टीम एबीएन, रांची। दिनांक 13/02/ 2026 को संस्कृत विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची एवम पूर्ववर्ती छात्र संघ के द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रिय शोध-संगोष्ठी का प्रो. चंद्रकांत शुक्ल के अध्यक्षता में दीप प्रज्ज्वलित करके शुभारंभ किया गया।
संकायाध्यक्ष एवं विभागाध्यक्ष प्रो अर्चना कुमारी दुबे के द्वारा वैदिक श्लोक के माध्यम से स्वागत संबोधन किया गया। जिसमें मुख्य अतिथि ओड़िआ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शत्रुघ्न पाणिग्रही ने वेद-वेदाङ्ग में भारतीय ज्ञान परंपरा के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए वेद-वेदाङ्गो का ज्ञान नितान्त आवश्यक है।
सृष्टि उत्पत्ति के ज्ञान हेतु ऋग्वेद के नासदीय सूक्त, पुरुष सूक्त, हिरण्यगर्भ सूक्तों का पठन-पाठन आवश्यक हो जाता है। अग्नि के अनेकों प्रकार हो सकते हैं पर सबके मूल में अग्निदेव ही हैं।
विशिष्टातिथि पूर्व कुलपति प्रो. कामिनी कुमार ने भारतीय ज्ञान परंपरा को हजारों वर्षों से चली आ रही एक समृद्ध परंपरा कही। यह आधुनिक युग में भौतिकता एवं आध्यात्मिकता के बीच समन्वय रखना सिखाती है।
अध्यक्षीय भाषण में प्रो चंद्रकांत शुक्ल ने वेद एवं वेदाङ्ग के बारे में विस्तृत जानकारी दी जो आज के दौर में छात्र अपने शैक्षणिक कार्यकाल में अध्ययन कर रहे है। पूर्ववर्ती छात्र संघ के अध्यक्ष डॉ मीना शुक्ल ने सभी के प्रति आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया।
मंच संचालन प्राध्यापक डॉ. शैलेश मिश्र ने करते हुए आयुर्वेद में निहित दैनिक दिनचर्या को विस्तृत रूप से बताया जो आधुनिक जीवन के सर्वांगीण विकास के अत्यंत आवश्यक है। द्वितीय सत्र के राष्ट्रिय शोध-संगोष्ठी में प्रथम दिन 70 से ज्यादा शोध पत्र पढ़े गए। अंत में पूर्ववर्ती छात्र संघ की बैठक करते हुए प्रथम दिवस की कार्यक्रम को समाप्त किया गया।
संगोष्ठी में डॉ ताराकांत शुक्ल, डॉ मोहन गोप, डॉ ब्रजेश मिश्र, डॉ जानकी देवी, डॉ मधुलिका वर्मा, डॉ श्रीप्रकाश सिंह, डॉ भारती द्विवेदी,डॉ धीरेंद्र दुबे, डॉ. एस. के. घोषाल, डॉ. राहुल कुमार, डा.जगदम्बा प्रसाद, डा.लक्ष्मी कुमारी, डॉ पारंगत आर्य, डॉ जीतेश पासवान, शोधार्थी गण व अन्य उपस्थित थे।
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