आस्था का महापर्व छठ पूजा 25 से प्रारंभ

 

यह पर्व श्रद्धा, शुद्धता और समर्पण का प्रतीक है 

छठ पर्व प्रकृति, सूर्य, जल और मानव के पारस्परिक संबंध का है प्रतीक : संजय सर्राफ 

टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत में पर्व-त्योहारों की परंपरा जितनी प्राचीन है, उतनी ही विविधतापूर्ण भी। इन्हीं में से एक है छठ पूजा, जिसे लोक आस्था का महापर्व कहा जाता है। यह पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। 

आधुनिक समय में यह पर्व देश-विदेश में बसे भारतीयों द्वारा भी बड़े उत्साह से मनाया जाने लगा है। इस वर्ष छठ पूजा 25 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक मनाई जायेगी। छठ का महापर्व कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलता है। इस दौरान सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की जाती है। 

छठ पूजा की तिथि 25 अक्टूबर दिन शनिवार को नहाय-खाय,26 अक्टूबर दिन रविवार को खरना पूजन, 27 अक्टूबर दिन सोमवार को  संध्या अर्घ्य (पहला अर्घ्य), 28 अक्टूबर दिन मंगलवार को प्रात: कालीन उषा अर्घ्य (दूसरा अर्घ्य) के बाद शनिवार से शुरू चार दिवसीय पूजा अनुष्ठान मंगलवार को संपन्न हो जाएगा उसके बाद सभी छठ व्रती पारण कर उपवास तोड़ेंगे। 

छठ पर्व सूर्य देव और उनकी बहन छठी मैया की उपासना का पर्व है। सूर्य देव को जीवन का आधार माना गया है, क्योंकि उनसे ही पृथ्वी पर ऊर्जा, प्रकाश और जीवन की उत्पत्ति होती है। छठी मैया, जिन्हें उषा देवी के नाम से भी जाना जाता है, संतान सुख, स्वास्थ्य, और समृद्धि की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब पांडव अपने राज्य और सम्मान से वंचित हुए, तब द्रौपदी ने छठी मैया की आराधना की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुन: अपना राज्य प्राप्त हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत ने संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को किया था, जिसके आशीर्वाद से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। 

छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय से होती है, जब व्रती स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन खरना पर निर्जला उपवास रखकर शाम को गंगा या किसी पवित्र जल स्रोत के तट पर गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर पूजा की जाती है। तीसरे दिन संध्या अर्घ्य के समय व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। 

चौथे दिन प्रात: काल उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का समापन होता है। छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी पवित्रता और कठोर नियम। व्रती चार दिनों तक सात्विकता, शुचिता और संयम का पालन करते हैं। पूजा में बांस की सुप, ठेकुआ, फल, नारियल, और गन्ने जैसे प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। 

यह पर्व प्रकृति, सूर्य, जल और मानव के पारस्परिक संबंध का प्रतीक है। छठ पूजा सामाजिक समरसता और एकता का संदेश देती है। इस दिन जाति, वर्ग, धर्म का भेद मिटाकर सभी लोग एक साथ घाटों पर एकत्र होते हैं। महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सूर्य ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक है।

छठ पूजा भारतीय संस्कृति की उस अनमोल परंपरा का उत्सव है, जो मनुष्य और प्रकृति के अटूट बंधन को दशार्ता है। यह पर्व श्रद्धा, शुद्धता और समर्पण का प्रतीक है, जो हमें सिखाता है कि प्रकृति की पूजा ही जीवन की सच्ची साधना है।

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