टीम एबीएन, रांची। शिव के पुत्र गणेश कहे जाते हैं। हालांकि पार्वती के मैल से गणेश का सृजन हुआ था। गणेश शिव के पालक पुत्र तो कार्तिक शिव के औरस पुत्र हैं। कार्तिकेय भी पार्वती के पालक पुत्र हैं। यह शिव परिवार अनेकता में एकता, विभिन्नता में समता लिए हुए है। जीवन और पारिवारिक प्रबंधन को समझना है तो शिव से समझिए। गणेश एक कोशिकीय थे, तो सन्तान वर्धन में गणेश वंश को काफी मुश्किल होती है। सन्तान वर्धन में डीएनए अर्थात दो कोशिकीय होना जरूरी है। शिव ने हाथी का मस्तक जोड़कर कोशिकीय परिवर्तन किया। हालांकि कल्प भेद के अनुसार कथाएं अनन्त हैं। शनि की दृष्टि पड़ने से भी गणेश का मस्तक कटा तो कश्यप ऋषि के श्राप का भी प्रमाण है। अब गणेश का मस्तक बड़ा, पेट बड़ा, हाथी का मस्तक, तो मनुष्य का धड़ जिसे बेढब देखकर हंसने लगे। तो गणेश ने चन्द को श्राप दे दिया कि इस कालांतर में राजा दक्ष ने भी चन्द्र को भी श्राप दिया था कि चन्द्र को क्षय रोगी हो जाए। गणेश इस तरह दिव्यांग हो गये। पर गणेश मातृ भक्त और पितृ भक्त भी हुए। जब प्रथम पूजन के लिए स्पर्धा रखी गयी, तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर प्रथम आना था। जो देवता ब्रह्माण्ड की परिक्रमा कर रोकेगा वह प्रथम पूज्य होगा। गणेश का बड़ा माथा, बड़ा पेट, बड़ा हाथी कान और छोटा सवारी चूहा कैसे पृथ्वी परिक्रमा करें, तो गणेश ने मातृ-पितृ भक्ति की महिमा को साकार किया। माता-पिता ही स्वर्ग है। धर्म है, तप है और सभी देवता हैं। पहली ज्ञानदायनी मां है तो यही माता-पिता ब्रह्माण्ड स्वरूप है। गणेश ने एक बेलपत्र लिया। उसपर हल्दी से राम-राम लिखा और शिव पार्वती पर चढ़ा दिया तथा मूसा पर बैठकर माता पिता की एक परिक्रमा कर ली। यह ब्रह्माण्ड की परिक्रमा हो गयी। सभी देवताओं ने ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करते भी गणेश को आगे-आगे देखा। तब से गणेश प्रथम पूज्य हुए और बेलपत्र पर हल्दी से राम-राम लिखने की प्रक्रिया शुरू हुई। शिव परिवार में इस तरह स्वयं शिव के साथ पार्वती, गणेश, कार्तिकेय के अलावा गणों में कुबेर, पुष्पदन्त आदि हैं। इसलिए अपने परिवार को शिव की तरह पूजनीय बनाने का प्रयास कीजिये। उक्त बातें राजधानी रांची के प्रख्यात ज्योतिर्विद पंडित रामदेव पांडेय ने कही। वे बरियातू डीएवी के सामने स्थित श्री राम जानकी मंदिर में आयोजित श्री शिवमहापुराण के प्रवचन मंच से श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे।
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