एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी 15 फरवरी को मोदी सरकार की उस योजना को अवैध करार दिया है जिसे वह साल 2018 में लेकर आयी थी? जिसके जरिये राजनीतिक तरफ से बिना किसी के नाम को उजागर किये डोनेशन के नाम पर पैसे ले सकती थीं। इसके साथ ही देश की टॉप कोर्ट ने स्टेट बैंक आॅफ इंडिया (एसबीआइ) को तुरंत प्रभाव से कोई भी नया चुनावी बॉन्ड जारी न करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने आज के फैसले में चुनावी बॉन्ड को लेकर रइक को और भी निर्देश दिये हैं और बॉन्ड की वैधानिकता पर कई सवाल उठाये हैं। इस बीच आइये जानते हैं सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा चुनावी बॉन्ड के बारे में और क्या था एसबीआइ के लिए निर्देश? लेकिन, इससे पहले ये जानना जरूरी है कि चुनावी बॉन्ड होता क्या है? केंद्र सरकार इसे क्यों लेकर आयी थी और मोदी सरकार की इसे लाने के पीछे क्या सोच थी?
साल 2017 के यूनियन बजट में सरकार चुनावी बॉन्ड लेकर आयी थी, उस समय देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली थे। इसके बाद, कई विरोधों के बावजूद सरकार ने इसे 2 जनवरी, 2018 को नोटिफाई कर दिया और राजनीतिक पार्टियों को डोनेशन प्राप्त करने के लिए नकद के बजाय बॉन्ड का आप्शन दे दिया।
सरकार का कहना था कि चुनावी बॉन्ड से ज्यादा पारदर्शिता सुनिश्चित हो सकेगी क्योंकि जो भी रकम राजनीतिक पार्टियों को मिलेगी, वह बैंक खाते से होकर आयेगी और काले धन में कमी आयेगी।
इस योजना के तहत यह भी नियम है कि जो भी पैसा राजनीतिक पार्टियों को जा रहा है और जो भी व्यक्ति या संस्था उस रकम को भेज रही है उसकी जानकारी केवल एसबीआइ को रहेगी। इसके अलावा, कोई भी व्यक्ति या पार्टी इसकी जानकारी नहीं प्राप्त कर सकेगी।
अगर आप किसी राजनीतिक पार्टी को पैसे दान देना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको कुछ चुनिंदा और केवल भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) की ब्रांच जाना पड़ेगा। वहां आप बैंक को पैसा देंगे और जिस पार्टी को पैसा देना होगा उसकी जानकारी देंगे। इसके बाद रइक आपको पैसे लेकर उसकी जगह उतनी ही रकम की एक बॉन्ड जारी कर देगी।
अब आप वह बॉन्ड लेकर उस पार्टी के पास जायेंगे और वह बॉन्ड जमा कर देंगे। इसके बाद वह पार्टी उस रकम को 15 दिन के अंदर-अंदर भुना लेगी। अगर यह टाइम लिमिट पार हो जाती है तो वह पैसा पार्टी के खाते में नहीं जायेगा बल्कि पूरी रकम प्रधानमंत्री राहत कोष के खाते में चला जाता है।
वित्त मंत्रालय की आर्थिक मामलों के विभाग की तरफ से जारी नोटिस के मुताबिक, चुनावी बॉन्ड के जरिये कितनी भी रकम डोनेट की जा सकती है, उसे लेकर कोई लिमिट नहीं लगायी गयी है। हालांकि यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इसके आप अपनी पूरी मनमर्जी से पैसे नहीं दान दे सकते।
यह रकम कुछ निश्चित गुणक में ही दी जा सकती है, जैसे- एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख, एक करोड़, दस करोड़। इसके जरिये किये जाने वाले डोनेशन में बिलकुल भी टैक्स नहीं लगता है, यानी यह बिलकुल टैक्स फ्री होता है।
भारतीय चुनाव आयोग के डेटा के मुताबिक, साल 2022-23 में सबसे ज्यादा डोनेशन पाने वाली पार्टी भाजपा रही। भाजपा को इस दौरान करीब 1294.14 करोड़ रुपये की डोनेशन प्राप्त हुई। वहीं, दूसरे नंबर पर रहने वाली कांग्रेस को करीब 171.02 करोड़ रुपये मिले। इसके अलावा आम आदमी पार्टी को 45.45 करोड़ रुपये मिले।
सुप्रीम कोर्ट के 15 फरवरी के फैसले से पहले केंद्र ने 5 फरवरी को लोकसभा में बजट सेशन के दौरान बताया था कि अब तक रइक के जरिये 30 किश्तों में 16,518 करोड़ रुपये के चुनावी बांड बेचे गये हैं। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में, वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा, भारतीय स्टेट बैंक से खरीदे गए चुनावी बांड (फेड- क से फेज-30) का कुल मूल्य करीब 16,518 करोड़ रुपये है।
साल 2018 में जब ये योजना लागू की गई तो उसके पहले कुछ कानूनी बदलाव भी किए गए, जैसे कंपनी एक्ट, इनकम टैक्स एक्ट, विदेशों से आने वाली रकम के लिए कानून- फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट और रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया एक्ट।
योजना के लागू होते ही कई राजनीतिक पार्टियां चुनावी बॉन्ड की पारदर्शिता पर सवाल उठाने लगीं जिसके बाद, कांग्रेस नेता डॉ जया ठाकुर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और एसोसिएशन फॉर डेमोके्रटिक रिफॉर्म्स ने इस योजना को यह तर्क देकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी कि इसके जरिये राजनीतिक पार्टियां अनगिनत पैसा कमा सकती हैं।
इसके अलावा, यह योजना सूचना के अधिकार का भी उल्लंघन करती है, जो कि भारतीय संविधान के मुताबिक, मूल अधिकार का हनन है। बता दें कि अऊफ चुनाव से संबंधित कई तरह के आंकड़े समय-समय पर पेश करता रहता है जैसे- किस पार्टी को कितना पैसा मिला आदि।
दूसरी ओर, सरकार ने इस योजना को पारदर्शी बताते हुए बचाव किया और कहा कि राजनीतिक डोनेशन में गुमनामी की जरूरत है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अन्य राजनीतिक दलों से बदले की कोई आशंका न हो। मोदी सरकार ने यह भी तर्क दिया गया कि यह योजना सुनिश्चित करती है कि सफेद धन का उपयोग उचित बैंकिंग चैनलों के माध्यम से राजनीतिक फंडिंग के लिए किया जाये।
इसके बाद साल 2023 में 31 अक्टूबर से लेकर 2 नवंबर तक इस मामले की सुनवाई हुई। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की संवैधानिक पीठ ने 2 नवंबर को इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और 15 फरवरी, 2024 को इसे अवैध करार दे दिया।
आज यानी 15 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनावी बॉन्ड की यह योजना सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है और इससे बदले की भावना पैदा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना को आर्टिकल 19(1) का उल्लंघन माना।
चुनावी बांड योजना काले धन पर अंकुश लगाने वाली एकमात्र योजना नहीं है। इसके अलावा, अन्य विकल्प भी हैं। टॉप कोर्ट ने यह भी कहा कि कॉरपोरेट राजनीतिक फंडिंग की परमिशन देने वाली आॅर्टिकल 182 कंपनी अधिनियम में संशोधन भी असंवैधानिक है।
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने चुनावी बांड को जारी करने वाले बैंक यानी एसबीआइ को इसे जारी करने पर तुरंत रोक लगाने का भी निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बैंक से यह भी कहा कि वह चुनावी बांड के जरिये प्राप्त डोनेशन की डिटेल और 6 मार्च, 2024 तक डोनेशन प्राप्त करने वाले राजनीतिक दलों का डिटेल भी दे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो डोनेशन बॉन्ड के रूप में पार्टियों को सौंपे जा चुके हैं, लेकिन पार्टी ने उन्हें अभी कैश में नहीं बदलवाया है उसे बैंक को वापस कर दिए जाएं और वह पैसा फिर से उन लोगों के खाते में डाल दिया जाये, जिन्होंने रकम दान दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 31 मार्च, 2024 तक चुनाव आयोग अपनी आॅफिशियल वेबसाइट पर चुनावी बाॉन्ड की डिटेल जारी करे।
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