एबीएन न्यूज नेटवर्क, लोहरदगा। न्यूज चैनलों और अखबारों के माध्यम से हमें पता चला कि सांसद सुखदेव भगत एवं विधायक रामेश्वर उरांव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से अपनी राय व्यक्त किया है कि भाजपा एवं आरएसएस आदिवासी का सम्मान नहीं करते और इन्हें वनवासी पुकारकर इनका अपमान करते हैं।
सबसे पहले सांसद के अधकचरे ज्ञान को ठीक करना अतिआवश्यक है क्योंकि इन्होंने बहुत ही गर्व पूर्वक अपने प्रोफाइल में पूर्व डेप्यूटी कलेक्टर लिखते हैं और ज्ञान में बहुत कमजोर हैं। बोलते हैं 1857 के युद्ध में कांग्रेस का बड़ी सहभागिता रही है और 1858 में राज्य पुनर्गठन आयोग की वैधानिक गठन हुआ था।
बता दें कि अखिल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का गठन 1885 में हुआ था तो 1857 की लड़ाई में कांग्रेस कहां से टपक पड़ी, जिसका जन्म ही नही हुआ था? वहीं राज्य पुनर्गठन आयोग का स्थापना सन 1856 में की गयी थी ना कि 1858 में। सांसद आप सच में जे पी एस सी उतीर्ण कर नौकरी में आये थे या उस समय के कांग्रेस सत्ता में व्याप्त भ्रष्टाचार का प्रभाव था।
साथ ही विधायक रामेश्वर में भी उम्र का प्रभाव दिखने लगा है, अन्यथा एक ओर विधायक जी खुलेआम कहते हैं कि आदिवासी हिंदू नहीं है और दूसरी ओर वे स्वयं रामनवमी में झंडा पूजा किये बिना अन्न जल ग्रहण नहीं करते जबकि विधायक की प्रशासनिक पदाधिकारी पुत्री निशा उरांव गला फाड़कर बोल रही है कि कुछ तुच्छ लोग राजनीतिक लाभ के लिए सरना सनातन को तोड़ने का षड्यंत्र के तहत सरना हिन्दू नहीं है जैसा दुष्प्रचार कर रहे हैं।
जबकि गाहे बगाहे विधायक पुत्र रोहित उरांव भी अपने आप को सदैव हिन्दू ही कहा है और माना है। मंदिरों में जाना और पूजा पाठ करना इनके लिए रोजमर्रा की जिंदगी है। आगे या तो रामेश्वर उरांव जिंदगी भर खुद कन्फ्यूज रहे हैं कि वे हिन्दू हैं अथवा नहीं या फिर अपने बच्चों को संस्कार और धर्म की जानकारी देने में गलती कर गये हैं।
एक ऐसा व्यक्ति जो आईपीएस रहा हो, जो राष्ट्रीय जनजातीय आयोग का चैयरमेन रहा हो वह व्यक्ति के मुंह से सार्वजनिक बयान आता है कि सरना हिन्दू नहीं है! यह बहुत ही हास्यास्पद और दिमागी दिवालियापन की निशानी है। शायद अब ये 80 वर्षीय आयु के व्यक्ति हैं, तो उम्र का भी प्रभाव में गलत सलत बयान निकल जा रहा है। सांसद सुखदेव भगत आप बाबा कार्तिक उरांव और डेविड मुनरो के मुकदमे का रेफरेंस लेते हुए बोलते हैं कि जो आदिवासी धर्म परिवर्तन कर लिया है वह भी जनजातीय आरक्षण का लाभ ले सकता है। इसका मतलब आप धर्म परिवर्तन को जायज बताते हुए इसे बढ़ावा दे रहे हैं।
जबकि भारतीय संविधान के जानकार बताते हैं कि समय अनुसार परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट भी पूर्व के फैसलों से अलग फैसला दे सकते हैं और समय की मांग अनुसार इसे बदलने का भी अधिकार सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण रूप से है। हमारा प्रश्न केवल एक है यदि सरना, सनातन से अलग है तो वह कैसे है इतिहास का उदाहरण देते हुए इसे परिभाषित कर हम सभी सरना सनातनी भाई बहन को अवश्य बतायें।
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