एबीएन सेंट्रल डेस्क। साल 2025 में दिल्ली स्किल यूनिवर्सिटी की बीटेक, यूजी-पीजी की आधी से ज्यादा सीटें खाली रह गयीं। सवाल उठ रहे हैं कि जिस कोर्स में दाखिले के लिए लोगों की सांसें अटकी रहती हैं, एक-एक सीट पर कड़ी टक्कर होती है, उसमें दिल्ली के गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन में 76% सीटें खाली क्यों?
दिल्ली स्किल एंड आंत्रप्रेन्योरशिप यूनिवर्सिटी (डीएसयूई) के अंडरग्रेजुएट, पोस्टग्रेजुएट कोर्सेस और एनईपी स्ट्रक्चर के साथ शुरू हुए कोर्सेस में इस साल (2025) स्टूडेंट्स ने दिलचस्पी नहीं दिखायी है। यूनिवर्सिटी के बीटेक कोर्सेस की 840 सीटों में से 642 सीटें खाली रही हैं। पीजी कोर्सेस में 260 में से 161 सीटें खाली रहीं।
वहीं, यूनिवर्सिटी के यूजी लेवल तक के 45 कोर्सों की 2850 सीटों में से 1228 सीटें भर नहीं पायीं। दिल्ली सरकार की इस यूनिवर्सिटी के लिए यह रिस्पॉन्स बड़ी चिंता है। हालांकि, डिप्लोमा कोर्सेस में डीएसयूई में 2850 सीटों में से 2645 सीटें भरीं, कई में सीटों से ज्यादा दाखिले भी हुए।
डीएसईयू के वाइस चांसलर प्रोफेसर अशोक नगावत का कहना है कि बीटेक कोर्स शुरू करने की वजह डिप्लोमा स्टूडेंट्स ही हैं, जिन्हें हम बीटेक में लैटरल एंट्री देते हैं। इसलिए इनकी खाली सीटें बड़ी दिक्कत नहीं है। दूसरा- कुछ कोर्सों में हमें स्टूडेंट्स कम जरूर मिले हैं, मगर कोर्स चल रहे हैं और इंडस्ट्री की मांग भी हैं।
यूनिवर्सिटी में परमानेंट फैकल्टी और लैब इंफ्रास्ट्रक्चर की किल्लत पर वीसी कहते हैं कि हमारे पास 17 हजार स्टूडेंट्स हैं और कम से कम एक हजार टीचर्स की जरूरत है। अभी परमानेंट फैकल्टी 400 ही हैं। मगर काफी गेस्ट फैकल्टी रखे गये हैं।
हम नए फैकल्टी, करिकुलम/कोर्स डिजाइन, आन जॉब ट्रेनिंग, प्लेसमेंट, इंडस्ट्री सपोर्ट हर पहलू को लेकर हर कोशिश कर रहे हैं। साथ ही, फीस भी दिल्ली सरकार की किसी भी यूनिवर्सिटी में सबसे कम है। आखिरी बार फीस 2024 में बढ़ाई थी, जो जरूरी था।
हाल ही में दिल्ली सरकार ने डीएसईयू में पॉलिटेक्निक के जुड़ने के असर, कोर्सों की क्वॉलिटी, फीस, प्रवेश प्रक्रिया, फैकल्टी और संसाधनों के इस्तेमाल और गवर्नेंस से जुड़ी परेशानियां की विस्तार से समीक्षा करने के लिए एक पैनल बनाया है। ये पैनल अपनी सिफारिशें दिल्ली सरकार को देगा।
आम आदमी पार्टी की सरकार ने 2020-21 में डीएसयूआई लॉन्च की और सभी 22 पॉलिटेक्निक संस्थानों को इससे जोड़ दिया। इनमें पूसा पॉलिटेक्निक, जीबी पंत पॉलिटेक्निक, आर्यभट्ट पॉलिटेक्निक जैसे नामी संस्थान शामिल थे। इससे पहले ये दिल्ली सरकार के डीटीटीई से जुड़े थे।
इस विभाग की 400 फैकल्टी समेत पार्ट टाइम/कॉन्ट्रैक्ट फैकल्टी/स्टाफ को डीम्ड डेप्युटेशन के तहत यूनिवर्सिटी भेज दिया गया। मगर अब सभी वापस जाने की मांग कर रहे हैं। इनका कहना है कि मर्जर के फैसले से पॉलिटेक्निक की क्वॉलिटी घटी है। कुछ प्रोग्राम बंद हो गये, फीस महंगी हो गयी, जिससे दिल्ली में तकनीकी शिक्षा को नुकसान पहुंचा है।
डीएसइयू अपने कोर्सों के लिए एआईसीटीई (आल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन) से मंजूरी नहीं लेती है। इसे भी स्टूडेंट्स कम मिलने की वजह माना जा रहा है। साल 2025 में जून में हायर एजुकेशन सेक्रेटरी की तरफ से भी यूनिवर्सिटी वीसी को पत्र भेजा गया था कि वो नये सेशन शुरू होने से पहले अपने टेक्निकल इंस्टिट्यूट, डिप्लोमा प्रोग्राम के लिए एआईसीटीई से अप्रूवल लेने के लिए कदम उठायें।
क्योंकि सरकारी नौकरियों में एआईसीटीई अप्रूवल पूछा जाता है। हालांकि, प्रो नगावत कहते हैं कि एनईपी के तहत हायर एजुकेशन कमीशन आफ इंडिया (एचईसीवाई) बनने का काम प्रक्रिया में है, जिसके साथ एआईसीटीई खत्म हो जायेगा, तो ऐसे में इसकी जरूरत नहीं। नौकरी के लिए भी यूनिवर्सिटी लिखकर दे सकती है। एक अधिकारी कहते हैं कि दिल्ली सरकार के इंजीनियरिंग संस्थानों के लिए बीटेक/बी आर्किटेक्चर की जॉइंट एडमिशन कमेटी (जेएसी) की काउंसलिंग से डीएसईयू के हटने का भी नुकसान हुआ है।
मगर वीसी का कहना है कि इस काउंसलिंग में स्टूडेंट्स की प्राथमिकता बाकी इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट रहते हैं, जो कि पुराने और प्रतिष्ठित हैं। हमारी यूनिवर्सिटी नयी है और इसका नेचर भी अलग है, ऐसे में सीटें भरने के लिए लंबा इंतजार करने के बजाय हम खुद जेईई मेन स्कोर पर दाखिले कर रहे हैं।
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