बीमा क्षेत्र में 100% एफडीआई की अनुमति से बढ़ावा की उम्मीद

 

बीमा क्षेत्र में 100% एफडीआई से निवेश, प्रतिस्पर्धा और सुशासन को मिलेगा बढ़ावा 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। बीमा कानून संशोधन विधेयक के जरिये बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति दी गयी है जिससे निवेश, प्रतिस्पर्धा और नियामकीय लचीलापन बढ़ाये जाने की उम्मीद है। 

संसद ने इस सप्ताह सबका बीमा सबकी रक्षा (बीमा कानून संशोधन) विधेयक, 2025 को मंजूरी दे दी और इसके साथ ही बीमा कंपनियों के विदेशी निवेश की सीमा 74 फीसदी से बढ़कर 100 फीसदी हो गयी तथा उनके पूर्ण विदेशी स्वामित्व का मार्ग प्रशस्त हो गया। यह वर्ष 2000 में आरंभ हुई उदारीकरण की प्रक्रिया का शीर्ष है। उसी साल इस क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला गया था और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई की सीमा 26 फीसदी तय की गई थी। 

वर्ष 2014 में इसे बढ़ाकर 49 फीसदी और 2021 में 74 फीसदी कर दिया गया था। मार्च 2021 तक कुल 41 बीमा कंपनियों में एफडीआई था और सितंबर 2024 तक इस उद्योग ने वर्ष 2000 में सुधारों की शुरुआत के बाद से लगभग 82,847 करोड़ रुपये का एफडीआई आकर्षित किया, जो निवेशकों की रुचि को रेखांकित करता है। 

आशा है कि अधिक एफडीआई से ज्यादा वैश्विक बीमा कंपनियां देश में आयेंगी और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा इस क्षेत्र में सुशासन मानकों को मजबूती हासिल होगी। जीवन बीमा और गैर जीवन बीमा क्षेत्रों में करीब 73 बीमा कंपनियों की मौजूदगी के बावजूद भारत में बीमा प्रसार सकल घरेलू उत्पाद का केवल 3.7 फीसदी है जो वैश्विक औसत का करीब आधा ही है। 

विधेयक ने तीन कानूनों को संशोधित किया है- बीमा अधिनियम 1938, जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 और बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम 1999। विधेयक का एक प्रमुख प्रावधान भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) को क्षेत्र-विशिष्ट लाइसेंस जारी करने का अधिकार देता है, जिससे बीमा कंपनियां साइबर, संपत्ति या समुद्री बीमा जैसी एकल या विशिष्ट व्यावसायिक क्षेत्रों में काम कर सकेंगी। 

अधिक व्यापक तौर पर देखें तो वैधानिक प्रावधानों से हटकर विधेयक एक विनियमन-आधारित ढांचे की ओर बदलाव को दर्शाता है, जिसके अंतर्गत कई परिचालन मानदंड संसद द्वारा अनुमोदित कानून के बजाय आईआरडीएआई द्वारा विनियमों के माध्यम से तय किए जायेंगे। इसमें एजेंटों और मध्यस्थों के लिए कमीशन और पारिश्रमिक की सीमा शामिल है, जिससे नियामक को बाजार की परिस्थितियों और उपभोक्ता संरक्षण उद्देश्यों के अनुरूप इन सीमाओं को समायोजित करने के लिए अधिक लचीलापन मिलेगा। 

विधेयक यह भी प्रस्तावित करता है कि न्यूनतम पूंजी आवश्यकताएं, सॉल्वेंसी मार्जिन और निवेश मानदंड जैसे प्रमुख पैरामीटर को कानून से हटाकर विनियमन में स्थानांतरित किया जाये, जिससे आईआरडीएआई की पर्यवेक्षण की भूमिका में उल्लेखनीय विस्तार होगा। इस क्षेत्र में आगामी सुधार संभवत: समग्र लाइसेंसों पर केंद्रित हो सकता है, जो एक ही इकाई को जीवन और गैर-जीवन बीमा दोनों संचालित करने की अनुमति देगा, जैसा कि विकसित देशों सहित कई स्थानों पर प्रचलित है। 

जैसे-जैसे बीमा क्षेत्र अधिक प्रतिस्पर्धा और विदेशी निवेश के लिए खुल रहा है, लंबे समय से चली आ रही चुनौतियां अब भी इसकी पहुंच और विश्वसनीयता को सीमित करती हैं। बीमा कवरेज में असमानता है। विशेषकर ग्रामीण और अनौपचारिक क्षेत्रों में, जहां जागरूकता, वहन करने की क्षमता और वितरण की खामियां बनी रहती हैं। दावों के निपटान में देरी और भुगतान को लेकर विवादों ने सार्वजनिक विश्वास को और कमजोर किया है, जिससे व्यापक स्तर पर अपनाने की प्रवृत्ति हतोत्साहित हुई है। 

इन समस्याओं से निपटने के लिए आईआरडीएआई ने बीमा सुगम डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे सुधार लागू किये हैं, जिसका उद्देश्य बीमा पॉलिसियों की खरीद, सेवा और निपटान के लिए एकीकृत बाजार तैयार करना है। सामान्य केवाईसी (अपने ग्राहक को जानें) मानदंड और सुव्यवस्थित शिकायत निवारण तंत्र तनाव को कम करने, पारदर्शिता बढ़ाने और बीमा को अधिक सुलभ बनाने के लिए बनाये गये हैं। 

अंतत:, बीमा सुधारों की सफलता केवल स्वामित्व उदारीकरण पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि इस पर भी कि नियामकीय लचीलापन, उपभोक्ता संरक्षण और अंतिम स्तर तक पहुंच को कितनी अच्छी तरह संतुलित किया जाता है, ताकि सुधार वास्तविक वित्तीय सुरक्षा में परिवर्तित हो सके। फिर चाहे वह परिवारों के लिए हो या व्यवसायों के लिए।

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