एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज के ही दिन भारत की सबसे बड़ी पंचायत, लोकसभा ने भारत का संविधान पारित कर देश को एक पूर्ण संप्रभुता संपन्न गणतंत्र के रूप में नवाजा था। यह दिन समस्त देशवासियों के लिए गौरव का दिन है। भारत का संविधान समस्त देशवासियों को अधिकार और कर्तव्य की सीख प्रदान करता है। हम समस्त देशवासियों को संविधान में प्रदत्त अधिकारों की जानकारी देता है। इसके साथ ही संविधान के प्रति, देश के प्रति और देशवासियों के प्रति हमारा क्या कर्तव्य है? इसकी भी जानकारी देता है।
आज की बदली सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति स्थिति में हम सब अपने-अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संगठित होकर आवाज बुलंद करते हैं। लेकिन अपने कर्तव्य के प्रति मौन क्यों हो जाते हैं? यह बड़ा सवाल है। हम सब जितने अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट रहते हैं, उससे कहीं ज्यादा अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति सचेष्ट होना चाहिए। आज गणतंत्र दिवस के दिन हम सबों को मिल जुल कर अपने अपने कर्तव्य निभाने का संकल्प लेना चाहिए।
इस गौरवमयी दिन को लाने में न जाने कितने स्वाधीनता सेनानियों ने अपना संपूर्ण जीवन भारत की आजादी के संघर्ष के नाम कर दिया था। कई स्वाधीनता सेनानियों को विभिन्न अवसरों पर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। इसके साथ ही हजारों ऐसे बेनाम स्वाधीनता सेनानी थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश की आजादी के संघर्ष के नाम कर दिया था। आज उन बेनाम स्वाधीनता सेनानियों को भी स्मरण करने का दिन है। उनके प्रति भी श्रद्धांजलि और कृतज्ञता अर्पित करने का दिन है।
देश की आजादी के संघर्ष में हजारीबाग जिले की भूमिका को कभी भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है। हजारीबाग में सेंट्रल जेल रहने के कारण देश भर के बड़े-बड़े नेता यहां बंद थे। इस कारण यह जिला अन्य जिलों की तुलना में ज्यादा आंदोलितरत था। वे हजारीबाग सेंट्रल जेल में लगभग आठ वर्षों बंद थे। अंग्रेज अधिकारी बाबू राम नारायण सिंह के जुझारूपन से बेहद खफा रहते थे। यह हजारीबाग जिले के लिए गौरव की बात है कि बाबू राम नारायण सिंह भारतीय संविधान सभा के सदस्य के रूप में मनोनीत किये गये थे।
उन्होंने बतौर संविधान सभा के सदस्य के रूप में बहुत ही महत्वपूर्ण सुझाव संविधान सभा को दिया था। देश की आजादी के बाद अगर वे चाहते तो केंद्र अथवा प्रांत की सत्ता की राजनीति जुड़ सकते थे। वे महात्मा गांधी की तरह सत्ता के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे। वे ग्राम पंचायत को अधिक से अधिक ताकतवर बनाना चाहते थे।
हजारीबाग नगर के कृष्ण बल्लभ सहाय, महात्मा गांधी का आह्वान पर आजादी के संघर्ष से जुड़े थे। वे जब तक देश को आजादी मिल नहीं गई थी,तब तक संघर्षरत रहे थे। जेल इनके लिए घर आंगन हो गया था। अंग्रेजी हुकूमत, कृष्ण बल्लभ सहाय की दहाड़ से डर से गयी थी। हजारीबाग जिले की प्रथम महिला स्वाधीनता नेत्री सरस्वती देवी भारत की आजादी के संघर्ष में खुद को शामिल कर एक इतिहास रच दिया था। इस कालखंड स्त्रियां पर्दे में रहा करती थीं। वहीं सरस्वती देवी स्वाधीनता आंदोलन का अलख जगाने के लिए गांव गांव पैदल चल रही थीं।
सरस्वती देवी के परिवार वालों ने उन्हें इस कार्य में बहुत ही मदद किया था। इस जिले में स्वाधीनता आंदोलन में स्त्रियों को जोड़ने का श्रेय सरस्वती देवी को जाता है। हजारीबाग के त्रिवेणी सहाय स्वाधीनता आंदोलन के एक जांबाज सिपाही थे। स्वाधीनता आंदोलन की गति को तेज करने के लिए देश की आजादी तक जुड़े रहे थे। देश की आजादी के बाद एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपना संपूर्ण जीवन समाजोत्थान में लगा दिया था।
महात्मा गांधी का आह्वान पर हजारीबाग नगर के दो सगे भाई कस्तूर मल अग्रवाल और केसरमल अग्रवाल स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े थे। स्वाधीनता संघर्ष की सभाओं को आयोजित करने पर दंड स्वरूप उन दोनों भाइयों को सेंट्रल जेल मैं बंद कर दिया गया था। दोनों भाई जेल में ही रह कर हजारीबाग जिले के स्वाधीनता संघर्ष का संचालन किया करते थे। इस दरमियान उनका सारा कारोबार खत्म हो गया था।
फिर भी इन दोनों भाइयों ने कदम पीछे नहीं किया था। जेल से छूटने के बाद फिर से स्वाधीनता आंदोलन गये थे। कई बार उन दोनों भाइयों को घर में ही नजरबंद कर दिया गया था। हजारीबाग जिले के इचाक, करियातपुर के मोतीराम, महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वाधीनता आंदोलन में जुड़े थे। उन्हें अपने क्षेत्र में स्वाधीनता आंदोलन की सभा करने के जुर्म में जेल में डाल दिया गया था। चतरा, हंटरगंज के सुकलाल सिंह और शालिग्राम सिंह को स्वाधीनता आंदोलन की सभाओं में भाग लेने के जुर्म में हजारीबाग केंद्रीय कारा में बंद कर दिया गया था।
जहां पहले से लोक नारायण जयप्रकाश नारायण बंद थे। यहां इन दोनों ने जयप्रकाश नारायण से स्वाधीनता आंदोलन संघर्ष संचालन की सीख ली थी। जेल से बाहर निकलने के बाद जयप्रकाश नारायण ने स्वाधीनता आंदोलन संचालन की जो हो राह बताई थी, उसको मूर्त रूप दिया था। हजारीबाग, ग्राम कदमा के बद्री सिंह एक जांबाज स्वाधीनता सेनानी थे। इन्होंने स्वाधीनता आंदोलन संघर्ष में अपने को इस तरह जोड़ दिया था कि स्वाधीनता आंदोलन ही इनका सब कुछ हो गया था।
स्वाधीनता आंदोलन के संघर्ष में युद्ध रत रहने के कारण इन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। घर बार छोड़ देने से परिवार को काफी परेशानियों का सामना सामना करना पड़ा था। हजारीबाग के सरला देवी, नरसिंह भगत, इचाक के रामेश्वर महतो, बजरंग सहाय, पुनीत राय, सदानंद प्रसाद, विश्वनाथ मोदी, भुनेश्वर दत्त सहित सैकड़ों स्वाधीनता सेनानियों ने अपने अपने मजबूत इरादे और संघर्ष के बल पर अंग्रेजी हुकूमत की ईट से ईट बजा दी थी।
चतरा, कान्हाचट्टी, टटरा ग्राम के राम प्रसाद दुबे और सीताराम दुबे सन 1930 में महात्मा गांधी द्वारा आयोजित नमक सत्याग्रह, दांडी मार्च में शामिल होकर क्षेत्र का नाम रोशन किये थे। इस आंदोलन से जुड़ने के बाद राम प्रसाद दुबे आजीवन नमक का सेवन नहीं किये थे। हजारीबाग सेंट्रल जेल में डॉ राजेंद्र प्रसाद, खान अब्दुल गफ्फार खान, बाबू राम नारायण सिंह, डॉक्टर श्री कृष्ण सिंह, सरस्वती देवी, हरेकृष्ण मेहताब, रामवृक्ष बेनीपुरी, राहुल सांस्कृतायन, स्वामी सहजानंद सरस्वती, मुकुट धारी सिंह जैसे अग्रणी नेताओं के बन्द रहने के चलते इस जिले के स्वाधीनता सेनानियों को एक विशेष पंख मिल गये थे।
जेल में बंद नेतागण किसी न किसी रूप में स्वाधीनता आंदोलन के आवश्यक निर्देश जेल से बाहर भेज देते थे। बाहर रह रहे स्वाधीनता आंदोलन के सिपाही इन पत्रों के आधार पर गुप्त सभाएं आयोजित करने के साथ सूचनाएं अन्य प्रदेशों में भी भेजा करते थे। 9 नवंबर 1942, दीपावाली के दिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण अपने पांच स्वाधीनता सेनानियों के साथ सेंट्रल जेल तोड़कर भागने में सफल हुए थे। जेपी के साथ भागने वाले साथियों में क्रमश: सूरज नारायण सिंह, योगेंद्र शुक्ला, रामानंद मिश्र, शालिग्राम सिंह, गुलाबी सुनार थे।
हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद इन छ: स्वाधीनता सेनानियों ने इस योजना को बहुत ही गुप्त रखकर इस कार्य अंजाम दिया था। जेल तोड़कर भागने की खबर आग की तरह संपूर्ण देश में फैल गयी थी। जैसे ही यह हजारीबाग जिला मुख्यालय तक पहुंची थी, स्वाधीनता सेनानियों ने इस कदम का पुरजोर स्वागत किया था। लोगों ने में मिठाइयां बांटकर खुशियां व्यक्त की थी। हजारीबाग जिले का केशव हॉल, कंचन ग्राउंड, उर्दू लाइब्रेरी, हिंदू उच्च विद्यालय मैदान, जिला स्कूल मैदान आदि ऐसे स्थल रहे, जहां स्वाधीनता सेनानी जुटा करते थे।
हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने इस आजादी की बड़ी कीमत चुकाई थी। बदले में इन्होंने कुछ भी नहीं चाहा था। बस ! उनकी एक ही चाहत थी कि देश मजबूत बने। देशवासी आपस में मिलजुलकर रहें। लेकिन आजादी के 77 वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारे स्वाधीनता सेनानियों का सपना साकार नहीं हुआ। सत्ता की राजनीति ने देश की अखंडता पर प्रश्नचिन्ह से लगा दिया है।
गणतंत्र दिवस पर देश के नेताओं से यह कहना चाहता हूं कि खून से लथपथ, गौरवमई स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास का एक बार अवलोकन जरुर करें। देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए जो उनसे संभव हो सकता है। अवश्य करें। यही स्वाधीनता और गणतंत्र के सच्चे सिपाहियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। (लेखक वरिष्ठ कथकार, स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
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