पौष पुत्रदा एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और भक्ति का है पर्व : संजय सर्राफ

 

  • पौष पुत्रदा एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और भक्ति का है पर्व : संजय सर्राफ

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद झारखंड सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में एकादशी व्रतों का विशेष महत्व है।

 इन्हीं में से एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत है पौष पुत्रदा एकादशी जो पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 30 दिसंबर की सुबह 7 बजकर 50 मिनट पर शुरुआत होगी तथा इसी तिथि का समापन 31 दिसंबर को सुबह 5 बजे होगा, ऐसे में 30 दिसंबर को पौष पुत्रदा एकादशी व्रत किया जाएगा, इस व्रत का पारण 31 दिसंबर को किया जाएगा।

 कई भक्त साधक इस व्रत को 31 दिसंबर को करेंगे।धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की उपासना विशेष फल प्रदान करती है। पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को यह व्रत रखा जाता है। पुत्रदा का अर्थ है-पुत्र या संतान देने वाली। शास्त्रों के अनुसार यह एकादशी विशेष रूप से संतान प्राप्ति, पारिवारिक सुख-शांति और वंश वृद्धि के लिए मनाई जाती है। 

जिन दंपत्तियों को संतान सुख नहीं मिलता, वे श्रद्धा एवं विधि-विधान से इस व्रत को रखकर भगवान विष्णु से संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मांगते हैं। इस एकादशी का उल्लेख पद्म पुराण, स्कंद पुराण आदि धर्मग्रंथों में मिलता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान प्राप्ति का योग बनता है, परिवार में सुख-समृद्धि और शांति आती है।

पूर्व जन्मों के पापों का नाश होता है,तथा मन, वचन और कर्म की शुद्धि होती है।यह व्रत केवल संतान की कामना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को संयम, भक्ति और धार्मिक अनुशासन का मार्ग भी दिखाता है। भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

पौराणिक कथा के अनुसार भद्रावती नामक नगरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। वे धर्मपरायण और न्यायप्रिय थे, परंतु उन्हें संतान न होने का गहरा दुःख था।राजा-रानी ने अनेक उपाय किए, किंतु कोई लाभ नहीं हुआ। एक दिन ऋषियों के मार्गदर्शन से उन्होंने पौष शुक्ल एकादशी का व्रत पूरे विधि- विधान से किया और भगवान विष्णु की आराधना की। 

उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। समय आने पर रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। तभी से यह एकादशी पौष पुत्रदा एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हुई। पौष पुत्रदा एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और भक्ति का पर्व है। 

यह व्रत संतान सुख की कामना करने वालों के साथ-साथ हर भक्त को भगवान विष्णु के चरणों में समर्पण और धार्मिक जीवन जीने की प्रेरणा देता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया यह व्रत जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

Tranding

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse