महिलाओं की गरिमा के लिए समाज की साझी जिम्मेदारी

 

विकास रंजन 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम महिलाओं की प्रगति, अधिकारों और समानता पर विचार करें। शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व के क्षेत्र में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन एक ऐसा विषय है जो आज भी समाज में खुले तौर पर चर्चा का हिस्सा नहीं बन पाया है- मासिक धर्म स्वच्छता। 

भारत के कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मासिक धर्म को लेकर संकोच, सामाजिक वर्जनाएं और गलत धारणाएं मौजूद हैं। स्वच्छता से जुड़े साधनों की कमी के कारण हजारों किशोरियां अपने मासिक धर्म के दिनों में स्कूल जाने से वंचित रह जाती हैं। कई बार मजबूरी में वे असुरक्षित विकल्पों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि सम्मान और अवसर की समानता का भी प्रश्न है। 

इस समस्या का समाधान केवल जागरूकता से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से संभव है। विशेष रूप से पुरुषों को भी इस विषय पर संवेदनशीलता के साथ आगे आना होगा। जब तक हम मासिक धर्म को केवल महिलाओं का निजी विषय मानते रहेंगे, तब तक इस समस्या का व्यापक समाधान संभव नहीं होगा। 

इसी सोच के साथ NOBA GSR (Netarhat Old Boys Association – Global Social Responsibility) ने संगिनी पहल की शुरुआत की। इस पहल का उद्देश्य बिहार और झारखंड के ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्कूल जाने वाली लड़कियों के बीच सुरक्षित मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देना है। 

मैं स्वयं आज टोक्यो, जापान में कार्यरत हूं, लेकिन मेरी जड़ें बिहार से जुड़ी हैं। विदेश में रहते हुए अक्सर यह विचार आता रहा कि हम अपने समाज और अपने राज्य के लिए क्या योगदान दे सकते हैं। इसी भावना के साथ नेतरहाट विद्यालय के पूर्व छात्रों के सामाजिक मंच NOBA GSR के माध्यम से हमने इस विषय पर काम शुरू किया।

 संगिनी पहल तीन प्रमुख आधारों पर काम करती है—सुलभता, जागरूकता और गरिमा। 

पहला कदम है स्कूलों में सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन और पर्यावरण अनुकूल इन्सिनरेटर की स्थापना, जिससे लड़कियां स्कूल में ही सुरक्षित तरीके से पैड प्राप्त कर सकें और उनका निस्तारण भी कर सकें। इससे उन्हें मासिक धर्म के दौरान स्कूल से अनुपस्थित रहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है जागरूकता। ग्रामीण क्षेत्रों में कई लड़कियां मासिक धर्म के बारे में सही जानकारी के अभाव में बड़ी होती हैं। संगिनी के माध्यम से स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहाँ मासिक धर्म स्वच्छता, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास से जुड़े विषयों पर खुलकर चर्चा की जाती है। 

इस अभियान में शिक्षकों, स्वयं सहायता समूहों, सामुदायिक संगठनों और स्थानीय प्रतिनिधियों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण रही है। इससे समाज में धीरे-धीरे वह वातावरण बन रहा है जहां मासिक धर्म पर खुले और सकारात्मक तरीके से बात की जा सके। 

आज इस पहल के माध्यम से सैकड़ों स्कूलों तक सुविधाएं पहुंचायी जा चुकी हैं और हजारों लड़कियां इससे लाभान्वित हो रही हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि समाज की सोच में बदलाव दिखाई देने लगा है। 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह याद दिलाता है कि महिलाओं का सशक्तिकरण केवल नीतियों या घोषणाओं से संभव नहीं है। यह उन छोटे-छोटे प्रयासों से संभव होता है जो महिलाओं को सम्मान, स्वास्थ्य और अवसर प्रदान करते हैं। सच्चा सशक्तिकरण तब होता है जब महिलाएं अकेले संघर्ष न करें, बल्कि पूरा समाज उनके साथ खड़ा हो। मासिक धर्म स्वच्छता के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयास इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम हैं। क्योंकि जब समाज महिलाओं की मूलभूत आवश्यकताओं के साथ खड़ा होता है, तभी वास्तविक समानता और सम्मान की नींव मजबूत होती है।

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