टीम एबीएन, रांची। झारखंड में वनोपज को बाजार और इससे जुड़े लोगों की समृद्धि के प्रति संजीदा मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के प्रयास के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। इस सिलसिले को और कारगर बनाने के लिए महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना एवं जोहार परियोजना के जरिए लाह की खेती को राज्य सरकार बढ़ावा दे रही है। राज्य की ग्रामीण महिलाओं को वनोपज आधारित आजीविका से जोड़कर आमदनी बढ़ोतरी के प्रयासों को महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के ज़रिए अमली जामा पहनाया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों के ये किसान लाह एवं लाह की खेती के ज़रिये बेहतर आजीविका की ओर अग्रसर हो रहे हैं। लाह की खेती से महिलाएं ना सिर्फ अपने गांव में रहकर ही अच्छी आमदनी कर रहीं हैं, बल्कि राज्य में लाह उत्पादन के आंकड़ों में भी बदलाव ला रही हैं। ग्रामीण विकास विभाग अंतर्गत झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के ज़रिए सखी मंडल की ग्रामीण महिलाओं को लाह की वैज्ञानिक खेती से जोड़कर अत्याधुनिक प्रशिक्षण के जरिए आमदनी बढ़ोतरी के प्रयास हो रहे हैं। इस पहल से राज्य की 73 हजार से ज्यादा ग्रामीण परिवारों को लाह की वैज्ञानिक खेती से जोड़ा गया है, जिनमें ज्यादातर अति गरीब एवं वनों के आस-पास रहने वाले ग्रामीण परिवार हैं। इस साल करीब 2000 मीट्रिक टन छिला लाह का उत्पादन इनके द्वारा किया गया है। पश्चिमी सिंहभूम के गोईलकेरा प्रखंड के रूमकूट गांव की रंजीता देवी लाह की खेती से सालाना 3 लाख रुपए तक की आमदनी प्राप्त कर रही हैं। रंजीता देवी विगत कुछ सालों से आधुनिक तकनीक के ज़रिये वैज्ञानिक विधि से बिहन लाह की खेती कर रही हैं। सखी मंडल से जुड़ने के बाद उन्हें लाह की उन्नत खेती करने का प्रशिक्षण मिला। रंजीता देवी बताती हैं, दूरस्थ क्षेत्र होने के कारण हमारी आजीविका मुख्यत: जंगल और वनोपज पर निर्भर करती है। हमारे परिवार में पहले भी लाह की खेती का कार्य किया जाता था, लेकिन सखी मंडल से जुड़ने के बाद हमे 25 दिनों की सीआरपी ड्राइव के द्वारा वैज्ञानिक विधि से लाह की खेती करना सिखाया गया। इस प्रकार सखी मंडल के माध्यम से लाह की आधुनिक खेती से सम्बंधित प्रशिक्षण के साथ 5 किलो बिहन लाह (बीज के रूप में) प्राप्त हुआ। लाह की खेती में रंजीता देवी कम खर्च में कई गुना ज्यादा उपज एवं मुनाफा कमा रही हैं। पिछले साल रंजीता ने 300 किलो बिहन लाह बीज के रूप में लगाया, जिससे उन्हें 15 क्विंटल लाह की उपज प्राप्त। उससे उन्हें 3 लाख रुपए की आमदनी हुई। उनका कहना है, सखी मंडल के माध्यम से हमें अपने पारंपरिक पेशे में ही स्थानीय आजीविका के बेहतर अवसर मिल रहे हैं।
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