एबीएन सोशल डेस्क। अध्यात्म के उपासना, साधना एवं आराधना के महाविज्ञान में सद्गुरु, सत्संग और सत्सानिध्य का ही प्रमुख महत्व है और उनके ही माध्यम से साधक स्वयं का परिमार्जन करता है। सद्गुरु उन्हें कहा जाता है जिनका सत्य के साथ एकात्मकता स्थापित हो जाती है।
व्यक्ति एवं सत्य में विभेद ना रह जाए ऐसे व्यक्ति सद्गुरु के उच्च पद पर प्रस्थापित हो जाते हैं। सतगुरु से सशरीर सानिध्य सर्वोत्तम तो होता है परंतु यह भी आवश्यक नहीं है कि सद्गुरु से हर घड़ी शारीरिक निकटता बनी रहे। जब गुरु एवं शिष्य का सानिध्य गहन एवं सघन हो जाती है तब आत्म-मिलन और आत्म-एकाकार की अद्भुत घटना घटित होती है।
सद्गुरु अपने शिष्य के सूक्ष्म शरीर में स्थापित हो जाते हैं और उनकी उपस्थिति का तरंग श्वास, प्रश्वास तथा हृदय की धड़कन के साथ संपूर्ण स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर में प्रवाहित होते रहता है। इंद्रियों के द्वारा अनुभूति तथा ग्रहण करने की क्षमता सीमित होती है, जबकि शारीरिक संरचना के अंदर अदृश्य संस्थाओं से उठने वाले तरंगों का प्रभाव व्यापक एवं स्थाई होता है।
सत्य का अन्वेषण बुद्धि, विवेक एवं तर्क के आधार पर नहीं किया जा सकता है। सत्य के अन्वेषण के लिए श्रद्धा, भक्ति, विश्वास और निष्ठा का मिश्रित शक्तिशाली आधार चाहिए। जैसे ही सत्य की ओर यात्रा प्रारंभ होती है जीवन में अद्भुत घटित होने लगती है जिसे भौतिक जगत में चमत्कार के रूप में देखा और समझा जाता है।
जबकि सत्य के अन्वेषक को इन चमत्कारों से कोई लेना-देना नहीं रहता है वह तो सत्य से एकाकार बाद ही गुरु के ऋण से मुक्त हो पता है। मनुष्य की इच्छा अनंत है जिसकी पूर्ति शायद ही हो पाती है। इच्छाओं का, क्रिया प्रतिक्रिया का और असंतोष का भारी बोझ ढोने से कहीं अच्छा है सत्य के सानिध्य में जीवन की यात्रा को पूरी की जाय।
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