एबीएन सेंट्रल डेस्क। कश्मीर घाटी का इतिहास काफी प्राचीन है और इसमें कई राजवंशों और संस्कृतियों का प्रभाव देखने को मिलता है। यह क्षेत्र कभी हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म का केंद्र था, और बाद में मुस्लिम शासन के अधीन भी रहा है। कल्हण की राजतरंगिणी कश्मीर के इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसमें घाटी के राजाओं और शासकों का विवरण दिया गया है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कश्मीर घाटी में ऋषि कश्यप ने झील को सुखाकर घाटी को वास योग्य बनाया था। महाभारत और नीलम पुराण में भी कश्मीर घाटी का उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल में कश्मीर में हिंदू और बौद्ध धर्म का प्रभाव था। मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में कश्मीर में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ था। कुषाण शासक कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर बौद्ध संस्कृति का केंद्र बना था। 7वीं से 14वीं शताब्दी तक कश्मीर में हिंदू राजवंशों का शासन था। 14वीं शताब्दी में कश्मीर में इस्लाम का आगमन हुआ और 1320 में रिंचन शाह कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक बना।
कश्मीर सल्तनत ने 1320 से 1586 तक शासन किया। 1586 में कश्मीर मुगल साम्राज्य के अधीन आ गया। 1846 में जम्मू और कश्मीर रियासत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन आ गयी। 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जम्मू और कश्मीर एक रियासत के रूप में अस्तित्व में आयी। 1947 में भारत के विभाजन के समय, जम्मू और कश्मीर के शासक महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय का फैसला लिया, जो भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान हुआ। 1947 से जम्मू और कश्मीर भारत का हिस्सा है। 1957 में जम्मू और कश्मीर का संविधान लागू हुआ। 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया और जम्मू और कश्मीर को एक केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया।
कश्मीर का इतिहास एक जटिल और समृद्ध इतिहास है, जिसमें विभिन्न संस्कृतियों और राजवंशों का प्रभाव देखने को मिलता है। यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। कश्मीर का प्राकृतिक सौंदर्य जितना विश्वविख्यात है, उतना ही उसकी साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत भी मूल्यवान और सर्वविदित है।
ऊंची-ऊंची पहाड़ियां घाटियों के बीच में भास्वरित होती झीलें, झाड़ियों से भरे जंगल फूलों से घिरी पगडंडियां केसर-पुष्पों से महकते खेत, कल-कल करते झरने, बर्फ से आच्छादित पर्वतमालाएं आदि कश्मीर की अनुपम खूबसूरती को स्वत: ही बयां करते हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ-साथ कश्मीर की सांस्कृतिक साहित्यिक धरोहर भी कम अनूठी और गौरवशाली नहीं है। इस धरती को धर्म-दर्शन और विद्या-बुद्धि की पुण्य-स्थली माना जाता है। शारदापीठ भी कहा जाता है और रेश्यवार (ऋषियों की बगीचों) के नाम से भी अभिहित किया जाता है।
इस भूखण्ड ने भारतीय ज्ञानपरम्परा को बड़े-बड़े मनीषी विद्वान और कालजयी महापुरुष दिये हैं जिनका अवदान सदा स्मरणीय रहेगा। महान रसशास्त्री और शैवाचार्य अभिनव गुप्त, कवि-इतिहासकार (राजतरंगिणीकार) कल्हण काव्यशास्त्री मम्मट आनंदवर्धन, वामन, आचार्य क्षेमेन्द्र आदि के नाम इस सन्दर्भ में बड़े गर्व के साथ लिये जा सकते हैं।
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