एबीएन डेस्क। दक्षिण अफ्रीका में सत्य और अहिंसा के सफल परीक्षण के पश्चात महात्मा गांधी 1915 में भारत लौटे। इसी समय झारखंड (तब बिहार का हिस्सा) के चिंगरी गांव में एक चिंगारी फैली जो टाना भगत आंदोलन के नाम से देश के इतिहास में दर्ज है। नियति ने इस आंदोलन का बापू के सत्य और अहिंसा से ऐसा संगम प्रस्तुत कर दिया कि टाना भगत स्वाधीनता संग्राम के अमिट हस्ताक्षर बन गये। टाना भगत आंदोलन के प्रणेता जतरा उरांव का जन्म 1888 ई में गुमला जिले के बिष्णुपुर थाने के चिंगरी नवाटोली गांव में हुआ। तंत्र-मंत्र के प्रशिक्षण के बीच उन्हें आत्म बोध हुआ। 14 अप्रैल 1914 को उन्हों ने घोषणा की कि उरांव जनजाति के देवता, धर्मेश ने उनको संदेश दिया है कि वे (जतरा) राजा बनेंगे, उनके राज्य में उनके अनुयायी ही रह पाएंगे। उनको न माननेवाले गुंगे हो जाएंगे। उनकी मुख्य शिक्षा थी; भूत-प्रेत, झाड़-फूंक आदि अंध विश्वासों का परित्याग, बलि प्रथा निषेध, मांस मदिरा का त्याग, दूसरी जाति और सरकार की नौकरी की मनाही, घरेलू तथा कृषि उपकरणों एवं आभूषणों का नदी में प्रवाह तथा उरांव देवता धर्मेश की उपासना। 1915 तक इस आंदोलन का प्रसार हजारीबाग और पलामू जिलों में हो गया और 1916 में इसकी आंच जलपाईगुड़ी के चायबागानों में पहुंच गयी जहां बड़ी संख्या में उरांव मजदूर रहते थे। तब इन्हें दबाया गया। जतरा भगत के निधन के बाद देवमनिया, शीबू, माया, बलराम, भीखू नामक शिष्यों ने अपने अपने क्षेत्रों मंय उनके आंदोलन का नेतृत्व किया। फलस्वरूप रांची, लोहरदगा गुमला पलामू और हजारीबाग के करीब ढाई लाख उरांव इस आंदोलन से जुड़ गए। मार्च 1919 में शीबू, माया, सुकरा, सिंघा और देविया को गिरफ्तार कर सजा दी गयी फिर भी आंदोलन का अंत नहीं हुआ। असहयोग आंदोलन के समय से टाना भगत आंदोलन गांधीजी के प्रभाव में आने लगा। कांग्रेस के विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920) में अनेक टाना भगत पलामू जिले से गांधीजी को सुनने के लिए पैदल ही कलकत्ता पहुंच गए। 1921 के प्रारंभ में जब असहयोग आंदोलनकारी रांची, सेन्हा, मधुकम, इटकी ओरमाझी, कोकर, गुमला, कुरु, तमाड़, बुंडू आदि ग्रामों में सभा करने लगे तो ब्रिटिश अधिकारियों के कान खड़े हुए। रांची एसपी ने उपायुक्त को लिखा, पंद्रह दिनों की अवधि में 15 सभाएं हो चुकी हैं और तीन होने वाली हैं। मेरा अनुमान है कि इससे तीव्र गति से आक्रोश फैलेगा। इसे रोकने के लिए धरा 144 पर्याप्त नहीं। मांडर, कुरु और लोहरदगा की सभाओं पर प्रतिबंध लगा। पुन: 9 मार्च 1921 को रांची के उपायुक्त ने छोटानागपुर के कमिश्नर को लिखा कि असहयोग आंदोलन से जुड़कर टाना भगतों ने अपने आंदोलन को नया जीवन प्रदान किया है। 12 अप्रैल 1921 को टाना भगतों के गढ़, कुरु में करीब तीन हजार लोगों की सभा को रामटहल ब्रह्मचारी और मुस्लिम नेताओं ने संबोधित किया। लोगों को चरखा चलाने, शराब न पीने और हिंसा से दूर रहने का संदेश दिया गया। गांधी के वशीभूत ये टाना भगत अब झारखंड में कांग्रेस की ताकत बन गए। खादी पहनना, कांग्रेस के झंडे के साथ मीलों पैदल चलकर कांग्रेस की सभा में भाग लेना, गांधीजी और कांग्रेस के संदेशों को जन जन तक पहुंचाना इनकी दिन चर्या में शामिल हो गया। 1922 की गया कांग्रेस में कुल 800 प्रतिनिधि गया पहुंचे जिनमें भरी संख्या में टाना भगत और मुंडा शामिल थे। करीब 400 भगत और अन्य आदिवासी तो बहंगियों में हांडी और जलावन लेकर पैदल ही चले गए। 1922 में बापू की गिरफ्तारी के बाद जब असहयोग कार्यकताओं के खिलाफ दमन का दौर शुरू हुआ तो बेरो थाना और कुछ अन्य स्थानों पर टाना भगत भी उसके शिकार हुए। 1925 में गांधीजी बिहार प्रांतीय कांग्रेस के पुरुलिया सम्मलेन में पधारे वहां से उनकी छोटानागपुर यात्रा शुरू हुई। चक्रधरपुर और चाईबासा में जनसभाओं को संबोधित कर वह रांची के लिए रवाना हुए होगए। रास्ते में वह थोड़ी देर के लिए खूँटी में रुके जहाँ उनकी भेंट मुंडा और टाना भगतों से हुई जिनकी सादगी और निर्दोषता देख कर वे मंत्रमुग्ध हो गए। बापू के शब्दों में, वे खादी में विश्वास करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों चरखा चलाते हैं और स्वनिर्मित खादी पहनते हैं। कई लोग कंधों पर चरखा लिए मीलों पैदल चलकर आए थे। मैं ने सभास्थल पर करीब 400 भगतों को देखा जो लगन से चरखा चला रहे थे। 1926 में कांग्रेस का राष्टीय सप्ताह समारोह (6-13अप्रैल) हो या खादी प्रदर्शनी (5अक्टूबर,आर्य समाज हॉल, रांची) टाना भगत हर जगह होठों पे गांधी और हाथों में तिरंगा लेकर मौजूद रहते थे। 1927 में साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन में (रांची, दिसंबर) टाना भगतों ने भाग लिया तो 1928 की कलकत्ता कांग्रेस में करीब 150 टाना भगत उपस्थित हुए। राजनीतिक घटनाओं से परिपूर्ण वर्ष 1930 में 26 जनवरी को रांची में सदर हॉस्पिटल के समीप पी सी मित्र के नेतृत्व में टाना भगतों ने स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन किया। रांची में इसी वर्ष जून में 40 भगतों ने बिना अनुमति के जुलूस निकालकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन में शिरकत की और आठ भगतों ने गिरफ्तारी दी। 1940 की रामगढ़ कांग्रेस में टाना भगतों ने गांधीजी को 400 रु की थैली समर्पित कर राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया तो भारत छोडो आंदोलन का इतिहास भी इनकी की चर्चा के बिना अधूरा है। 18 और 22 अगस्त 1942 को टाना भगतों की टोली ने क्रमश: विष्णुपुर थाने को जलाया और इटकी के समीप रेल की पटरियां उखाड़ दीं। 23 अगस्त को चमरा भगत और गोवा भगत भाषण देते हुए गिरफ्तार हुए तो 24 और 28 अगस्त को क्रमश: डाक सामग्री छीनने और बेरमो थाने पर कब्जा करने के आरोप में कुछ टाना भगतों की गिरफ्तारी हुई। इन टाना भगतों के दो ही आदर्श थे जतरा भगत और महात्मा गांधी। जतरा आश्विन शुक्ल अष्टमी को धरती पर आए पर उनके भगतों को उनकी अंगरेजी जन्म तिथि ज्ञात नहीं थी तो उन्होंने 2 अक्टूबर को ही गांधीजी और जतरा भगत का जन्म दिवस मानना शुरू किया। राष्ट्रपिता के जन्म दिवस पर टाना भगतों के दोनों आदर्शों को श्रद्धांजलि...
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