टीम एबीएन, रांची। 27 मार्च (रविवार) को डीएवी पब्लिक स्कूल गांधीनगर, रांची के प्रांगण में विशेष साप्ताहिक यज्ञ का आयोजन किया गया I इसमें रांची नगर के अलावे गिद्दी, खूंटी आदि स्थानों के सभी डीएवी विद्यालयों के 250 से अधिक प्राचार्यों, शिक्षकों एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों के साथ विद्यालय के स्थानीय छात्र उपस्थित थे। विद्यालय के संस्कृत एवं धर्मशिक्षक श्री पूर्णचंद्र आर्य ने याज्ञिक क्रियाओं का संचालन किया I मुख्य यजमान के रूप में विद्यालय के प्राचार्य सुनील कुमार सिन्हा के साथ प्राचार्यों एवं शिक्षकों ने वैदिक मन्त्रों के साथ पवित्र अग्नि में आहुतियां डाली I इस अवसर पर प्राचार्य सुनील कुमार सिन्हा ने अपने वक्तव्य में आर्यसमाज की मान्यताओं एवं अवधारणाओं के मूल उद्देश्यों की व्याख्या की I साथ ही डीएवी संस्थाओं के देश की शैक्षिक, सामाजिक, नैतिक प्रगति के लिए विगत सवा सौ वर्षों से अधिक कालखण्ड से किए जा रहे अनवरत प्रयासों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डीएवी संस्थाओं का उद्देश्य केवल उन्नत शिक्षा देना ही नहीं अपितु छात्रों के भीतर राष्ट्र और राष्ट्रीयता की भावना भी भरना हैI डीएवी संस्थाएं वैदिक मान्यताओं एवं नैतिक मूल्यों का ज्ञान देकर देश की विराट संस्कृति से परिचय कराकर उन्हें संवेदनशील नागरिक बना रही है I उन्होंने अपने वक्तव्य का विस्तार करते हुए सभी प्राचार्यों एवं शिक्षकों से आग्रह किया प्रार्थना सभाओं एवं काक्षाओं में वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत के विविध आख्यानों, प्रकरणों, गीता के श्लोकों से छात्रों को यथासाध्य परिचय करना चाहिए I डीएवी संस्थाओं के प्रधान आर्य रत्न पद्मश्री पूनम सूरी एवं दिल्ली एक के डीएवी पब्लिक स्कूलों के निदेशक जेपी सूर के कुशल मार्गदर्शन में ये संस्थाएं महर्षि दयानंद के सपनों को साकार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं I डीएवी नीरजा सहाय के प्राचार्य एसके मिश्रा ने कहा कि ज्ञान को साकारात्मक स्वरूप देने के लिए ज्ञान पर धर्म का अंकुश होना आवश्यक है I धार्मिक मूल्यों से रहित शिक्षा वास्तविक उद्देश्यों से भटककर समाज के लिए घातक हो जाती है I मन की चंचलता और उसमें उपजे विकृत विचारों पर नियंत्रण आवश्यक है क्योंकि विकारों के रहते मन में सद्भावनाओं का प्रवेश नहीं हो सकता I डीएवी बारियातू के प्राचार्य वीके पाण्डेय ने अपने उद्बोधन में कहा कि आर्य समाज की छत्र-छाया के तले संचालित डीएवी स्कूलों में धर्म और संस्कृति के साथ ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा दी जा रही है I उन्होंने उपनिषद के वाक्य चरैवेति चरैवेति का उदाहरण देते हुए छात्रों के संबोधन में कहा- निरंतर कर्म करने से सफलता असंदिग्ध होती है I व्यक्ति को भाग्यवाद पर विश्वास न कर पुरुषार्थवाद को अपनाना चाहिए I विद्यालय के संस्कृत शिक्षक वैद्यनाथ मिश्र ने वेदों प्रासंगिकता और उसके महत्त्व पर प्रकाश डाला I इसके पूर्व विद्यालय की संगीत शिक्षिका लक्ष्मी कुमारी एवं छात्रों ने आकर्षक भजन प्रस्तुत किये I कार्यक्रम को सफल बनाने में श्री निराकार आचार्य, पुष्प कुमार झा, एके सिंह, गोविन्द झा, जया जायसवाल, कुंदन कुमार आदि की सराहनीय भूमिका रही।
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