महर्षि वेदव्यास को मिलता है पहले गुरु का सम्मान...

 

एबीएन डेस्क। उन्हें विश्व के इतिहास में पहले गुरु संपादक के रूप में स्वीकार करते हुए हम उनकी जन्म और कर्म को लोगों तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने जितनी रचना की उतना विश्व के इतिहास में किसी दूसरे ने नहीं किया। उमहाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना करने वाले वेद व्यास के जीवन के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। महर्षि वेद व्यास के पिता कौन थे, किन परिस्थितियों में व्यास का जन्म हुआ, उनका जीवनकाल कैसे और कहां बीता, आदि जैसे घटनाक्रम के विषय में ज्यादा चर्चाएं नहीं हुई हैं। वेदों का विस्तार करने के कारण ये वेदव्यास तथा बदरीवन में निवास करने के कारण बादरायण के नाम से भी जाने जाते हैं। वेद व्यास ने चारो वेदों के विस्तार के साथ-साथ अठारह महापुराणों तथा ब्रह्मसूत्र का भी प्रणयन किया। हिन्दू पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने ही व्यास के रूप में अवतार लेकर वेदों का विस्तार किया था। वेद सबसे प्राचीण ग्रंथो में एक है।महर्षि वेदव्यास न केवल महाभारत के रचयिता हैं, बल्कि वह उन घटनाओ के भी साक्षी रहे हैं जो क्रमानुशार घटित हुई हैं। असल में इस महान धार्मिक ग्रंथ में व्यासजी की भी एक अदद भूमिका है। वेदव्यास उन मुनियों में से एक हैं, जिन्होंने अपने साहित्य और लेखन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यथार्थ और ज्ञान का खजाना दिया है। महर्षि व्यास ने न केवल अपने आसपास हो रही घटनाओं को लिपिबद्ध किया, बल्कि वह उन घटनाओं पर बराबर परामर्श भी देते थे। महर्षि वेदव्यास ने समस्त विवरणों के साथ महाभारत ग्रन्थ की रचना कुछ इस तरह की थी कि यह एक महान इतिहास बन गया। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि महाभारत में उल्लखित घटनाएं सत्य और प्रमाणिक वृत्तांत है। भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र भगवान गणेश ने वेदव्यास के मुख से निकली वाणी और वैदिक ज्ञान को लिपिबद्ध करने का काम किया था। आम जनों को समझने में आसानी हो, इसलिए मर्हिष व्यास ने अपने वैदिक ज्ञानन को चार हिस्सों में विभाजित कर दिया। वेदों को आसान बनाने के लिए समय-समय पर इसमें संशोधन किए जाते रहे हैं। कहा जाता है कि वेदव्यास ने इसे 28 बार संशोधित किया था। महर्षि व्यास का जन्म त्रेता युग के अन्त में हुआ था। वह पूरे द्वापर युग तक जीवित रहे। कहा जाता है कि महर्षि व्यास ने कलियुग के शुरू होने पर यहां से प्रयाण किया। महर्षि व्यास को भगवान विष्णु का 18वां अवतार माना जाता है। महर्षि राम विष्णु के 17वें अवतार थे। बलराम और कृष्ण 19वें और 20वें। इसके बारे में श्रीमद् भागवत में विस्तार से लिखा गया है, जिसकी रचना मुनि व्यास ने द्वापर युग के अन्त में किया था। श्रीमद् भागवतम की रचना महाभारत की रचना के बाद की गई थी। महर्षि व्यास का जन्म नेपाल में स्थित तानहु जिले के दमौली में हुआ था। महर्षि व्यास ने जिस गुफा में बैठक महाभारत की रचना की थी, वह नेपाल में अब भी मौजूद है। इस मानचित्र के माध्यम से आप नेपाल में तानहू के बारे में जान सकते हैं। महर्षि वेदव्यास के पिता ऋषि पराशर थे। उनकी माता का नाम सत्यवती था। पराशर यायावर ऋषि थे। एक नदी को पार करने के दौरान उन्हें नाव खेने वाली सुन्दर कन्या सत्यवती से प्रेम हो गया। बाद में सत्यवती ने ऋषि व्यास को जन्म दिया। व्यास पितमाह भीष्म के सौतेले भाई थे। बाद में सत्यवती ने हस्तिनापुर के राजा शान्तनु से विवाह कर लिया। शान्तनु भीष्म के पिता थे। इस विवाह के लिए सत्यवती के पिता ने राजा शान्तनु के समक्ष यह शर्त रखी थी कि सत्यवती के गर्भ से जन्म लेने वाला बालक ही हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी होगा। हालांकि इससे पहले ही शान्तनु ने अपने पुत्र देवव्रत को हस्तिनापुर का युवराज घोषित कर दिया था। इसी प्रतिज्ञा की वजह से उनका नाम भीष्म पड़ा। बाद में उनके पिता शान्तनु ने उन्हें ईच्छा-मृत्यु का वरदान दिया। वेदव्यास धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर के जैवीय या आध्यात्मिक पिता थे। वेदव्यास के जन्मदिन के अवसर पर गुरू पुर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। व्यासजी के बारे में कहा जाता है कि द्वापर युग के दौरान उन्होंने पुराण, उपनिषद, महाभारत सहित वैदिक ज्ञान के तमाम ग्रन्थों की रचना की थी। कलियुग के शुरू होने के बाद वेदव्यास के बारे में कोई ठोस जानकारी या दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। माना जाता है कि वह तप और ध्यान के लिए पर्वत श्रृंखलाओं में लौट गए थे। दो बौद्ध जातक कथाओं ‘कान्हा दीपायना’ और ‘घाटा’ में मर्हिष वेदव्यास का जिक्र किया गया है। प्रथम जातक कथा में उन्हें बोधिसत्व कहा गया है। हालांकि इसमें उनके वैदिक ज्ञान की चर्चा नहीं की गई है। दूसरी जातक कथा में उन्हें महाभारत का रचयिता और इससे जुड़ा हुआ व्यक्ति बताया गया है। अपनी मां के कहने पर वेद व्यास ने विचित्रवीर्य की रानियों के साथ नियोग किया, जिसके बाद पांडु और धृतराष्ट्र का जन्म हुआ। तीन पुत्र: वेद व्यास ने विचित्रवीर्य की रानियों, अंबिका और अंबालिका के अलावा एक दासी के साथ भी नियोग की प्रथा का पालन किया, जिसके बाद विदुर का जन्म हुआ। तीनों पुत्रों में से विदुर वेद-वेदान्त में पारंगत और नीतिवान पुत्र थे। वेद व्यास का नाम: द्वैपायन द्वीप पर जाकर तपस्या करने और काले रंग की वजह से उन्हें कृष्ण द्वैपायन नाम दिया गया, जो आगे चल कर वेदों का भाष्य करने के कारण वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए।महर्षि वेदव्यास ने समस्त विवरणों के साथ महाभारत ग्रन्थ की रचना कुछ इस तरह की थी कि यह एक महान इतिहास बन गया।हिन्दू धर्म में मान्यता है कि महाभारत में उल्लखित घटनाएं सत्य और प्रमाणिक वृत्तांत है। भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र भगवान गणेश ने वेदव्यास के मुख से निकली वाणी और वैदिक ज्ञान को लिपिबद्ध करने का काम किया था। भारत के बहुत से संप्रदाय तो केवल गुरुवाणी के आधार पर ही कायम हैं। भारतीय संस्कृति के वाहक शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रुका का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर जो वेद व्यास जी के जन्म दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। गुरु तत्व की प्रशंसा तो सभी शास्त्रों ने की है।

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