एबीएन एडिटोरियल डेस्क। काशी की कायाकल्प में लगे प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश में विकास की गंगा को भी नमन किया। आधारभूत संरचना के विकास से देश का सबसे अधिक भला होता है। युवाओं में मोदी का जबरदस्त क्रेज है मोदी-मोदी करती युवाओं की भीड़ काशी की सड़कों पर प्रसन्नता से लवरेज दिखी। लेकिन जब एक युवा से संवाददाता ने पूछा कि आप मोदी जी के विकास यात्रा से कितना खुश है तो उसने कहा कि विकास तो ठीक है लेकिन सरकारी नौकरियां भी दें मोदी जी। एचईसी हटिया में हड़ताल 20 दिन पूरा कर चुका है। मात्र एक हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था न कर पाने के कारण एक पूरा हटिया शहर की व्यवस्था छिन्न-भिन्न है। कोरोना की मार में मोदी जी की कंपनी के मजदूर मारे-मारे फिर रहें हैं संदेश तो यही जाता है। लूटा और बर्बाद किसने किया यह तो चुनावी भाषण का विषय है लेकिन गरीबी से कराहते कामगार क्या उत्पादन करेंगे यह यक्ष प्रश्न हैं। संकेत साफ है कि यूपी, बिहार और झारखंड में जॉब का अर्थ ही है सरकारी नौकरियां। आखिर देश के लगभग 25 करोड़ परिवार में लगभग 5 करोड़ ही तो हैं जो सर्व सुविधा संपन्न है। कुल मिलाकर 30 करोड़ लोगों का देश संपन्न भारत। मोदी ने निजीकरण की जो गति तेज की है उससे बिहार, झारखंड और यूपी सहित पूरे उत्तर भारत की राज्यों में जहां औद्यागिक विकास की गति धीमी रही है जॉब नहीं मिले हैं। निजीकरण का लाभ देश में असमान रहा है। आज भी युवाओं को सरकारी नौकरी ही पहली पसंद है। झारखंड सहित उत्तर भारत के राज्यों में न निजीकरण तेज हुआ न उद्योग लगा साथ ही सरकारी नौकरियां नीतिगत तौर पर कम कर दी गयी। बिहार के चुनाव में सबसे हिट नारा था दस लाख नौकरियों का जो तेजस्वी ने दिया और जीते भी, सबसे बड़ी पार्टी बनी लालू यादव के जंगलराज युक्त राष्टÑीय जनता दल (कथित रूप से) आखिर क्यों? क्योंकि बिजली, पानी सड़क के बाद अब सबसे अधिक आवश्यक जॉब है जो महाराष्टÑ गुजरात और दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत में कम है। क्या यूपी में यह नारा काम नहीं करेगा? मोदी कांग्रेस से न हारें लेकिन महंगाई से कराहती भारतीय आबादी है लगभग 100 करोड़ से हार सकते हैं। राष्टÑवाद का नारा क्षणिक प्रभाव छोड़ता है। उस वर्ग के लिये बहस का विषय है जो वर्तमान समय में आर्थिक रुप से मजबूत है। इनकी संख्या कुल संख्या में दो करोड़ परिवार तक सीमित है। कंपनियां अरबों के निवेश से विनिर्माण इकाइयां लगाएं, हजारों की संख्या में बढ़िया वेतन वाले रोजगार पैदा हों और संपन्नता का एक पनाहगाह बनकर उभरे, ताकि यह पिछड़ा राज्य आगे बढ़ सके। आलोचकों ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी की उपलब्धियों पर जो सवाल उठाए उसका मुख्य आधार यही रहा है कि उन्होंने इस राज्य में दशकों से कायम संपन्नता एवं सक्षमता का फायदा उठाया। भारत के नेता के तौर पर मोदी आर्थिक एवं बदलावकारी प्रतिभा दशार्ने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं और कोविड-19 महामारी के समय उनके कमजोर प्रदर्शन से पहले ही यह बात उजागर हो चुकी थी। मोदी के लिए बिहार अपनी विकासपरक क्षमताएं दर्शाने के लिए एकदम साफ स्लेट है। बिजली, सड़क, पानी देने और कानून व्यवस्था की हालत सुधारने से जुड़ी अपनी उपलब्धियों के लिए तीन बार से मुख्यमंत्री पद पर आसीन नीतीश को सुशासन का खिताब दिया जाता रहा है। अगर बिजली देने के मामले में ही उनकी उपलब्धियां देखें तो बेहतर काम हुआ है। नीतीश के दौर में बिहार में बिजली खपत 700 मेगावॉट से बढ़कर 6,000 मेगावॉट हो गई और लालटेन युग का खात्मा हो गया। लेकिन आज राजद सबसे बड़ा दल क्यों है? यह सवाल बिहारका महत्वपूर्ण सवाल है लेकिन निश्चित रूप से बिहार के लोगों ने इस बदलाव को खुद महसूस किया है। फिर भी यह विडंबना ही है कि सुशासन के बावजूद बिहार अब भी बीमारू राज्यों में बना हुआ है और विकास के तमाम मानदंडों पर होने वाली रैंकिंग में अक्सर निचले पायदानों पर मौजूद रहता है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक कार्यालय के महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त गोविंद भट्टाचार्य ने इकनॉमिक सर्वे आॅफ बिहार का हवाला देते हुए कई विसंगतियों को रेखांकित किया है। उनका कहना है कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के एक-तिहाई से भी कम है, सकल राज्य घरेलू उत्पाद में विनिर्माण की हिस्सेदारी 2015-16 और 2018-19 के दौरान एक फीसदी अंक गिरी है और राज्य के 38 में से 13 जिले देश के सर्वाधिक पिछड़े 117 जिलों में शामिल हैं। बिहार के निराशाजनक प्रदर्शन के इन संकेतकों को सामने रखने के साथ ही भट्टाचार्य यह भी कहते हैं कि इस स्थिति के लिए अकेले नीतीश को जिम्मेदार ठहराना अनुचित होगा। भारत में जनसेवा में लगा कोई भी व्यक्ति सुधारों की राह में खड़े संस्थागत अवरोधों से बखूबी परिचित होगा। जहां तक बिहार का सवाल है तो वह सामाजिक पिछड़ेपन एवं भ्रष्टाचार के अतीत में इस कदर फंसा हुआ है कि वहां पर बड़े सुधार ला पाना कोई छोटी चुनौती नहीं है। बिहार राज्य की 75 फीसदी से अधिक आबादी के खेती पर ही निर्भर होने से कारखानों के लिए बड़े पैमाने पर जमीन तलाशना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। बिहार उन राज्यों में से एक है जहां जमीन का अधिग्रहण करना बहुत कठिन है क्योंकि यहां पर भूमि स्वामित्व के रिकॉर्ड गड़बड़ हैं। हाल में शुरू की गई स्वामित्व योजना बिहार में जमीन के मालिकाना हक संबंधी रिकॉर्ड की समस्या को काफी हद तक दूर कर सकती है। पहले हर संसदीय क्षेत्र में और अब हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज खोलने का दावा करने वाले पीएम मोदी का यह समझ बेहतरीन है लेकिन इसमें झारखंड कहां है? खस्ताहाल स्वास्थ्य देखभाल ढांचे को दुरुस्त करने के लिए केंद्रीय फंड देने के साथ ही केंद्र की स्वास्थ्य बीमा योजना का विस्तार भी कर सकते हैं। उनके सामने बेशुमार मौके हैं। काशी प्रतीक है कायाकल्प का लेकिन दिल्ली का रास्ता झारखंड बिहार और काशी (यूपी)होकर ही जाता है। वैसे युवाओं का काम या स्वरोजगार दोनों एक चुनौती भी है।
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