ममता की छांव के सहारे बिहारी से "बंगाली बाबू" बने शत्रुघ्न सिन्हा

 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। शत्रुघ्न सिन्हा को ममता की छांव मिली तो वे बिहारी बाबू से बंगाली बाबू हो गये। अब वे आसनसोल से तृणमूल कांग्रेस के सांसद हैं। लोकसभा में उनकी खनकदार आवाज एक बार फिर गूजेंगी। जब लोकसभा में वे अपने व्यंग्य वाणों से मोदी सरकार को घायल करेंगे तब तृणमूल कांग्रेस की राजनीति एक नये मुकाम पर होगी। एक ओजस्वी वक्ता के आने से लोकसभा में विपक्ष को नयी ताकत मिलेगी। अटल-आडवाणी के शिष्य रहे शत्रुघ्न सिन्हा जब सदन में भाजपा की नीतियों की धज्जियां उड़ाएंगे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके सहयोगियों के लिए असहज स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। 2019 का चुनाव हारने के तीन साल बाद उनकी लोकसभा में वापसी हुई है। लोकसभा में फिर गूंजेगी दमदार आवाज तीन साल पहले शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा से बगावत कर कांग्रेस में शामिल हुए थे। तब उन्होंने कहा था कि वे लालू यादव के कहने पर कांग्रेस में शामिल हुए थे। कांग्रेस में उनकी राजनीति जमी नहीं। वे पटना साहिब से लोकसभा का चुनाव हारे। उनके पुत्र लव सिन्हा बांकीपुर (पटना) से विधानसभा का चुनाव हारे। उनकी पत्नी पूनम सिन्हा लखनऊ से सपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव हारीं। शत्रुघ्न सिन्हा समझ गये कि कांग्रेस में उनका कोई भविष्य नहीं है। वे राजनीतिक उत्थान के लिए मौका तलाश रहे थे। आसनसोल लोकसभा उपचुनाव ने उन्हें यह मौका दे दिया। वे 15 मार्च को तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे। इस बार वे प्रशांत किशोर और यशवंत सिन्हा के कहने पर तृणमूल कांग्रेस में आये। तीसरा निशाना सटीक लगा। वे आसनसोल से लोकसभा के सदस्य चुन लिये गये। शत्रुघ्न सिन्हा जब भाजपा के सांसद हुआ करते थे तो लोकसभा में अपनी दमदार आवाजा से समां बांध देते थे। दिसम्बर 2011 में शत्रुघ्न सिन्हा भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के मुद्दे पर सदन में अपनी बात रख रहे थे। उस समय यूपीए की सरकार थी। लालू यादव सत्ता पक्ष की तरफ थे। शत्रुघ्न सिन्हा विपक्ष में थे। लेकिन उन्होंने लालू यादव को लक्ष्य कर ऐसी ऐसी बातें कहीं कि वे अपनी हंसी नहीं रोक पाये। उन्होंने कहा था, आकाशवाणी पटना से प्रसारित होने वाला भोजपुरी नाटक लोहा सिंह, हिंदी नाटकों से भी अधिक लोकप्रिय हुआ था। इसी लोहा सिंह नाटक के संवाद का असर लालू यादव पर पड़ा जिसकी वजह से वह एक लोकप्रिय नेता बने। तृणमूल का हिंदी चेहरा बनेंगे शत्रुघ्न सिन्हा ममता बनर्जी ने आखिर क्यों शत्रुघ्न सिन्हा को अपनी पार्टी में शामिल किया? दरअसल, ममता बनर्जी हर उस विशिष्ट व्यक्ति को अपनी पार्टी से जोड़ना चाहती हैं जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हिंदी में तार्किक हमला कर सके। इसी मकसद के लिए उन्होंने पहले यशवंत सिन्हा को अपनी पार्टी में शामिल किया। अब शत्रुघ्न सिन्हा उनकी पार्टी से जुड़कर सांसद बने हैं। तृणमूल के अच्छे वक्ता या तो अंग्रेजी में अपनी बात रखते हैं या फिर बांग्ला में। अगर तृणमूल का कोई सांसद हिंदी में अपनी बात मजबूती से रखेगा तो पार्टी की स्वीकार्यता दूसरे राज्यों (हिंदीभाषी) में भी बढ़ेगी। शत्रुघ्न सिन्हा एक कुशल वक्ता हैं। उनके तीखे व्यंग्य से विरोधी निरुत्तर हो जाते हैं। भाजपा में रहते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का खुल्लमखुल्ला विरोध किया था। भाजपा सांसद रहते हुए उन्होंने कहा था, वे (नरेन्द्र मोदी) कहते हैं कि फलां, फलां नेता वंशवादी राजनीति कर रहा है। वे परिवारवाद का विरोध करते हैं। अगर मान लिया जाय कि परिवारवाद राजनीतिक के लिए खराब है तो क्या व्यक्तिवाद राजनीति के लिए ठीक है? अगर उधर (कांग्रेस, राजद) परिवारवाद है तो इधर (भाजपा) व्यक्तिवाद है। सारी चीजें एक एक व्यक्ति के आसपास सिमटी हुई हैं। व्यक्तिपूजा क्या लोकतंत्र के लिए ठीक है? लोकतंत्र में सामूहिक फैसला लिया जाना चाहिए।

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