था जैसे विषय, जो गहरे आत्मिक पहलुओं को दर्शाते हैं, अक्सर जटिल और गंभीर होते हैं। इसके विपरीत, ग्लैमर, चकाचौंध और सनसनीखेज प्रस्तुतिकरण से दर्शकों का ध्यान खींचने का आसान तरीका बन गया है। यही कारण है कि इन तीन चेहरों पर ही मुख्य धारा की मीडिया एवं सोशल मीडिया ने लोगों का सारा कुंभ के आध्यात्मिक महत्व को खत्म कर दिया, क्या तन की खूबसूरती, आंखों की सुंदरता एवं एक आइआइटी जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त युवा का बाबा बनना आदि। क्या यही कुंभ की आध्यात्मिक, परंपरागत व ऐतिहासिक धरोहर रही है। एक बार गंभीरतापूर्वक जरूर विचार करें ...।
- दुनिया के यह सबसे बड़ा आध्यात्मिक आयोजन दिव्य महाकुंभ के धार्मिक-आध्यात्मिक समंदर में हमने चुना भी तो क्या चुना? पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित ग्लैमर, चकाचौंध भरी दुनिया जिसे हम चौक-चौराहे पर भी खोज सकते थे। क्या उसे ही खोजने के लिए हमने मोक्षदाई महाकुंभ जैसे पवित्र स्थल को चुना? एक बार गंभीरतापूर्वक जरूर विचार करें ...।
- मीडिया की इस ग्लैमर भरी दिखावे की बढ़ती परंपरा के कारण इस महाकुंभ में सनातन धर्म की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं सबसे पौराणिक परंपराओं की जिस प्रकार से ह्रास हुई है। इसके लिए जितनी जिम्मेवार मीडिया है, उससे कहीं ज्यादा जिम्मेवार हम सब हैं। क्योंकि 21वीं सदी की विशेष कर युवा पीढ़ी आध्यात्मिक अनुष्ठान, शास्त्र व सत्संग की मूल सैद्धांतिक परंपराओं को अंधविश्वास के दृष्टिकोण से देखती है। धार्मिक गतिविधियों में आज की युवा पीढ़ी अगर भूमिका निभाती भी है तो, उसमें कहीं ना कहीं मीडिया फोबिया यानी दिखावे का प्रचलन ज्यादा दिखता है।
- धार्मिक व सांस्कृतिक गहराई की समझ की कमी के कारण मीडिया महाकुंभ के आध्यात्मिक महत्व को नजरअंदाज कर साधु-संतों की वेशभूषा, विदेशी पर्यटकों और भव्यता को ही प्रमुखता देती है, जिससे आज की युवा पीढ़ी सनातन संस्कृति की मूल सैद्धांतिक पृष्ठभूमि से पूर्ण परिचित नहीं हो पा रही है।
- मीडिया की बदलती प्राथमिकताओं के कारण आस्थावान श्रद्धालुओं की आध्यात्मिक हानि तेजी से हो रही है, और नयी पीढ़ी भारतीय सनातन धर्म की पौराणिक ऐतिहासिक परंपराओं से धीरे-धीरे विमुख होती जा रही है।
कुंभ व महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक उन्नयन और मोक्ष प्राप्ति का महान अवसर है। सनातन धर्मावलंबी इससे निम्नलिखित प्रकार से लाभान्वित हो सकते हैं :-
- कुंभ व महाकुंभ में पवित्र स्नान के माध्यम से आत्मशुद्धि व मोक्ष की प्राप्ति - महाकुंभ में गंगा, यमुना एवं सरस्वती जैसे पवित्र नदियों में स्नान करने मात्र से मनुष्य के जीवन में पापों के नाश और मोक्ष प्राप्ति हेतु विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार, संगम पर स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं और, आत्मा को दिव्य चेतना प्राप्त होती है, जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
- वर्षों-वर्षों से मानव कल्याण एवं विश्व कल्याण हेतु हिमालय के कंदराओं में, अमरकंटक की गुफाओं में एवं कई पवित्र तीर्थ स्थानों पर गंभीर साधना रत संतों व महापुरुषों का सान्निध्य प्राप्त करना - कुंभ व महाकुंभ मेला में ऐसे हीं ईश्वरीय साधना रत संत-महात्माओं, आचार्यों और योगियों से प्रत्यक्ष रूप से दर्शन एवं उनके सत्संग का अवसर प्राप्त करने का संयोग मिलता है। साधु, संतों एवं महात्माओं के प्रवचनों, ध्यान-योग और साधना से धर्म, आध्यात्मिकता और भक्ति का गूढ़ ज्ञान प्राप्त होता है। साधकों को गुरुकृपा मिलती है, जिससे आत्मज्ञान और मोक्ष प्राप्ति की दिशा में विशेष मार्गदर्शन मिलता है।
- कुंभ व महाकुंभ में दान, जप व तप द्वारा आत्मिक उन्नति का एक बेहतर अवसर - कुंभ व महाकुंभ में दान, जप, कल्पवास एवं तप का विशेष महत्व है। यहां किया गया दानझ्र जैसे अन्नदान, गौदान, वस्त्रदान : कई गुना फलदायी होता है। नियमित मंत्रजप, ध्यान और तपस्या से व्यक्ति के भीतर सात्विकता बढ़ती है, जिससे उसकी आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है और वह मोक्ष मार्ग पर तेजी से अग्रसर होता है।
- कुंभ मेला सनातन संस्कृति व धर्म-अध्यात्म का गूढ़ ज्ञान आदि का एक साथ प्राप्त करने का संयोग प्रदान करता है - महाकुंभ सनातन संस्कृति, शास्त्रों, पुराणों और धर्मग्रंथों से जुड़े अनमोल ज्ञान को आत्मसात करने का अवसर प्रदान करता है। साधु संतों द्वारा लगातार किए जा रहे प्रवचनों, कथा, कीर्तन और संत समागम से सनातन धर्म का महत्वपूर्ण गूढ़ ज्ञान प्राप्त कर मनुष्य अपने जीवन को धर्मपरायण बना सकता है, जिससे उसकी ईश्वर प्रिय बनने व मोक्ष प्राप्ति की दिशा में तेजी से प्रगति होती है।
- कुंभ मेला के आयोजन में भक्ति-भाव और साधना द्वारा अदृश्य महात्मा जैसे महावतार बाबा आदि एवं ईश्वर से साक्षात्कार करने हेतु एक विशेष अवसर का संयोग - महाकुंभ में भक्ति, कीर्तन, हवन-यज्ञ और विशेष पूजा-पाठ से मनुष्य की आस्था और आध्यात्मिक शक्ति प्रबल होती है। ध्यान व साधना से भाव व विचार शुद्ध होते हैं और, जिससे भक्त को ईश्वर के दिव्य अनुभव प्राप्त होने लगते हैं। इसलिए विशेष कर 144 वर्ष के अंतराल में लगने वाले महाकुंभ का यह पावन पुनीत दिव्य अवसर सकारात्मक शक्तियों के संचार एवं परमात्मा से साक्षात्कार और मोक्ष प्राप्ति का उत्तम अवसर प्रदान करता है।
महाकुंभ केवल बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक जागरण और मोक्ष प्राप्ति का पवित्र अवसर है, जिसका हर सनातन धर्मावलंबी को पूर्ण लाभ उठाना चाहिए। कुंभ व महाकुंभ भारतीय सनातन परंपरा की अमूल्य धार्मिक-आध्यात्मिक व सांस्कृतिक धरोहर है। इस पवित्र परंपरा की विस्तार एवं संरक्षण हेतु निम्नलिखित महत्वपूर्ण कदम उठाये जा सकते हैं : -
- 1. सुनियोजित पर्यावरण संरक्षण हेतु गंभीरतापूर्वक पहल - कुंभ मेले के दौरान गंगा व अन्य नदियों में प्रदूषण अत्यधिक बढ़ जाता है। सरकार व समाज को मिलकर नदियों की स्वच्छता अभियान चलाना चाहिए, प्लास्टिक प्रतिबंध को सख्ती से लागू करना चाहिए, और जैविक कचरे की सफाई व स्वच्छता हेतु प्रभावी प्रबंधन करना चाहिए।
- कुंभ व महाकुंभ जैसी भारतीय सनातन की ऐतिहासिक धार्मिक-आध्यात्मिक, संस्कृति एवं परंपराओं की दस्तावेजीकरण करने हेतु गंभीर पहल करनी चाहिए - कुंभ मेले की आध्यात्मिकता, धार्मिक रीति-रिवाज, ऐतिहासिक संदर्भ, और संत परंपराओं को उचित रूप से संरक्षित करने के लिए विस्तृत शोध, डिजिटल संग्रहालय और सभी प्रचलित भाषाओं में साहित्य का निर्माण आवश्यक है। इससे आने वाली भविष्य की पीढ़ियां प्रशिक्षित होगी और इसकी मूल धार्मिक-आध्यात्मिक महत्ता को समझ सकेंगी।
- प्रबंधन व बुनियादी ढांचों का आधुनिकीकरण करने हेतु गंभीरतापूर्वक पहल करने की जरूरत - कुंभ व महाकुंभ मेले में करोड़ों श्रद्धालु आते हैं, जिससे बुनियादी ढांचे पर भारी दबाव पड़ता है। आधुनिक तकनीक और स्मार्ट सिटी प्रबंधन के माध्यम से यातायात, स्वच्छता, चिकित्सा सेवाओं और सुरक्षा आदि की उचित व्यवस्था हेतु विकसित आज की नई तकनीकी को गंभीरता पूर्वक प्रयोग किये जाने से काफी लाभ होगा।
- कुंभ व महाकुंभ मेले के पूर्व आध्यात्मिक शिक्षा व जागरूकता अभियान गंभीरता पूर्वक चलाने की जरूरत - समाज में कुंभ और महाकुंभ की आध्यात्मिक महत्ता को बढ़ाने के लिए शॉर्ट फिल्म बनाकर उसे सभी विद्यालयों, विश्वविद्यालयों व मीडिया के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। जिससे अगली पीढ़ी एवं विशेष कर युवा पीढ़ी भारतीय सनातन संस्कृति की कुंभ व महाकुंभ जैसे ऐतिहासिक परंपरा के प्रति जागरूक और प्रेरित हो सकेंगे।
- संत समाज व प्रशासन का समन्वय आवश्यक - कुंभ मेले का आयोजन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें संत समाज, धार्मिक संगठनों और स्थानीय समुदाय की भी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी आवश्यक है। इससे सनातन की धार्मिक-आध्यात्मिक ऐतिहासिक कुंभ व महाकुंभ मेले की दिव्यता, पवित्रता एवं उद्देश्यों का समुचित संरक्षण हो सकेगा।
उपरोक्त प्रयासों से कुंभ और महाकुंभ की परंपरा न केवल सुरक्षित रहेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक इसकी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्ता भी बनी रहेगी।
पृष्ठभूमि
महाकुंभ भारतीय सनातन-संस्कृति परंपरा के पवित्र आस्था का पर्व है। महाकुंभ धार्मिक-आध्यात्मिक पर्व के साथ-साथ वैज्ञानिक परिदृष्टि एवं वैज्ञानिक परीक्षण की कसौटी पर भी उतनी हीं खरी उतरती है। उदाहरण के लिए संक्षिप्त टिप्पणी : बृहस्पति मकर राशि में और सूर्य व चंद्रमा अन्य शुभ स्थानों पर होते हैं, तब महाकुंभ का समय बनता है और, यह संयोग प्रत्येक 144 वर्ष में एक ही बार आता है। इस संयोग को भारतीय सनातन संस्कृति परंपरा में धार्मिक-आध्यात्मिक जागरण व उन्नयन के लिए विशेष रूप से शुभ और दिव्य माना जाता है। प्रत्येक 144 वर्ष में एक दुर्लभ खगोलीय घटना होती है, जो प्रत्येक 12 वर्ष में चार स्थानों पर आयोजित होने वाले कुंभ मेले को विशिष्ट बनाकर महाकुम्भ बना देती है, और यह 2025 में प्रयागराज के पावन धरा पर आयोजित दिव्य मोक्षदाई महाकुंभ संगम का संयोग 144 वर्ष के बाद सनातन धर्मावलंबियों को प्राप्त हुआ है। (लेखक श्रीधाम वृन्दावन के सामाजिक और आध्यात्मिक चिंतक हैं।)