एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में भगवान परशुराम को न्याय, पराक्रम और धर्म की स्थापना का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष परशुराम जयंती 20 अप्रैल को मनायी जायेगी। यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आता है, जो कि अत्यंत शुभ और पुण्यदायी मानी जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम का जन्म अत्याचार और अधर्म के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने के लिए हुआ था। वे महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, जिन्होंने पृथ्वी पर अन्याय करने वाले क्षत्रियों का नाश कर धर्म की पुन: स्थापना की। उनके हाथ में धारण किये गये फरसे (कुल्हाड़ी) के कारण उनका नाम परशु-राम पड़ा।
परशुराम जयंती केवल एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि सत्य, साहस और न्याय के प्रति अडिग रहने की प्रेरणा देने वाला पर्व है। यह दिन हमें सिखाता है कि जब समाज में अन्याय और अत्याचार बढ़े, तो उसका डटकर सामना करना चाहिए। भगवान परशुराम का जीवन त्याग, तपस्या और कर्तव्यनिष्ठा का अद्भुत उदाहरण है। वे एक ऐसे योद्धा ब्राह्मण थे, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र और शास्त्र दोनों का संतुलन बनाए रखा।
इस पर्व का मुख्य उद्देश्य समाज में नैतिकता, धर्म और कर्तव्य के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह हमें अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है। साथ ही, यह दिन ब्राह्मण समाज के लिए विशेष महत्व रखता है, जो भगवान परशुराम को अपना आराध्य मानते हैं। परशुराम जयंती के दिन श्रद्धालु प्रात: स्नान कर व्रत रखते हैं और भगवान परशुराम की पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिरों में विशेष भजन-कीर्तन, हवन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। कई स्थानों पर शोभायात्राएं भी निकाली जाती हैं, जिनमें भगवान परशुराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों का चित्रण किया जाता है। दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता करना भी इस दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।
परशुराम जयंती हमें धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा में आगे बढ़ाने का संदेश भी देता है। आज के समय में, जब नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, भगवान परशुराम का जीवन हमें साहस, संयम और कर्तव्य परायणता का मार्ग दिखाता है। यही इस पावन पर्व की सबसे बड़ी सार्थकता है।
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