एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैन धर्म के 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर महावीर का जन्म बिहार वैशाली के कुंडा ग्राम में राजा सिद्धार्थ तथा मां त्रिशला के यहां ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी हुआ था। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने गृह का त्याग किया और सत्य के अन्वेषण के लिए 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की।
जैन धर्म की परंपरा में आज का दिन आत्म स्मरण की दिशा की ओर ले जाता है। मनुष्य के बाहरी संघर्ष से भी बड़ा संघर्ष उसके भीतर चलते रहता है। अहिंसा बाहरी आचरण के अतिरिक्त वास्तव में एक आंतरिक अनुशासन है। खोने का डर एवं पाने की लालसा में उद्विग्न आदमी हिंसक बन जाता है, और यही हिंसा आदमी को मानवता एवं शांति से दूर कर देता है।
अहिंसा कायरता का प्रतीक नहीं है और ना ही निष्क्रियता का संदेश देता है। जब जीवन है, जब तक जीवन की यात्रा है और जब तक चिर-विश्राम (मृत्यु) की अवस्था नहीं आ जाती है तब तक सहयोग, सहकार, एक दूसरे के दुख-सुख में भागीदार, सामाजिक समरसता और वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा के आचरण के साथ जीवन यात्रा पूरी करने का संदेश भगवान महावीर स्वामी की जयंती से हमें प्राप्त होता है।
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