भारत की जीडीपी दर 0.84 फीसदी के पार

 

एबीएन बिजनेस डेस्क। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के हाल ही में जारी आंकड़ों से पता चलता है कि भारत का अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) निवेश 2023-24 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 0.84 फीसदी को पार कर गया है, जो अब तक का उच्चतम स्तर है और इसके और बढ़ने की संभावना है। लगभग एक दशक से अनुसंधान एवं विकास की तीव्रता जीडीपी के 0.6 फीसदी  से 0.7 फीसदी के बीच अटकी हुई थी। 

इस महत्त्वपूर्ण आंकड़े के भीतर एक और महत्त्वपूर्ण बदलाव छिपा है : निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 2020-21 में 32 फीसदी से बढ़कर मात्र तीन वर्षों में 45 फीसदी हो गयी है। स्वतंत्र भारत के इतिहास के अधिकांश समय में अनुसंधान सरकार का मामला रहा है। निजी क्षेत्र का इस गति से विकास, अर्थव्यवस्था के बढ़ते आत्मविश्वास और उद्योग जगत द्वारा अपने स्वयं के विचारों पर गंभीरता से दांव लगाने का संकेत देता है। 

वर्ष 1990 के बाद से केवल 34 मध्यम-आय वाली अर्थव्यवस्थाएं ही उच्च-आय वाली अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में पहुंच पाई हैं जबकि 108 अभी भी वहीं अटकी हुई हैं। जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसी जिन अर्थव्यवस्थाओं ने तेल या खनिजों के अप्रत्याशित लाभ के बिना यह छलांग लगाई है, उनमें एक तरह का पैटर्न देखने को मिलता है। इन सभी ने अपनी आय के लगभग वर्तमान भारत के स्तर पर रहते हुए अनुसंधान में भारी निवेश किया और विकास के साथ-साथ इस निवेश को और भी बढ़ाया।  

एक तुलना सबसे महत्त्वपूर्ण है। वर्ष 2007 में चीन का प्रति व्यक्ति जीडीपी 2,700 डॉलर था, जो आज भारत के जीडीपी के लगभग बराबर है  लेकिन इसकी अनुसंधान एवं विकास तीव्रता भारत की तुलना में लगभग दोगुनी यानी जीडीपी का 1.49 फीसदी थी। वर्ष 2007 और 2024 के बीच चीन का जीडीपी 5.5 गुना बढ़ा, लेकिन इसके निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास में 10 गुना से अधिक की वृद्धि हुई। उद्योग ने विकास से आगे बढ़कर निवेश किया, जिसने चीन को आज की तकनीकी महाशक्ति में बदल दिया।  

भारत की विकसित भारत की महत्त्वाकांक्षा को साकार करने के लिए 2035 तक अनुसंधान एवं विकास को सकल घरेलू उत्पाद के 2 फीसदी तक लाना होगा, जिसमें उद्योग का योगदान 70 फीसदी होना चाहिए। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, 2030 तक एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करनी है: सकल घरेलू उत्पाद का 1.3 फीसदी, जिसमें कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़कर कम से कम 60 फीसदी हो जाये।  

सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है। अनुसंधान नैशनल रिसर्च फंड (एएनआरएफ) और अनुसंधान, विकास एवं नवाचार कोष (आरडीआईएफ) प्रारंभिक चरण के अनुसंधान जोखिमों को कम करने और उद्योग को विकास के लिए उत्प्रेरक पूंजी प्रदान करने के लिए मौजूद हैं। यह एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन अंतिम लक्ष्य नहीं।  अधिक खर्च करें। 

सरकार को अनुसंधान एवं विकास पर होने वाला खर्च 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के कम से कम 0.5 फीसदी तक पहुंचाना होगा, और 2035 तक इसे 0.6 फीसदी तक ले जाना होगा, जो आज के लगभग 0.4 फीसदी से वास्तविक वृद्धि होगी। सही चीजों पर सही तरीके से व्यय करें। तीन एजेंसियां-रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), अंतरिक्ष विभाग (डीओएस) और परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई)- केंद्रीय वैज्ञानिक व्यय के 60 फीसदी से अधिक का उपयोग करती हैं, जिसमें से अधिकांश उनकी अपनी प्रयोगशालाओं में ही खर्च होता है। 

उच्च शिक्षा, जो मूलभूत अनुसंधान का आधार है और हर व्यावहारिक सफलता को जन्म देती है तथा प्रतिभाओं का विकास करती है, भारत के अनुसंधान एवं विकास व्यय का केवल 12.6 फीसदी ही प्राप्त करती है। सरकारी निधि को स्वतंत्र शोधकर्ताओं, स्टार्टअप और फर्मों की ओर निर्देशित किया जाना चाहिए, और महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, जैसा कि डीआरडीओ के आईडेक्स कार्यक्रम से स्पष्ट होता है। इसके लिए खंडित अनुदानों के बजाय कम, बड़े, दीर्घकालिक, प्रौद्योगिकी क्षमता-केंद्रित राष्ट्रीय मिशनों की आवश्यकता है। उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए बजट आवंटन को बढ़ाकर 15-20 फीसदी करने की आवश्यकता है। 

उद्योग जगत के लिए ऐसी अनुकूल परिस्थितियां बनायें कि वे जोखिम उठा सकें। उद्योग-उन्मुख उपायों के संबंध में नीति गलत दिशा में चली गयी है। समाधान यह है कि अनुसंधान से जुड़े प्रोत्साहनों को अग्रिम बाजार प्रतिबद्धताओं के साथ जोड़ें जो प्रदर्शन मानकों को पूरा करने वाले उत्पादों के लिए सार्वजनिक खरीद को पूर्व-निर्धारित करती हैं। 

भारतीय उद्योग वास्तविक स्तर पर पहुंच रहा है, नये व्यापार समझौते वैश्विक बाजारों को खोल रहे हैं, और शुल्क बाधाएं कम हो रही हैं, जिसका अर्थ है वैश्विक मोर्चे पर प्रतिस्पर्धा करना, जिसके लिए उद्योग को नवाचार करना होगा और जोखिम भरे विचारों का समर्थन करना होगा। कुछ कंपनियां पहले ही दिखा चुकी हैं कि क्या संभव है। ग्लेनमार्क ने एक दशक से अधिक समय तक एक ही प्रोपराइटरी ऐंटीबॉडी प्लेटफॉर्म पर 1 अरब डॉलर का निरंतर निवेश किया। 

इससे आईएसबी 2001 का विकास हुआ, जो उन्नत रक्त कैंसर के इलाज के लिए एक ऐंटीबॉडी है, जिसका लाइसेंस 2025 में ऐबवी को 1.9 अरब डॉलर तक के मूल्य पर दिया गया। स्काईरूट एरोस्पेस ने अपनी रॉकेट प्रणोदन तकनीक को बिल्कुल नये सिरे से विकसित किया। इसका विक्रम-1 निजी तौर पर विकसित पहला भारतीय रॉकेट बना जिसने कक्षा में प्रवेश किया, जिससे भारत निजी क्षेत्र में प्रक्षेपण क्षमता वाला तीसरा देश बन गया। कंपनी का वर्तमान मूल्य 1.1 अरब डॉलर से अधिक है। 

कार्यप्रणाली मौजूद है। अब उद्योग को यह तय करना है कि इसका उपयोग करना है या नहीं। विकसित भारत की उम्मीदें अनुसंधान एवं विकास के उपयोग की मात्रा और तरीके पर टिकी हैं, जिसमें निजी क्षेत्र की भूमिका कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है, जबकि सरकारी नीति और सार्वजनिक क्षेत्र भी अपना योगदान दे रहे हैं।

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