बदलते सामाजिक परिवेश से डिमेंशिया की गिरफ्त में आते बुजुर्ग

 

डॉ राजेंद्र प्रसाद शर्मा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैसे-जैसे बुजुर्गों की संख्या बढ़ने लगी है वैसे ही डिमेंशिया की बीमारी का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। बहुत कुछ आज की सामाजिक व्यवस्था व सामाजिक परिवेश डिमेंशिया का कारण बनता जा रहा है। एक ओर एकल परिवार, अपने में खोये रहना और दिन-प्रतिदिन की भागमभाग है तो दूसरी और पढ़ने-पढ़ाने की आदत कम होना, प्रमुख कारण है। गूगल गुरु ने तो सबकुछ बदल कर ही रख दिया है। दुनिया में डिमेंशिया प्रभावितों की संख्या में दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो अगले 25 साल में डिमेंशिया की रोगियों की संख्या में तीन गुणा बढ़ोतरी हो जाएगी।

डिमेंशिया खासतौर से बुजुर्गों की होने वाली बीमारी है। इसमें मनोभ्रांति की स्थिति हो जाती है और भूलने या निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। इसमें बुजुर्ग धीरे-धीरे अपनी याददाशत को खोने लगते हैं। भारत के संदर्भ में यह इसलिए गंभीर हो जाती है कि चीन और जापान की तरह भारत में भी आने वाले सालों में बुजुर्गों की संख्या अधिक हो जायेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के देशों में डिमेंशिया की बीमारी से पांच करोड़ लोग जूझ रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार 2050 तक डिमेंशिया से प्रभावितों की संख्या 15 करोड़ से अधिक होने की संभावना है। 

दुनिया के देशों में हर साल करीब 10 लाख लोग इस बीमारी की गिरफ्त में आ रहे हैं। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार अफ्रीका के उपसहारा क्षेत्र, उत्तरी अफ्रीका और मध्यपूर्व में डिमेंशिया के रोगियों की संख्या अधिक बढ़ रही है। मेलबोर्न के मोनाश विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार रुटीन बदलने से काफी हद तक इस बीमारी के असर को कम किया जा सकता है। इसमें खासतौर से बुजुर्ग व्यस्त रह करके डिमेंशिया के असर को कम कर सकते हैं या यों कहें कि डिमेंशिया का खतरा कम हो सकता है। एक बात और कि इसके लिए बुजुर्गों को कुछ खास करने की आवश्यकता भी नहीं है, बस कुछ कुछ आदतों में बदलाव लाने की जरूरत है।

दरअसल, एक समय लोगों में लिखने-लिखाने और पढ़ने-पढ़ाने की आदत होती थी। किस्सागोई की परंपरा थी तो गांवों-शहरों में चौपालें होती थी। बड़े-बुजुर्ग वहां बैठकर मोहल्ले में घटने वाली घटनाओं पर नजर रखते थे। वहीं आपसी चर्चा, ताश, चौपड़, शतरंज आदि खेल, गाना-बजाना या इसी तरह की गतिविधियां चलती रहती थी। इसके अपने फायदे भी थे। बड़े-बुजुर्गों की इस चौपाल से जहां मोहल्ले की सुरक्षा चाक-चौबंद रहती थी, वहीं मोहल्ले में असामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगता था। 

बड़े-बुजुर्गों की व्यस्तता के साथ ही आपसी दुख-दर्द को भी साझा किया जाता था तो समस्या के समाधान खोजने के साझा प्रयास होते थे। काफी हद तक मन का बोझ भी कम हो जाता था। पर आज हालात इसके ठीक विपरीत होते जा रहे हैं। चौपालों की परंपरा तो लगभग खत्म ही हो गई है। ले देकर ड्राइंम रूम संस्कृति रह गई है। उसमें भी अब सोशियल मीडिया और कम्प्यूटर-मोबाइल ने एक ही कमरे को अलग-अलग हिस्सोें में बांट कर रख दिया है। सब अपने-अपने मोबाईल पर उंगुलियां घुमाने में व्यस्त रहते हैं और एक-दूसरे से बात करने, सुनने-सुनाने का तो समय ही नहीं रह गया है। 

इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। संवेदनहीनता, एकाकीपन, स्वार्थता, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा और ना जाने कितनी ही समस्याएं सामने आने लगी हैं। यही कारण है कि आज अधिक संख्या में लोग मनोविकारों से पीड़ित होने लगे हैं। एक अध्ययन में सामने आया है कि लिखने-लिखाने और पढ़ने-पढ़ाने की आदत से बुजुर्गों को डिमेंशिया की बीमारी से काफी हद से बचाया जा सकता है। पढ़ने-पढ़ाने से व्यक्ति किताबों की दुनिया में खो जाता हैं। इससे उसे अलग तरह का ही अनुभव होता है। पढ़ने-पढ़ाने या लिखने लिखाने की आदत से डिमेंशिया की बीमारी का खतरा 11 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

जिसे हम हॉबी कहते हैं वह हॉबी यानी कि चित्रकारी, कुछ गाना बजाना, गुनगुनाना, अखबार पढ़ना, किताबों की दुनिया से जुड़ना आदि से भी डिमेंशिया के खतरे को कम किया जा सकता है। दरअसल जितना अधिक बुजुर्गों का गतिविधियों में इनवोल्वमेंट होगा उतनी ही अधिक संभावनाएं डिमेंशिया के खतरे को कम करने में होगी। परिवार जनों के साथ नियमित रुप से संवाद कायम रखने यानी कि हंसने बोलने, खेलने-खिलाने से भी डिमेंशिया का खतरा कम होता जाता है। 

इसके साथ ही बुजुर्गों का सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी से भी बहुत कुछ राहत मिल सकती है। बुजुर्गों को किसी ना किसी गतिविधि से जोेड़कर उसमें सक्रिय किया जाता है तो डिमेंशिया के शिकार होने की संभावनाएं कम होती जायेगी। आज भूलने भुलाने की आदत तो युवाओं तक में देखने को मिलने लगी है। ऐसे में बुजुर्गों की सक्रियता को बनाये रखना आवश्यक हो जाता है। 

डिमेंशिया के बढ़ते खतरे को देखते हुए गैरसरकारी संगठनों, सामाजिक सस्थानों आदि को भी सक्रिय होना होगा क्योंकि आने वाले समय में यह समस्या और अधिक बढ़ेगी। ऐसे में मनोविश्लेषकों, चिकित्सकों, सामाजिक कार्यकतार्ओं आदि को अधिक गंभीरता से प्रयास करने होंगे। एकल परिवार, नौकरी के कारण एक दूसरे से दूरी, प्रतिस्पर्धा के चलते अलग तरह की कुंठा और मानसिक परेशानी सबको परेशान करने लगी है। समय रहते इसका हल खोजना होगा। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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