एबीएन डेस्क। फिल्म जगत के लोगों के लिए एकेडमी अवॉर्ड यानी ऑस्कर सबसे अहम पुरस्कारों में से एक है। आज 94वें ऑस्कर अवॉर्ड्स की घोषणा की जा रही है, जिसपर सभी सिनेमा प्रेमियों की निगाहें टिकी हैं। अगर भारत की बात करें तो एंटरटेनमेंट वर्ल्ड के सबसे बड़े अवॉर्ड के लिए भारत की तरफ से तमिल फिल्म कूजांगल को नॉमिनेट किया गया है। आप ऑस्कर अवॉर्ड्स के विजेताओं की लिस्ट तो देख ही रहे होंगे, लेकिन ऑस्कर अवॉर्ड्स से जुड़ी ऐसी बातें हैं, जो आपको जानना जरूरी है और काफी दिलचस्प भी हैं। ऐसे में आज हम आपको ऑस्कर की ट्रॉफी के बारे में बता रहे हैं, जिसे पाने का हर फिल्ममेकर या कलाकार का सपना होता है। तो जानते हैं कि आखिर ऑस्कर अवॉर्ड्स की जो ट्रॉफी मिलती है, उसमें किसकी मूर्ति होती है और इस खास ट्रॉफी की क्या कहानी है… मूर्ति के पीछे कौन है? बता दें कि पहला ऑस्कर अवॉर्ड इवेंट 16 मई 1929 को आयोजित किया गया था। सन 1927 में एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज की मीटिंग में पहली बार ट्रॉफी के डिजाइन पर चर्चा की गई। इस दौरान लॉस एंजिल्स के कई कलाकारों से अपने-अपने डिजाइन सामने रखने को कहा गया। इस दौरान मूर्तिकार जॉर्ज स्टैनली की बनाई हुई मूर्ति को पसंद किया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑस्कर अवॉर्ड में जो ट्रॉफी दी जाती है कहते हैं कि उसकी प्रेरणा मैक्सिकन फिल्ममेकर और एक्टर एमिलियो फर्नांडीज थे। ऐसे में माना जाता है कि इस मूर्ति के पीछे फर्नांडीज है और ये उनकी ही तस्वीर है। क्या है मूर्ति बनने की कहानी : बता दें कि साल 1904 को मैक्सिको के कोआहुइलिया में जन्में एमिलियो मैक्सिको की क्रांति के दौर में बड़े हुए। हाई स्कूल ड्रॉप आउट फर्नांडीज, ह्यूरितिस्ता विद्रोहियों के ऑफिसर बन गए। उन्हें सजा भी सुनाई गई, लेकिन वो वहां से भाग गए। इसके बाद फर्नांडीज, हॉलीवुड में एक्स्ट्रा वर्क करने लगे। यहां पर उन्हें साइलेंट फिल्म स्टार डोलोरेस डेल रियो ने एल इंडियो नाम दिया था। वह एक्ट्रेस रियो के अच्छे दोस्त बन गए थे। रियो मेट्रो गोल्डविन मेयर स्टूडियो के आर्ट डायरेक्टर और एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज के सदस्य कैड्रिक गिबॉन्स की पत्नी थीं। डेल रियो ने फर्नांडीज को गिबॉन्स से मिलवाया जो उस समय स्टैच्यू की डिजाइन पर काम कर रहे थे। गिबॉन्स ने फर्नांडीज से एक स्केच के लिए पोज देने के लिए कहा जो 8.5 पौंड के वजन वाली ट्रॉफी का आधार था। फर्नांडीज ने बेमन ने पोज दिया और वो आइकॉनिक पोज हो गया। जॉर्ज स्टैनली इसे तैयार किया और लॉस एंजिल्स में सन् 1929 में हुए पहले ऑस्कर समारोह में यही ट्रॉफी सौंपी गई। इसलिए इस ऑस्कर की ट्रॉफी के पीछे फर्नांडीस को माना जाता है। क्या एक डॉलर है इसकी कीमत? ऑस्कर के नियम के अनुसार ऑस्कर विजेता उसकी ट्रॉफी का पूरा मालिकाना हक नहीं होता है। विजेता ट्रॉफी को चाहकर भी कहीं और नहीं बेच सकता। अगर कोई विजेता इस ट्रॉफी को बेचना चाहता है तो तो सबसे पहले यह इस ट्रॉफी को देने वाली अकेडमी को ही बेचना होगा। वहीं एकेडमी इस ट्रॉफी को सिर्फ 1 डॉलर में ही खरीदेगी। इसलिए इस ट्रॉफी की कीमत एक डॉलर मानी जाती है। हालांकि, इसके बनाए जाने की खर्चे की बात करें तो इसमें काफी खर्चा होता है। ऑस्कर में भारत का प्रदर्शन : 94 सालों से चले आ रहे इस अवॉर्ड में अब तक भारत की चार फिल्मों को जगह मिल चुकी है- मदर इंडिया, सलाम बॉम्बे, श्वास (मराठी) और लगान। पहला ऑस्कर अवॉर्ड 1929 में आयोजित किया गया था, वहीं साल 1957 से भारत की फिल्में ऑस्कर के लिए भेजी जा रही हैं।
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