राज्य के असमान विकास को खत्म करना होगा

 

एबीएन डेस्क (शिवशंकर उरांव)। झारखंड में सभी क्षेत्रों में एक समान विकास नहीं हुआ है। राज्य के 21 साल पूरे होने का अर्थ है दो दशक का पूरा होना। अगर देश में परिवर्तन और विकास की बात करें तो दो दशक में परिवर्तन की गति अन्य राज्यों से बहुत कम नहीं है। लेकिन पहले से जो उपेक्षा हुई है उसे पूरा करने के लिये अभी की गति पर्याप्त नहीं है। जब तक एक भी झारखंडी रोजगार के लिये दूसरे राज्य में जाने के लिये मजबूर हो तब तक राज्य बनने के उदेश्य पूरा होता दिखाई नहीं देता है। विकास आकड़ों में हो यह आर्थिक विश्लेषकों के लिये, केन्द्र और राज्य सरकारों के लिये दुनिया के विभिन्न मंचों पर भाषण देने के लिये अच्छा होता है लेकिन जमीन पर हर गांव हर परिवार और हर व्यक्ति को सही पोषण, शिक्षा और सुरक्षा लोकतंत्र का सर्वाधिक उपरी मापदंड है। मैंने विगत तीन दशकों तक झारखंड के गुमला सहित सैकड़ों गांव में पैदल,क्योंकि सड़क थी ही नहीं यात्रा की है। मैं राज्य बनने के बाद देश में अनेको विशेषज्ञों से बात की उनमें एक व्यक्ति थे ओड़िसा के अजीत महापात्रा। राष्टÑपति कलाम ने अपनी विजय डॉक्मेंट्री में इस व्यति के बारे विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने लगभग दो घंटे की विस्तृत बातचीत की और मुझे बताया कि कैसे पंजाब का कायापलट प्रताप सिंह कैरों ने किया। ओड़िसा कैसे बदल रहा है। झारखंड निमार्ण के बाद वे बहुत आशान्वित थे कि इस राज्य की समृद्धि इतनी अधिक है कि इसे विकसित होने से कोई रोक नहीं सकता। अजीत महापात्रा जी का निधन हो गया है लेकिन उन्होंने दावा किया था कि अगर झारखंड की कृषि और पर्यटन पर फोकस किया जाए तो राज्य धन-धान्य से संपूर्ण हो विकसित राज्य में बदल जाएगा। वे आदिवासी जन समूह के बीच लंबे समय तक काम करने का अनुभव रखते थे। सेंट्रल कोल लिमिटेड के वरीय वित्त अधिकारी एडी बाधवा सहित कई पत्रकार मित्रों के साथ मैं भी झारखंड राज्य प्रोडक्टीविटी काउंसिल में था जिसका निमार्ण अजित महापात्रा ने किया है। यह गैर लाभकारी संस्था राज्य में सभी क्षेत्रों के उत्पादक को वैश्विक बनाने का काम करती है। जनजातिय समूह का जीवन वन उत्पाद पर ही निर्भर होता है खेती मॉनसून पर आधारित है। झारखंड के सामाजिक, आर्थिक एवं राजस्व सूचकांक 2017-18 की रिपोर्ट बताती है कि कृषि व इससे संबद्ध सरीखा प्राथमिक क्षेत्र खासा पिछड़ा हुआ है। अर्थव्यवस्था को जो गति मिली है वह सेवा क्षेत्र के बूते मिली है। कुछ योगदान विनिर्माण क्षेत्र का भी है। विकास दर में क्षेत्रवार विविधता भी पाई गई है। अच्छी बात यह है कि झारखंड में प्रति व्यक्तिआय में वृद्धि हुई है। वर्ष 2017-18 में प्रति व्यक्तिआय नियत मूल्य पर 57242 होने का अनुमान है जबकि वर्तमान मूल्य पर यह 70955 रहेगी। चालू वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.7 फीसद और प्रति व्यक्तिआय में 5.2 फीसद की वृद्धि का अनुमान है। हालांकि प्रति व्यक्ति आय अब भी राष्ट्रीय औसत से करीब 30 फीसद कम है। पिछले छह वर्षो का तुलनात्मक अध्ययन करने पर पता चलता है कि वर्ष 2011-12 से 2016-17 में तृतीयक क्षेत्र (सेवा क्षेत्र) में तो 9.30 फीसद की चक्रवृद्धि विकास दर दर्ज की गई है। जबकि कृषि व इनसे संबद्ध प्राथमिक क्षेत्र में महज 4.6 फीसद की। विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि का फीसद 5.3 रहा है। स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था के विकास में सेवा क्षेत्र का योगदान सबसे अधिक रहा है। पिछले छह वर्षो में अर्थव्यवस्था की औसत वार्षिक विकास दर में इस क्षेत्र का योगदान 56 फीसद रहा। जबकि प्राथमिक क्षेत्र का महज 18 फीसद और विनिर्माण क्षेत्र का 26 फीसद। जीएसवीए (सकल राज्य मूल्य संवर्द्धन) में भी कृषि प्रक्षेत्र खासा पिछड़ा हुआ साबित हुआ है। जीएसवीए में इस क्षेत्र का योगदान महज 15 फीसद रहा है। जबकि विनिर्माण जिसे दूसरा क्षेत्र भी कहा जाता है का 45 फीसद और सेवाओं का 40 फीसद। आय व रोजगार में क्षेत्रवार असंतुलन बरकरार : राज्य में आय और रोजगार में क्षेत्रवार असंतुलन बरकरार है। खनन और विनिर्माण के क्षेत्र में लगे लोगों के पास जीएसवीए आय का 34 फीसद है, जबकि कृषि कार्य में लगे हुए लगभग 50 फीसद लोगों के पास जीएसवीए का महज 16 फीसद है। रांची समेत सिर्फ छह जिले विकसित बाकी सभी पिछड़े : आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट बताती है कि राज्य के सिर्फ छह जिले जिनमें रांची, बोकारो, रामगढ़, धनबाद, पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां ही विकसित श्रेणी में आता है। अन्य जिले पिछड़े हुए हैं। लोहरदगा, साहिबगंज, जामताड़ा, लातेहार, गुमला, खूंटी, सिमडेगा, पाकुड़, दुमका, गोड्डा, चतरा, पलामू और गढ़वा सबसे पिछड़े जिले माने गए हैं। काबू में रहा वित्तीय घाटा : झारखंड का वित्तीय घाटा पिछले कुछ वर्षो में काबू में रहा है। यह वित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) के निर्धारित मानक 3.5 फीसद के भीतर रहा है। वर्ष 2015-16 और 2016-17 में उदय योजना के तहत उधार लेने की वजह से इसकी सीमा पार हुई थी। वर्ष 2017-18 के बजट अनुमानों में राजकोषीय घाटे में जीएसडीपी का 2.49 फीसद की गिरावट आई है। एनपीए बढ़ा, सीडी रेशियो में कमी : झारखंड में बैंकिंग क्षेत्र के प्रदर्शन की बात करें तो एनपीए में बढ़ोतरी हुई है और सीडी रेशियो में मामूली गिरावट आई है। सितंबर 2016 में एनपीए 5.87 फीसद था जो कि सितंबर 2017 में बढ़कर 6.04 फीसद हो गया। बैंकों का सीडी रेशियो सितंबर 2016 में 46.11 फीसद था जो कि सितंबर 2017 में 43.56 फीसद हो गया। ग्रामीण बैंकों का सीडी रेशियो 38.83 फीसद से घटकर 35.90 फीसद हो गया। सरकार शहरों के विकास पर तीव्र ध्यान दें क्योंकि इससे राज्य का वित्तीय आधार और निवेश प्रभावित होता है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 70 प्रतिशत आबादी को बड़ा बाजार और कृषि क्षेत्र के आधारभूत ढांचा को मजबूत करने में पूरा ध्यान दे। निश्चित तौर पर अब दो दशक बाद हम और अधिक समय दोषारोपण पर बर्बाद नहीं कर सकते। (लेखक झारखंड भाजपा एसटी मोर्चा के अध्यक्ष हैं।)

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